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पत्रकार शंभू दयाल वाजपेयी को अमर उजाला, बरेली एडिशन में लिख कर धमकाया गया!

Shambhu Dayal Vajpayee : अमर उजाला के नाम… भई सलाह तो अच्‍छी दी है। साथ में धमकी भी। ऐसी सलाह तो अपना कोई बड़ा हितैषी ही दे सकता है। ''बुढापे में गीता पढो दद्दा या फिर शंभु शंभु भजो। बहुत भड़ासी बैठे हैं यहां। कई बार कपडे भी उतार लेते हैं।'' यह कुछ इसी तरह है जैसे कोई स्‍वेच्‍छाचारी परिवारी बुर्जुग को कहे – जिंदगी भर तो तुमने केवल पाप किये ही हैं। मैं धर्म की गंगा में गोते लगा रहा हूं तो टोका टाकी न करो। अब तुम सठिया गये हो। शहर – समाज में क्‍या हो रहा है इसकी चिंता छोडो। हमारे पास बडे अखबार की निर्बाध ताकत है । इस लिए इसे देखना और क्‍या स्‍याह – सफेद है , यह तय करना केवल हमारा काम है। नहीं मानोगे तो हम तुम्‍हारे कपडे उतार कर नंगा कर देंगे। कह देंगे कि जिंदगी भर केवल बिके हो । बुढापे में भी बिक रहे हो।

Shambhu Dayal Vajpayee : अमर उजाला के नाम… भई सलाह तो अच्‍छी दी है। साथ में धमकी भी। ऐसी सलाह तो अपना कोई बड़ा हितैषी ही दे सकता है। ''बुढापे में गीता पढो दद्दा या फिर शंभु शंभु भजो। बहुत भड़ासी बैठे हैं यहां। कई बार कपडे भी उतार लेते हैं।'' यह कुछ इसी तरह है जैसे कोई स्‍वेच्‍छाचारी परिवारी बुर्जुग को कहे – जिंदगी भर तो तुमने केवल पाप किये ही हैं। मैं धर्म की गंगा में गोते लगा रहा हूं तो टोका टाकी न करो। अब तुम सठिया गये हो। शहर – समाज में क्‍या हो रहा है इसकी चिंता छोडो। हमारे पास बडे अखबार की निर्बाध ताकत है । इस लिए इसे देखना और क्‍या स्‍याह – सफेद है , यह तय करना केवल हमारा काम है। नहीं मानोगे तो हम तुम्‍हारे कपडे उतार कर नंगा कर देंगे। कह देंगे कि जिंदगी भर केवल बिके हो । बुढापे में भी बिक रहे हो।

पढ कर अच्‍छा लगा। पठनीय है । आप भी पढिये । अमर उजाला के जिस भी भाई ने लिखा है और जिन्‍हों ने भी लिखवाया है मैं उनके प्रति इस नेक सलाह सह कपडे उतार लेने की धमकी देने के लिए आभारी हूं। मैं इस सलाह -धमकी को सम्‍मान शिरोधार्य कर रहा हूं। केवल कुछ विनम्र निवेदन है। मैंने गंगाशील प्रकरण पर जो उचित समझा फेस बुक पर लिखा , लेकिन भडास 4 मीडिया को कभी भेजा नहीं। उन्‍हों ने अपने आप ही लगाया । मेरा गंगाशील वाले डा. निशांत गुप्‍ता या उस अस्‍पताल के किसी डाक्‍टर से परिचय -सम्‍पर्क नहीं है। डा. प्रमेन्‍द्र माहेश्‍वरी से जरूर संबंध हैं। 10 -12 सालों से। इस मामले में उनसे भी कभी बात नहीं हुई।किसी के कहने नहीं नितांत अपनी अंत: प्रेरणा से और स्‍वांत: सुखाय लिखा । यह जानते हुए भी आपकी अथाह ताकत के मुकाबले इस मंच पर मेरे लिखने का कोई अर्थ नहीं है। मैं ने कहीं भी अपने किसी पत्रकार भाई या अमर उजाला का नामोल्‍लेख नहीं किया । इन जनरल लिखा और एक सधी हुई पत्रकारीय मर्यादा का किया। मेरा पक्ष गलत हो सकता है पर मेरा किसी पत्रकार या भाई या अमर उजाला से कोई निजी वैर भाव या द्वेष नहीं था। मेरा मकसद कथित घटना के दोषियों को बचाना नहीं , केवल मनमानी तरीके से इतने बडे अस्‍पताल को बंद कराने और सपत्‍नीक डा. निशांत को पूरी घटना के लिए दोषी साबित करने को रेखांकित करना ही था। मैं पीडिता को समुचित न्‍याय दिलाने और दोषियों को उनके दोषानुरूप दंडित किये जाने का पक्षधर हूं। मनमानी ढंग से अस्‍पताल को , बिना उसके प्रतिपरिणामों के बारे में विचार किये, बंद किये जाने को एक पक्षीय मानता हूं।

