एक पत्रकार होने के नाते मैंने मध्यप्रदेश में शाम के समाचार पत्र प्रदेश टुडे की भोपाल में भी शुरुआत देखी, जबलपुर में भी नजारा देखा और अब ग्वालियर में भी इसकी री लॉचिंग (पूरा ग्वालियर शहर प्रदेश टुडे के लोकार्पण के बैनर-होर्डिंग्स से पाट दिया गया था पर जब भड़ास ने पोल खोली की यह लोकापर्ण नहीं री-लॉचिंग है तब लोगों को हकीकत पता चली और इन्होंने भी गलती सुधारी और लिखने लगे री-लॉचिंग) देखने का मौका मिला। जैसी कि इनकी रणनीति रहती है कि अखबार शुरू होने से पहले ही प्रदेश भर में लोगों को एसएमएस करके बताने लगते हैं कि हमारी इतनी हजार तो प्री पेड कॉपी बुक हो गई हैं।
भोपाल में तो दावा करने लगे थे कि दैनिक भास्कर के बाद सर्कुलेशन में यदि कोई अखबार है तो वह प्रदेश टुडे ही है। असलियत अब भोपाल वालों को भी दिख गई है। ऐसा ही दृश्य जबलपुर में देखने को मिला था। वहां भी लोगों को मोबाइल पर थोक में एसएमएस करके अपने प्रीपेड ग्राहकों की संख्या अनाप-शनाप बताई गई थी। कोशिश यह बताने की की गई थी कि जबलपुर में तो हम ही नंबर बन हैं। जबलपुर की स्थिति अब पंकज पटैरिया ही बता सकते हैं। ऐसा ही कुछ ग्वालियर में हुआ। मोबाइल नंबर 99935-69996 से एसएमएस करके 18 जुलाई 2013 को लोगों को बताया गया कि ग्वालियर में 22746 तो हमारे प्रीपेड ग्राहक बन चुके हैं।
लेकिन लोगों को इस पर यकीन इसलिए नहीं हुआ क्योंकि ग्वालियर शहर छोटा और सभी अखबारों के दफ्तर आपस में काफी आसपास हैं। इनके दावे की हवा निकली उस अखबार से जहां से प्रदेश टुडे के प्रकाशन का कॉन्ट्रेक्ट हुआ है। इस अखबार का दफ्तर लश्कर में है और प्रिटिंग यूनिट विक्की फैक्ट्री के पास लगी है। वहां से खबर आई कि सिर्फ छह हजार कॉपियां छापने का करार हुआ है। पैसा एडवांस में लिया गया है। कागज भी हमारा नहीं है। हम तो सिर्फ अखबार छापकर देंगे। बंडल बनाने के लिए भी प्रदेश टुडे को अपना स्टॉफ झोंकना पड़ेगा। यह हवा ग्वालियर के वातावरण में इतनी तेजी से घुली कि आंकड़ों के दम पर प्रदेश टुडे को ग्वालियर में वैसी छाती चौड़ी करने का मौका नहीं मिला जैसा इन्होंने भोपाल-जबलपुर में अपने आप हासिल कर लिया था।
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.






