देहरादून : 16-17 जून की आपदा के बाद नेताओं, अफसरों के हैलीकाप्टर के दौरे अभी तक थमे नहीं हैं। उत्तराखंड और दिल्ली के पत्रकारों ने भी हैली के मजे लिये। दिल्ली की उमस भरी गर्मी को इस आपदा ने दिल्ली के पत्रकारो को कुछ दिनों के लिये टाल जैसा दिया। दिल्ली में इस गर्मी में ट्रैफिक में फंसे रहने वाले पत्रकारों को खूव आवभगत सूचना एवं जन संपर्क विभाग उत्तराखंड ने की।
देहरादून के साथ-साथ आपदाग्रस्त क्षेत्रों में भी सुविधायुक्त होटलों में इन पत्रकारों के लिये इंतजाम करना उत्तराखंड सरकार नहीं भूली। भले ही आपदा पीड़ितों के लिये राशन और टैण्ट देना अभी तक भूली हुई है। हैलीकाप्टर उत्तराखंड में आसमान में खूब इधर उधर मंडराते हुए 17 जून के बाद 18 जून के आते-आते मौसम के खुलते ही राज्य की पूरी सरकार, उसके नौकरषाह, मंत्रीगण और विधायक तो हैली में धूम ही रहे थे कि पत्रकार क्यों पीछे रहते।
पिथौरागढ़ में एक प्रेस कान्फ्रेस में जिले के प्रभारी मंत्री दिनेश अग्रवाल को जब यह सवाल पूछा गया कि मंत्री और नौकरशाह हैली से उतर नहीं रहे हैं तो मंत्री ने पत्रकारों से ही पूछा कि आपदाग्रस्त क्षेत्रों की फोटो और टीवी के लिये फुटेज लेने के लिये पत्रकार बतायें कि वे किस माध्यम से गये, तो पत्रकार इधर उधर झांकने लगे। प्रतिवर्ष विज्ञापन और प्रसार के माध्यम से अरबों रूपये उत्तराखंड से कमाने वाले और दिल्ली की मीडिया जो उत्तराखंड के विज्ञापनों पर गिद्द दृश्टि रखकर करोडों रूपये यहां से ले जाते हैं। जनता के टैक्स से जमा होने वाले उत्तराखंड के खजाने को विज्ञापनों के माध्यम से लूटने वाले मीडिया घरानों को इतनी भी षर्म नहीं थी कि उत्तराखंड से 13 वर्षों में जो कमाया है। उसका एक अंश भी रिपोर्टिंग में खर्च करें।
केदार घाटी के आपदा की त्रासदी को देखने के लिये जाते समय प्रदेश के काबिना मंत्री हरक सिंह रावत ने हैली में रखे राशन के कट्टे उतरकर देहरादून के पत्रकारों को हैली में बिठाकर चल दिये। केदारनाथ से लौटते समय एक घायल वृद्ध महिला हाथ जोड़कर हरक सिंह रावत के सामने आसूं बहाते रह गयी लेकिन उसे हैली में जगह नहीं दी गयी। विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री अपने हैली में पत्रकारों को ठूंसकर अपने साथ दौरे में ले जा रहे थे ताकि दूसरे दिन अखबार में उनकी फोटो छप सके और सायं टीवी चैनलों में उनके भ्रमण की खबर आ सके। उत्तराखंड के साथ ही देश का एक भी टीवी तथा प्रिंट मीडिया का घराना आगे नहीं आया जिसने आपदा के रिपोर्टिंग के लिये हैली तो रहा निजी वाहनों से अपने पत्रकारों को भेजा हो। पत्रकारों की नजर आपदा में फंसे लोगों को निकालने में तथा राहत सामग्री गांवों तक पहुंचाने के लिये लगे हैलीकाप्टरों पर बनी हुई है। एक पत्रकार के हैली में बैठने से आपदा पीड़ितों को अस्सी किलो राशन कम पहुंचा।
