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सुख-दुख...

मैं अपने अपमान और धमकी का मामला राजुल माहेश्‍वरी और केंद्रीय संपादकों तक ले जाऊंगा : शंभू दयाल वाजपेयी

Shambhu Dayal Vajpayee : अमर उजाला , बरेली ने मेरे बारे में कल जिस तरीके से व्यक्तिगत हमला करते हुए द्वेषपूर्ण – अपमानकारी छापा है और 'कपडे उतार लेने' की धमकी दी हैं उससे मेरा परिवार बेहद परेशानी में है। पत्‍नी अवसाद में हैं । दोनों बच्‍चे सहमे हैं और डरे हैं कि अमर उजाला वाले पता नहीं क्‍या करवा दें। मैं लगभग 22 -23 वर्षों से सपरिवार बरेली आवासित हूं और यहां तथा निकटवर्ती जिलों में और खास कर कुमाऊं में एक ठीक ठाक पहचान रखता हूं। अच्‍छे सामाजिक और पत्रकारी संबंधों का दायरा है। दर्जनों ऐसे वरिष्‍ठ पत्रकार और संपादक हैं जिनको अखबार में रखवाने और सिखाने में कभी मददगार बना हूं।

Shambhu Dayal Vajpayee : अमर उजाला , बरेली ने मेरे बारे में कल जिस तरीके से व्यक्तिगत हमला करते हुए द्वेषपूर्ण – अपमानकारी छापा है और 'कपडे उतार लेने' की धमकी दी हैं उससे मेरा परिवार बेहद परेशानी में है। पत्‍नी अवसाद में हैं । दोनों बच्‍चे सहमे हैं और डरे हैं कि अमर उजाला वाले पता नहीं क्‍या करवा दें। मैं लगभग 22 -23 वर्षों से सपरिवार बरेली आवासित हूं और यहां तथा निकटवर्ती जिलों में और खास कर कुमाऊं में एक ठीक ठाक पहचान रखता हूं। अच्‍छे सामाजिक और पत्रकारी संबंधों का दायरा है। दर्जनों ऐसे वरिष्‍ठ पत्रकार और संपादक हैं जिनको अखबार में रखवाने और सिखाने में कभी मददगार बना हूं।

अमर उजाला में छपे आइटम को लेकर लोग पूछते हैं तो जवाब नहीं दे पा रहा । मानसिक और भावात्‍मक रूप से आहत – व्यथित हूं। इसलिए और अधिक क्‍योंकि अमर उजाला जैसे बडे अखबार ने छापा है। अशोक अग्रवाल और अतुल माहेश्‍वरी के जमाने में यह अखबार पश्चिमी उप्र का सर्वाधिक प्रतिष्ठित अखबार था लेकिन इस का स्‍तर क्‍या हो गया है इस का सहज अंदाजा मेरे बारे में छपे आइटम से ही लगाया जा सकता है। मैं देश के संपादकों- पत्रकारों और चिंतनशील बुद्धिजीवियों से विनम्र अनुरोध करना चाहता हूं कि वे इस ' आइटम' की भाषा – भंगिमा को पढ- देख कर यह बताने का अनुग्रह करें कि क्‍या यह अनुमन्‍य अखबारी – पत्रकारी भाषा है ? मैं इसे पंपलेटी भाषा और शैली मानता हूं । बेहतर होता कि ये अपने उद्देश्‍यपूर्ति के लिए मेरे बारे में पंपलेट -पर्चे छपवा कर बंटवा देते।

जीवन में आरोप वगैरह लगते रहते हैं। अकारण भी लोग निजी तौर पर वैर भाव – दुश्‍मनी मान लेते हैं। लेकिन एक बडा अखबार इस स्‍तर पर उतर आयेगा , यह मेरे लिए अकल्‍पनीय है। मैं इस बात से और विस्मित हूं कि इसके संपादक दिनेश जुयाल के साथ मैंने अमर उजाला , कानपुर में करीब 20 वर्ष पहले काम किया है और तब से उनके हमारे बीच निजी पारिवारिक रिश्‍ते हैं। आना -जाना है। मेरे विचार , पारदर्शी रहन सहन वगैरह के बारे में कमोबेश भलीभांति वाकिफ हैं।इसके सिटी चीफ पंकज सिह से भी तीन चार साल से सम्‍पर्क है। वह मेरे आवास आते रहे और सम्‍मान भाव ही प्रदर्शित करते रहे हैं। मैं आजन्‍म बिकने वाला रहा हूं यह बात इसके पहले इन्‍होंने पहले कभी क्‍यों नहीं बतायी । बताते तो अपना संबंध – धर्म ही निभाते ।

