Vishwa Deepak : बात 2010 की है. जुलाई का दूसरा–तीसरा सप्ताह था. हंस की एक चर्चित कॉलमकारा ने कई बार फोन कर आग्रह किया कि मुझे 'प्रगतिशील मासिक' के संपादक के दरबार में हाजिरी लगानी चाहिए. उनसे माफी मांगनी चाहिए. हालांकि उन्होंने माफी शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था लेकिन उनका तात्पर्य यही था.
जिस आत्मविश्वास से वो 'हंस' की तरफ से बात कर रही थीं उससे जाहिर था कि उन्हें इसके लिए नियुक्त किया गया था. इसके पहले मैंने बस उनका नाम सुना था. बातचीत और मेल मुलाकात का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. उस दौरान मैं 'आजतक' में था. मैंने कहा कि 31 जुलाई को हंस का सालाना जलसा हो जाने दीजिए. इसके बाद मिलूंगा.
इस बात से हिंदी के कुछ प्रगतिशील दलित–प्रगतिशील चिंतक इतने व्यथित हुए कि उन्होंने एक गिरोह (हां, गिरोह जो अब टूट चुका है) का गठन किया और राजेन्द्र यादव को अपना(हिंदी समाज का) समर्थन पत्र देने पहुंचे ताकि प्रगतिशीलता का सोता सूखे न और लोकतंत्र का दरिया बहता रहे.
ज्ञानी लोग बताते हैं कि जब इतिहास खुद को पहली बार दोहराता है तो उसे त्रासदी कहते हैं लेकिन जब दूसरी बार दोहराव होता है तो वो तमाशा बनकर आता है. खुद को 'हिंदी साहित्य का विलेन' कहने वाले राजेन्द्र यादव पिछले कई सालों से यही कर रहे हैं. उन्होंने 2010 में भी ऐसे ही किया था. इसी लोकतांत्रिकता का तर्क उन्होंने उस वक्त भी दिया था. नाम दिया था–वैदिकी हिंसा न हिंसा भवति. हम लोगों ने इसे 'जनज्वार' पर उठाया. Neelabh Ashk ने अरूंधति को सूचना दी.
जाहिर था अरूंधति को विश्वरंजन के साथ मंच शेयर नहीं ही करना था. उसी समय माओवादी नेता आजाद और पत्रकार हेमचंद्र पांडे की मौत का मामला भी गरम था. आलोक मेहता के खिलाफ भी जबरदस्त हूटिंग हुई और उन्हें सभागार से भागना पड़ा था. गूगल में खोजने पर 'जनज्वार' में तो नहीं मिला. 'हाशिया' का लिंक लगा रहा हूं. हिंदी समाज में कोई भी सांस्कृतिक उत्थान बिना पुराने मठों को गिराए नहीं होगी. फिर वो चाहे प्रगतिशीलता के ही क्यों न हो. साथ ही उम मीडियॉकर्स को भी पहचानने की जरूरत है जो साहित्य-समाज-राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय हैं.
विश्व दीपक के फेसबुक वॉल से.





