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आवाजाही, कानाफूसी...

जब केदारनाथ में रात को अजीबो गरीब आवाजों ने टीवी चैनल के रिपोर्टरों को परेशान किया

: कानाफूसी : तबाही के बाद सावन में उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर की कवरेज करने गए टीवी चैनल के पत्रकारों को खंडहर हो चुकी इमारतों में रात बिताना महंगा पड़ गया. जी हां, केदारनाथ में कुछ पत्रकार 21-22 जुलाई को कवरेज करने गए थे. उनके साथ कुछ और भी लोग थे. देर शाम मंदिर के पास पहुंचे टीवी चैनल के पत्रकारों को वहां देर हो गयी और वो खबरें बनाने के लिए अगले दिन का इंतजार करने लगे. इसके लिए उनको वहां रुकना भी पड़ा.

: कानाफूसी : तबाही के बाद सावन में उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर की कवरेज करने गए टीवी चैनल के पत्रकारों को खंडहर हो चुकी इमारतों में रात बिताना महंगा पड़ गया. जी हां, केदारनाथ में कुछ पत्रकार 21-22 जुलाई को कवरेज करने गए थे. उनके साथ कुछ और भी लोग थे. देर शाम मंदिर के पास पहुंचे टीवी चैनल के पत्रकारों को वहां देर हो गयी और वो खबरें बनाने के लिए अगले दिन का इंतजार करने लगे. इसके लिए उनको वहां रुकना भी पड़ा.

तेज़ हवा और ठण्ड वहां के माहौल को और भी डरावना बना रही थी. जैसे तैसे शाम तो बीत गयी लेकिन रात का अँधेरा वहां बहुत धीरे बीत रहा था. कोई कैम्प नहीं, कोई रुकने की जगह नहीं, कोई लाइट नहीं और न कोई फ़ोन के सिग्नल. बस अँधेरा. पूरे केदारघाटी में केदार धाम में चारो और पड़े मलबे के ढेर और वहां उड़ान भर रहे गिद्ध देखने के बाद शायद ही कोई वहां रात को रुकने के बारे में सोच सके. लेकिन वो ना केवल वहां रुके बल्कि एक ऐसी इमारत में ठहरे जिसकी बगल में जमींदोज हो चुकी एक इमारत के मलबे से उठ रही दुर्गन्ध खुद साबित कर रही थी कि हमें जहां रात बितानी है वहां आसपास कहीं इंसानी लाश पड़ी है.

दस डिग्री तापमान के बीच काफी समय तक वो मंदिर समिति के पदाधिकारियों के साथ केदार बाबा के आंगन में हाथ तापते रहे लेकिन बारिश ने ऐसा करने से रोक दिया. इसके बाद इन पत्रकारों को भुतहा सरीखी एक इमारत में रात बिताने को जाना पड़ा. जिस इमारत में रिपोर्टरों ने रात बिताई उसका निचला हिस्सा पानी के सैलाब की भेंट चढ़ चुका था और इमारत के उपरी हिस्से का जो हाल था उसे देख कर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता था कि उस  कयामत की रात वहां कितना खौफनाक मंजर रहा होगा.

जिस कमरे में वो पत्रकार रुके, वहां पड़ा लोगों का अस्त व्यस्त सामान ये बताने को काफी था कि 16 जून को वहां जो लोग थे वो किस कदर खौफजदा हालात में अपना सब कुछ छोड़ कर जान बचाने के लिए भागे होंगे. कडकड़ाती ठण्ड के बीच इन पत्रकारों ने उस कमरे में किसी तरह रात के 12 बजे तक का वक्त काट लिया. उसके बाद जैसे ही वो सोने के लिए कमरे के बिस्तर पर लेटे ही थे कि अचानक तक़रीबन एक बजे पानी की तेज़ आवाज के बीच उनके  कमरे की किवाड़ को किसी ने बहुत तेज़ी से खड़खड़ाया.

एक बारी लगा शायद उनका भ्रम है पर कुछ मिनटों बाद वही आवाज सुनाई दी. बगल में लेटे साथी ने दूसरे से चुप रहने को कहा. उसके बाद नींद कहा आने वाली थी. फिर भी दिन भर की थकान के कारण वो सोये और फिर तीन बजे उनके कमरे की किवाड़ पर वही आवाज आई. फिर भी वो चुप रहे. दुबारा आने पर इधर से कुछ पत्रकारों ने आवाज लगायी कौन है कौन है. पर कोई नहीं जगा. जैसे तैसे सुबह हो गयी. जो लोग वहां किसी और ईमारत में रुके थे, उनसे जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या आप थे हमारे कमरे के बाहर तो उन्होंने साफ मना कर दिया.

यकीन मानिये कि कैसे बीती वह रात उन पत्रकारों की. जब बाद में उन्होंने देखा कि जिस कमरे में वो रुके थे उसके ठीक बराबर में एक महिला की लाश लोहे में फंसी हुई थी. शायद पानी से बचने के लिए वो वहां से भागी होगी और वहीं फंसी रह गयी. अब तक जितने भी पत्रकार वहां रात को रुके हैं वो सब मंदिर से दो किलोमीटर दूर हेलीपैड पर रुके हैं. वो पहली टीम थी पत्रकारों की जो बिलकुल मंदिर में रुकी. यह घटना केदारनाथ में नेशनल चैनलों के उत्तराखंड के तीन रिपोर्टरों के साथ घटी है.

संजय ए. की रिपोर्ट.

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