अब महज इस लिए कुपित हो गये कि मैं ने शहर के सब से बडे अस्‍पताल गंगाशील को मनमाने ढंग से बंद करा दिये जाने के खिलाफ फेस बुक पर लिखा और उसे सब से बड़ी मीडिया वेबसाइट भडास4 मीडिया ने भी छापा। भाई मैंने अपने लिखे में अमर उजाला या इसके किसी पत्रकार भाई का नाम तो लिया नहीं था। मामले को छाप तो नगर के अन्‍य प्रमुख अखबार दैनिक जागरण और हिंदुस्‍तान भी रहे थे। आपने तो नाहक ही मुझ बेरोजगार पत्रकार पर अपने अखबार की तोप तान दी।

मैं एक जागरूक भारतीय नागरिक और पत्रकार होने के नाते अपने अभिव्‍यक्ति की संवैधानिक सीमाओं और अधिकारों से से परिचित हूं। आप जो कहें और आपका अखबार जो लिखे उसी पर अक्षरस: सब ताली पीटें । आपके ही चश्‍मे से चीजों को देखा जाय अन्‍यथा आप धो देंगे, मिट्टी में मिला देंगे , कपडे उतार लेंगे । अपने इस कृत्‍य को आप पत्रकारिता का धर्म मानते रहें । मैं इसे अभिब्‍यक्ति की आजादी पर हमला मानता हूं। अमर उजाला की स्‍वेच्‍छाचारिता और अखबारी आपराधिक आतंक मानता हूं।

अमर उजाला के दिये ताप-संताप से किंचित उबरने के बाद मैं अपने अपमान और धमकी का मामला इसके मालिक राजुल माहेश्‍वरी और केन्‍द्रीय संपादकों तक ले जाऊंगा। यह बताने के अनुरोध और अपेक्षा के साथ कि क्‍या इसे वे सही मानते हैं। अगर नहीं तो क्‍या कार्रवाई करते हैं। यदि हां, तो मुझे यह समझने में सुविधा होगी कि अखबार में कुछ भी और किसी भी ढंग से किसी के बारे में लिखा -कहा जा सकता है।

मैं एक साल से आजीविका की दृष्टि से खाली जरूर हूं लेकिन पत्रकारी पेशे और जरूरत से टायर्ड- रिटायर्ड नहीं हूं। अपने मन माफिक ही काम करने का आदी हूं, नौरी का नहीं। दो तीन जगह बातचीत चला रहा हूं। दो तीन महीने में कहीं बैठे होने की उम्‍मीद है। आप से मिला ज्ञान तब मेरे काम आ सकता है। कहीं मदद न मिले तो हारे को हरिनाम, अदालत का आश्रय भी है। आप जैसे सर्व समर्थ – सम्‍पन्‍न संस्‍थान से मुकदमा लडने को मेरे पास आजकल पैसे नहीं है। इसलिए बरेली बार एसोसिएशेन से जा कर नि:शुल्‍क कानूनी सहायता दिलवाने का अनुरूध करूंगा।

एक बात से शायद आप जान कर अनजान बने हैं। अखबारों ने मुझ से मुक्ति नहीं पायी है। मैंने दैनिक जागरण से रिटायरमेंट की आयु 58 साल पूरी करने से तीन महीने पहले इस्‍तीफा दिया था। एक तो परिवार बरेली और मैं गोरखपुर था। दूसरे बरेली में बरेली में नये अखबार 'नमस्कार बरेली' की योजना बनी थी। मैं कल अपने गांव घर से लेकर यहां तक की कुल सम्‍पत्ति घोषित करूंगा। अमर उजाला से अपेक्षा करूंगा कि वह उसकी पूरी जांच करवा ले। 26 साल की अखबार की नौकरी के बाद मेरे पास क्‍या है और इस अवधि में उसके लोगों के पास क्‍या है, अमर उजाला को घोषणा करनी चाहिए। आपकी सलाह / धमकी और मंशा पर बिंदुवार उत्‍तर कल।

अमर उजाला में जो छापा गया है, वह यहां है, क्लिक करके पढ़ें- Amar Ujala Dhamki

वरिष्ठ पत्रकार शंभू दयाल वाजपेयी के फेसबुक वॉल से.

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