इसके बाजूद आपने मुझ पर ब्‍यक्तिगत हमला किया है। मुझ अकिंचन से नाहक ही तिलमिला गये। आप आइएमए को नंगा करते रहिए, आईजी की चडढी उतारते रहिए। आपके पास बडी ताकत है , कुछ भी कर सकते हैं। मेरे कपडे उतार लेना तो आप के लिए बायें हाथ का खेल है। यही क्‍या , आप तो मुझे जिला बदर भी करा सकते हैं, जेल भी भेजवा सकते हैं। मेरे पास आप जैसी अखबारी ताकत तो बल है नहीं। आपका बडा उपकार होगा यदि आप अपने प्रभाव से कोई उच्‍च स्‍तरीय जांच करा कर मेरी छट्ठी पसनी का ब्‍यौरा अपने अखबार में उदघाटित कर सकें। मैं ईमानदारी का पुतला या दूध का धुला भले न होऊं लेकिन विश्‍वास मानिये यह नहीं जानता कि जीवन में या अखबारी सफर में कहां कहां बिका।

यह है वह कालम जिसमें अमर उजाला ने मेरे बारे में '' सोशल साइट पर बिकिये'' शीर्षक से लिखा।

सोशल साइट्स पर बिकिए

खबरों को बेचने का धंधा करने वालों से अखबारों ने मुक्ति भले ही पा ली हो लेकिन सोशल साइट्स पर उनके लिए दुकानदारी की बड़ी गुंजाइश है। दिल की भड़ास निकालने के बहाने वे शब्दों की ऐसी जलेबी पका रहे हैं कि उनका दाता खुश। पता नहीं उनके कितने दाता हैं और कैसे-कैसे हैं। मक्खन-मलाई उनकी कलम से ऐसे टपकती है कि मत पूछिए। मतलब की बात ऐसे पकड़ते हैं जैसे चुंबक कील को लपकता है। मुर्गे लपकने में माहिर एक बड़े भाई ने इस बीच खूब कलम तोड़ी है। उन्हें अखबारों में सच छापने वाले अहंकारी लग रहे हैं और विश्वसनीयता का संकट बताकर उन्हें डरा भी रहे हैं। बलात्कार पीड़ित शहर की एक लड़की न्याय की जंग लड़ रही है और वह इस लड़की से लड़ने वालों के लिए लड़ रहे हैं। बुढ़ापे में गीता पढ़ो दद्दा, या फिर शंभु, शंभु भजो। अब कितना लपकोगे। कम से कम ऐसे संवेदनशील मामले में तो शील शील कहकर अश्लील लोगों के साथ न खड़े हो। ऐेसी साइट्स पर दौड़ना रिस्की है। बहुत भड़ासी बैठे हैं। ये तो कई बार कपड़े भी उतार देते हैं।

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Shambhu Dayal Vajpayee अमर उजाला , बरेली से एक अनुरोध और : बहुत जल्‍दबाजी में लिखा है। जो कमियां हों याथायोग्‍य सुधार लीजिएगा। रुद्रपुर निकल रहा हूं। देर शाम लौटूंगा । वैसे मेरे दुबले तन पर ज्‍यादा कपडे नहीं है। उतारने या उतरवाने में आपको अधिक श्रम नहीं होगा। जो हैं भी उन्‍हें साथ लेकर मैं पैदा नहीं हुआ था । सब दूसरे के दिये ही हैं।

वरिष्ठ पत्रकार शंभू दयाल वाजपेयी के फेसबुक वॉल से.

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