तेलंगाना के गठन का रास्ता साफ होने लगा, तो देश के कई हिस्सों में नए राज्यों के लिए दबाव बढ़ने जा रहा है। खासतौर पर गोरखालैंड की मांग कर रहे नेताओं ने अपनी सक्रियता दिखानी शुरू कर दी है। पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग में अलग गोरखालैंड बनाने की मांग सालों से चली आ रही है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा लंबे समय से इसके लिए आंदोलनरत रहा है। तेलंगाना के मुद्दे से उत्साहित होकर जीएमएम ने सोमवार से गोरखालैंड की मांग के लिए 72 घंटे के बंद का आयोजन भी कर डाला। इसी तरह से असम के उत्तरी हिस्सों के कई जिलों को मिलाकर पृथक बोडोलैंड बनाने की मांग हो रही है। दरअसल, इस इलाके में बोडो आदिवासियों का बाहुल्य है।
ये लोग लंबे समय से अपने लिए अलग राज्य की मांग करते आए हैं। इस मुद्दे पर कई बार हिंसक आंदोलन भी हो चुके हैं। महाराष्ट्र में विदर्भ राज्य की मांग लंबे समय से लंबित है। नागपुर के आसपास के इलाके अपने लिए विदर्भ राज्य चाहते हैं। लेकिन, राज्य के विभाजन के खिलाफ शिवसेना, कांग्रेस व एनसीपी का नेतृत्व है। ऐसे में, विदर्भ की मांग को ज्यादा गति नहीं मिल पाई। लेकिन, सामाजिक आर्थिक जानकारों का मानना है कि विदर्भ राज्य की मांग कई कारणों से एकदम उचित मानी जा सकती है। रालोद के प्रमुख अजित सिंह छोटे राज्यों के प्रबल समर्थक हैं। उन्होंने यूपीए की बैठक में कल तेलंगाना के फैसले को एकदम जायज ठहराया था। वे तो कहते हैं कि छोटे राज्यों के गठन से विकास की नई संभावनाएं बनेंगी। अजित सिंह, विदर्भ की मांग को भी एकदम जायज मानते हैं। वे उत्तर प्रदेश के और विभाजन के प्रबल पैरवीकार हैं। उनकी पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हरित प्रदेश के नाम से नए राज्य का दर्जा दिलाने के लिए आंदोलनरत भी है। अजित सिंह, तेलंगाना के गठन के फैसले को बहुत शुभ बता रहे हैं।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





