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भाजपा के लिए काम कर रही है पीस पार्टी!

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव बेहद नजदीक होने के साथ ही सर्द मौसम में राजनीतिक पार्टियों की सरगर्मियां बेहद गरम हो गई हैं। कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों के लिए 4.5 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा करके माहौल को और ज्यादा गरम कर दिया है। बसपा तो कांग्रेस के इस कदम से ''सकते'' की हालत में लगती है। किसी भी तरीके से सभी राजनीतिक दलों को मुसलमानों के वोट दरकार है। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी भी मुस्लिम वोटों का मोह नहीं त्याग पा रही है। ऐसा हो भी क्यों नहीं, उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट 18 से 20 प्रतिशत तक हैं। यह वोट प्रदेश की लगभग 130 विधानसभा सीटों पर निर्णायक सिद्ध होते हैं।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव बेहद नजदीक होने के साथ ही सर्द मौसम में राजनीतिक पार्टियों की सरगर्मियां बेहद गरम हो गई हैं। कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों के लिए 4.5 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा करके माहौल को और ज्यादा गरम कर दिया है। बसपा तो कांग्रेस के इस कदम से ''सकते'' की हालत में लगती है। किसी भी तरीके से सभी राजनीतिक दलों को मुसलमानों के वोट दरकार है। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी भी मुस्लिम वोटों का मोह नहीं त्याग पा रही है। ऐसा हो भी क्यों नहीं, उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट 18 से 20 प्रतिशत तक हैं। यह वोट प्रदेश की लगभग 130 विधानसभा सीटों पर निर्णायक सिद्ध होते हैं।

बसपा, सपा और कांग्रेस मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में करने लिए हरसंभव कोशिश कर रही हैं। फिलहाल तो ऐन वक्त पर आरक्षण का तीर छोड़कर कांग्रेस ने बाजी मार ली है। आरक्षण दिए जाने की खबर लगते ही कांग्रेस के घोर विरोधियों के भी सुर बदले हुए लग रहे हैं। राममंदिर के बाद मुद्दे की तलाश में भटक रही भाजपा को भी अपनी जुबानी जंग तीखी करने का अच्छा मौका मिल गया है। अब भाजपा मतों के ध्रुवीकरण में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। बिना ध्रुवीकरण के उसकी राजनीति चलती भी नहीं। अब तक मुस्लिम वोटर भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए सूबे की कथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष पार्टियों, सपा, कांग्रेस और बसपा को वोट करता रहा है, लेकिन इस बार स्थिति ऐसी नहीं है। भाजपा का 20 साल पहले जैसा डर अब मुस्लिम वोटर के दिल में नहीं है। अब वह उसी पार्टी के साथ जाएगा, जो उनके वास्तविक विकास की बात करेगा।

1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुसलमानों का कांग्रेस से मोह भंग हुआ। इसी कारण कांग्रेस तभी से उत्तर प्रदेश में बियाबान में भटक रही है। मुलायम सिंह यादव को उन्होंने अपना रहनुमा बनाया, लेकिन वे मुस्लिम वोट लेकर यादवों को भला करते रहे। बाद में उन्होंने कल्याण सिंह को गले लगाया, जिसकी कीमत उन्हें मुसलमानों की नाराजगी झेलकर उठानी पड़ी।
उन्होंने मुसलमानों से माफी भी मांगी, जिसका कोई मतलब नहीं रह गया था। मुसलमानों ने माफ किया भी नहीं। बसपा ने भी मुस्लिम वोट लेकर सत्ता तो ली, लेकिन सत्ता में भागीदारी देने के नाम पर कुछ मुस्लिम चेहरों को नवाजा। उन चेहरों ने सिर्फ अपना ही भला किया। आम मुसलमान को सत्ता में भागीदारी नहीं मिली। इसी वजह से मुसलमानों में अपना नेतृत्व खड़ा करने का जोश भरा।

इसी जोश में कई राजनीतिक दल वजूद में आए, जो कहते हैं कि सबको आजमाने के बाद हमें आजमाया जाए। इनमें पीस पार्टी सबसे आगे नजर आती है। 2010 में हुए डुमरियागंज उपचुनाव में उसने सपा और कांग्रेस के कुल वोटों से भी ज्यादा वोट लेकर अपनी ताकत का एहसास कराया। यह अलग बात है कि उसे कुल मिले वोटों में मुस्लिम वोट ही थे। पीस पार्टी के साथ दिक्कत यह है कि मुसलमानों में उसके बारे में यह धारणा बनती जा रही है कि वह भाजपा के लिए काम कर रही है। इसके पीछे कारण भी हैं। उनके भाषणों और बयानों में सबसे ज्यादा तीर बसपा, सपा और कांग्रेस पर ही छोड़े जाते हैं। भाजपा के लिए उसमें एक 'सॉफ्ट कॉर्नर' नजर आता है। हालांकि पीस पार्टी दूसरे समुदायों को भी टिकट देकर अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि गढ़ने में लगी है, लेकिन दूसरे समुदाय को वोट उसे इसी तरह नहीं मिलेगा, जिस तरह भाजपा को मुस्लिम वोट नहीं मिलता है।माना यही जा रहा है कि पीस पार्टी जैसे राजनीतिक दल मुस्लिम वोटों को बरबाद ही करेंगे। वोटों की यह बरबादी सपा और कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचाएगी और भाजपा को फायदा।

अजीत सिंह का राष्ट्रीय लोकदल जाट-मुस्लिम समीकरण के सहारे चुनाव में ताल ठोंकेगा। लेकिन मुस्लिमों को आरक्षण मिलने और जाटों की उपेक्षा से समीकरण गड़बड़ा भी सकता है। मुसलमान भी अभी 2009 में हुए लोकसभा की मुजफ्फरनगर सीट का चुनाव भूले नहीं हैं। उस वक्त रालोद का भाजपा से गठबंधन था। अजीत सिंह ने अपनी खास सहयोगी अनुराधा चौधरी को जिताने के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मुजफ्फरनगर बुलाया था। पूरे शहर में जो पोस्टर लगाए गए थे, उनमें अजीत सिंह और अनुराधा चौधरी के साथ नरेंद्र मोदी की भी बड़ी तस्वीर लगाई गई थी। यही वजह रही कि मुसलमानों ने अनुराधा चौधरी को वोट नहीं दिया और उन्हें जबरदस्त हार का मुंह देखना पड़ा था। अजीत सिंह का जनाधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही है। यदि यहां के मुसलमान अभी भी 2009 के लोकसभा चुनाव को नहीं भूले हैं, तो उनके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। हालांकि अभी पक्के तौर पर कहना मुश्किल है कि मुस्लिम वोट कहां जाएगा, लेकिन इतना तय है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोट निर्णायक होने जा रहे हैं। हमेशा की तरह। हालिया मुस्लिम आरक्षण के कार्ड में अन्य दल वोटों की इस लगभग कामयाब लगती कांग्रेसी काट के लिए क्या रणनीति अपनाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी ब्लागर और जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों वो मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी से जुड़े हुए हैं.

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