इसकी चिंता न बेशर्म पत्रकारों को थी और न ही अपनी वाहवाही में मस्त सरकार के प्रतिनिधियों को। दिल्ली के एनडीटीवी के पत्रकार केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत के साथ हैली में फिर रहे थे तो आज तक, आईबीएन 7, एवीपी न्यूज, जीटीवी, ईटीवी सहित अन्य चैनल यह देख रहे थे कि किस नेता, अफसर के हैली में उनको जगह मिल जाय। उत्तराखंड सरकार से विज्ञापन ही नहीं विज्ञापन पैकेज के रूप में करोड़ों बटोरने वाले इन चैनल और अखबारों की नीयत इतनी गिर चुकी थी कि आपदा की घटना के दस दिन बाद ही सरकारों के गुणगान के करोड़ों रूपये के विज्ञापन और आपदा पीड़ितों की हालत के विज्ञापन इनके चैनलों और अखबारों में नजर आने लगे थे। अखबारों के द्वारा देश के तमाम काले धंधों में लिप्त मीडिया घरानो ने आपदा के दौरान भी उत्तरखंड सरकार के साथ साठगांठ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उत्तराखंड के टीवी चैनलों में सरकार के खिलाफ दिये जाने वाले बाइट गायब हो गये थे। टीवी चैनलों के स्थानीय मीडियाकर्मी कहने लगे थे कि केवल घटना का जिक्र बाइट में किया जाय, तभी चलेगी।
सरकार के खिलाफ दी जाने वाली बाइट को डेस्क से ही गायब कर दिया जा रहा है। वर्श 2010 में जब आपदा की घटना घटी थी तो ईटीवी के उत्तराखंड ब्यूरो प्रमुख तत्कालीन मुख्यमंत्री निशंक के साथ बिना कैमरे के हैली में घूम रहे थे। ऐसा लग रहा था कि ये टीवी पत्रकार न होकर निशंक के पीआरओ हैं। तब हालत यह थी कि ईटीवी में सायं के समाचार पैकेज में पटवारी की जगह निशंक की ही बाइट चल रही थी। इस बार भी आपदा के बाद बहुगुणा सरकार पर शुरुआती दिनों में मीडिया का हमला रहा। क्योंकि मुख्यमंत्री आपदा के बाद दिल्ली चले गये थे और प्रधानमंत्री मनमोहन और सोनिया गांधी उत्तराखंड में हैली से मुआयना कर रहे थे। आपदा की त्रासदी के बाद हुई कैबिनेट की बैठक में सरकार का रूख भी आपदा विरोधी रहा था। इन सब सरकार विरोधी खबरों के बीच जैसे ही हैलीकाप्टर उत्तरखं डमें पहंुचने लगे तो मीडिया बहुगुणा सरकार के गुणगान में जुट गयी। हैलीकाप्टरों ने विपक्ष के विधायकों को भी लुभाने में सरकार की पूरी मदद की। प्रतिपक्ष के नेता अजय भट्ट भी राज्य सरकार के हैली में घूमते रहे।
पिथौरागढ़ जिले के धारचूला में सरकारी हैली से पहुंचे भट्ट ने हैलीपैड में ही अधिकारियों से बात की और उड़कर वापसी कर ली। स्थानीय भाजपा के नेताओं को दो घंटे बाद पता चला कि उनके नेताजी आये थे और चले गये। शायद भट्ट को इस बात की डर रही होगी कि हैली उन्हें घारचूला में ही न छोड़ दे या फिर कहीं मौसम खराब न हो जाय। भारतीय सेना भी पत्रकारों पर डोरे डालती रही। केदार घाटी में रेस्क्यू का कार्य सेना के हवाले था और हैली भी।सेना के अफसर पत्रकारों को देखते ही हैली में बैठने का ईषारा कर अपने साथ ले जा रहे थे और उनके चैनल और अखबार का नाम पूछने के साथ ही समय भी पता कर रहे थे कि कब वे अपने को टीवी में देख पायेंगे। अक्सर सेना से पत्रकार व नेता खफा रहते हैं क्यों कि वे उन्हें घास नहीं डालते हैं। इस बार सेना पत्रकारों पर मेहरबान रही।
