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बेशर्म खंडूरी! चुनावी कवरेज और पेड न्‍यूज के लिए करोड़ों रुपये बांटे

: निशंक की राह पर चल रहे सीएम की पोल खोलेगा उत्‍तराखंड जर्नलिस्‍ट फोरम : मीडिया को भ्रष्‍टाचारी बनाने का खुला खेल : देहरादून। ईमानदारी का ढोल पीट रहे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी राज्य में पेड न्यूज के काले-कारोबार को बढ़ावा देकर मीडिया को पतित करते जा रहे हैं। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे निशंक की विदाई के बाद जिस दिन से खंडूरी ने सत्ता संभाली, तब से क्षेत्रीय न्यूज चैनल्स को स्पेशल पैकेज देकर खुलेआम पैसे देकर सरकार के पक्ष में कवरेज कराई जाती रही है। राज्य में काम करने वाले क्षेत्रीय चैनल्स पर दिखाई जाने वाली खबरें इस बात की तस्दीक करती रही हैं।

: निशंक की राह पर चल रहे सीएम की पोल खोलेगा उत्‍तराखंड जर्नलिस्‍ट फोरम : मीडिया को भ्रष्‍टाचारी बनाने का खुला खेल : देहरादून। ईमानदारी का ढोल पीट रहे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी राज्य में पेड न्यूज के काले-कारोबार को बढ़ावा देकर मीडिया को पतित करते जा रहे हैं। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे निशंक की विदाई के बाद जिस दिन से खंडूरी ने सत्ता संभाली, तब से क्षेत्रीय न्यूज चैनल्स को स्पेशल पैकेज देकर खुलेआम पैसे देकर सरकार के पक्ष में कवरेज कराई जाती रही है। राज्य में काम करने वाले क्षेत्रीय चैनल्स पर दिखाई जाने वाली खबरें इस बात की तस्दीक करती रही हैं।

आचार संहिता लगने के बाद भी चैनल्स खंडूरी का गुणगान करने में जुटे हुए हैं। खंडूरी ने मीडिया घरानों को सरकारी खजाने से जो मोटे पैकेज दिए हैं, उसका असर आचार संहिता लगने के बाद भी साफ दिख रहा है। खंडूरी की बेइमानी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य में चुनाव आचार संहिता लागू होने से एक दिन पहले खंडूरी ने मीडिया घरानों को भाजपा के पक्ष में चुनावी माहौल बनाने के लिए आठ से दस करोड़ रुपये के विज्ञापन बांटे। अपने तीन महीने के ही कार्यकाल में खंडूरी मीडिया के जरिये अपनी छवि चमकाने के लिए करोड़ों रुपये बांट चुके हैं। खंडूरी जब भी सत्ता में रहे हैं, तब-तब वे पैसे देकर खबरें छपवाने का धंधा करते रहे हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में खंडूरी ही वे पहले नेता थे, जिन्होंने राज्य में पहली बार बड़ी बेशर्मी से पैसे देकर अखबारों को पेड न्यूज का कारोबार कराने का रास्ता बताया। 

एक बार फिर सत्ता में आते ही खंडूरी ने मीडिया घरानों को भाजपा के पक्ष में माहौल तैयार करने के लिए पुरानी वाली कहानी शुरू कर दी। खंडूरी की कृपादृष्टि से जहां बड़े मीडिया घराने पैसे लेकर उनके गुणगान करने में जुटे हुए हैं, वहीं सीमित संसाधनों के बूते सत्ता के विरोध में स्वर मुखर करने वाले छोटे व मझोले पत्र-पत्रिकाएं खंडूडी को फूटी आंख नहीं सुहा रही हैं। अपने पूर्ववर्ती निशंक की तर्ज पर खंडूरी ने भी तीन माह पहले सत्ता में आते ही राज्य के सभी सरकारी व अर्द्ध सरकारी विभागों को विज्ञापन जारी करने पर रोक लगाकर अपनी मंशा जाहिर कर दी। यह सब इसलिए किया गया ताकि कोई भी पत्र-पत्रिकाएं खंडूरी की ईमानदारी पर सवाल न उठा सकें। लेकिन राज्य में छोटे-पत्रिकाओं के सत्ता विरोधी रूझान का खत्म करने की इन कोशिशों के खिलाफ विरोध भी होने लगा है।

राज्य में वैसे तो पत्रकारों के नाम पर आधा दर्जन से अधिक संगठन मौजूद हैं, लेकिन कोई भी अपने निहित स्वार्थों के चलते खंडूरी की इस तानाशाही के खिलाफ कुछ भी बोलने-लिखने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। ऐसी स्थिति में राजधानी देहरादून में कुछ पत्रकारों ने ‘उत्तराखंड जर्नलिस्ट फोरम’ नाम से एक संगठन का गठन कर खंडूरी के खिलाफ मोर्चा खोलने का एलान किया है। फोरम का अध्यक्ष दीपक आजाद, उपाध्यक्ष एसपी सिंह और महासचिव विमल दीक्षित को चुना गया है। फोरम के अध्यक्ष ने कहा कि मुख्यमंत्री खंडूरी एक ओर जहां ईमानदारी का जाप करते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ एक स्वतंत्र व मजबूत लोकायुक्त संस्था के गठन की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य में बड़ी बेशर्मी से बड़े मीडिया घरानों को अपने पक्ष में चुनावी माहौल बनाने के लिए पेड न्यूज का सहारा ले रहे हैं। एक स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रेस के लिए जरूरी है कि खंडूरी और उनके चेले-चपेटे के मीडिया को बंदी बनाने के इस खेल का मीडिया जगत से ही मुखर विरोध होना चाहिए। फोरम राज्य में मीडिया से जुड़े जरूरी सवालों पर मुखरता से हस्तक्षेप करेगा।

फोरम, चुनाव में पेड न्यूज को बढ़ावा देने वाले चाहे वह सत्ताधारी दल से संबंध रखने वाले उम्मीदवार हों या फिर विपक्षी दलों के नेता, का विरोध करेगा। फोरम के महासचिव विमल दीक्षित ने कहा कि राज्य में सरकार चाहे वह किसी भी दल की रही हो, वह सत्ता विरोधी रूझान रखने वाले मीडिया पर अंकुश लगाने का काम करती रही है। पहले निशंक और फिर खंडूरी ने यही काम किया है। राज्य में दस साल बाद भी कोई विज्ञापन और पत्रकार मान्यता नीति न बनाना सरकारों को मंशा पर सवाल करता है। विज्ञापन नीति न होने से एक ओर जहां सरकार बड़े मीडिया घरानों को मनमाने तरीके से करोड़ों के एड पैकेज देकर अपना गुणगान कराती है, वहीं दूसरी ओर सत्ता विरोधी स्वर मुखरित करने वाले छोटे व मझोले पत्र-पत्रिकाओं को हाशिये पर धकेलती रही है। चुनाव में फोरम मीडिया से जुड़े तमाम मुददों को लेकर जनता के बीच जाएगा। फोरम की बैठक में चुनाव आयोग से पेड न्यूज निगरानी समिति में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारों को शामिल करने की मांग की गई।

लेखक दीपक आजाद उत्तराखंड के युवा और बेबाक पत्रकार हैं. कई अखबारों-पत्रिकाओं में काम कर चुके हैं. साफ-साफ और खरी-खरी बात लिखने के लिए जाने जाते हैं. उनसे संपर्क [email protected]  के जरिए किया जा सकता है.

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