भाकपा माले के राज्य कमेटी सदस्य इंद्रेश मैखुरी बताते हैं कि जब वे केदार घाटी में पहुंचे तो उनके गले में कैमरा लटका हुआ था, सेना के अफसर ने उन्हें पत्रकार समझकर ईशारा कर उन्हें बुला लिया और कहा कि सर क्या आपको इस रस्सी से नदी पार करवा दें! तकि आपकी अच्छी फोटो बन जायेगी। और उसने सेना के जवानों के द्वारा किये जा रहे कार्यों को कैमरे में कैद करने और अपने अधिकारी का मेल आईडी उन्हें थमा दिया कहा कि इन सभी फोटोग्राफों को मेल में डाल दें। क्योंकि आज हम कैमरा लाना भूल गये हैं। इतना ही नहीं मैखुरी से अखबार का नाम भी पूछा और कहा कि अपने अखबार में भी हमारी फोटो लगवा दें। सेना भी मीडिया के द्वारा हो रहे प्रचार में स्वयं को आगे करने में जुटी हुई थी। सरकार और सेना पत्रकारों पर इस कदर मेहरबान थी। पिथौरागढ़ में प्रिंट मीडिया के पत्रकारों ने कुमाउ कमिश्नर के पत्रकार वार्ता का बहिष्कार कर दिया। इसके पीछे यह बात थी कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार हवाई यात्रा कर चुके थे और बेचारे प्रिंट वाले छूट गये थे।
डीएम को जब पता चला तो उसने मीडिया को देख रहे एसडीएम सदर नरेश दुर्गापाल को लताड़ लगायी और मीडिया को मनाने को कहा। उसके बाद पिथौरागढ़ के पत्रकार तो रहे उनके दोस्तों को भी हैली में धूमने का मौका मिला। उत्तराखंड के आपदा पीड़ितों को निकालने के अभियान तथा राषन पहंुचाने के कार्य में अगर किसी ने सबसे अधिक रूकावट पैदा की है तो वह मीडिया है। हैली के सफर का मौका केवल टीवी चैनल और दैनिक अखबारों के पत्रकारों को ही दिया गया। साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक सहित कम प्रसार वाले जनपक्षीय अखबारों को इस यात्रा से वंचित रखा गया। देहरादून में कई साप्ताहिक अखबारों से सूचना अधिकारियों ने यहां तक कह डाला कि आप लोग तो अखबार पढ़कर खबर बना लेना। आपका अखबार तो कल नहीं छपना है। जनता के संसाधनों से चलने वाले मीडिया ने हांलाकि हैली की जगह पैदल यात्रा कर आपदा प्रभावितों के दुख दर्द को सामने लाने का अभियान जारी रखा। एक पत्रकार ने तो यहां तक कहा कि वह पटवारी नहीं है जो हैली जाकर सरकारी आंकलन करेगा। उसका कहना था कि सरकार की जगह समाचार पत्र के संस्थानों को रिपोर्टिंग के लिये सुविधाऐं उपलब्ध करानी थी।
आज तक चैनल ने तो हर घाटी में अपने पत्रकार उतार दिये थे दो घंटे रिपोर्टिंग के बाद इन पत्रकारों को इंटरनेट वाली सुविधाजनक जगह पर पहंुचाना सेना और सरकार का प्रमुख कार्य बन गया था। चाहे आपदाग्रस्त क्षेत्रों में जारी अभियान ही क्यों न रूक जाये। लेकिन पत्रकार साहब तो पत्रकार ही ठहरे। हैली सेवा का चालीस प्रतिशत आनंद पत्रकारों ने उठाया। आज पत्रकार इतने प्रसन्न है कि उत्तराखंड में हर वर्ष इसी तरह की आपदा की कामना कर रहे हैं।
उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के वरिष्ठ प्रान्तीय उपाध्यक्ष और भाकपा माले नेता जगत मर्तोलिया की रिपोर्ट.






