लखनऊ। लम्बे समय से सियासी मुद्दा बने अलग तेलंगाना राज्य को गठित करने का फैसला कर के कांग्रेस ने अपनी चुनावी चाल चल दी। मगर उत्तर प्रदेश की सियासत में बिभाजन के मुद्दे का रंग भरना अभी बाकी है। हांलाकि बी एस पी सुप्रीमो ने तेलंगाना का समर्थन करते हुए इसकी शुरुआत कर दी। मायावती ने छोटे राज्यों और प्रशासनिक इकाइयों को बाबा साहेब आंबेडकर की सोच के अनुरूप बताया। वह यह बताने से भी नहीं चुकी की उनकी सरकार ने यु पी को चार राज्यों में बांटने का प्रस्ताव दिया था। पृथक तेलंगाना राज्य के गठन को केन्द्र सरकार की हरी झंडी के बाद अब चुनावी माहौल मे उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांग के जोर पकडने की संभावना है।
उत्तर प्रदेश में भी जब तब अलग राज्य का मुद्दा गर्माता रहा है। पश्चिम में चौधरी अजित सिंह ने कुछ समय पहले बहुत जोर शोर से हरित प्रदेश का मुद्दा उठाया था। तब पश्चिम के कई जिलो में आन्दोलन भी भड़के थे। हरित प्रदेश का नक्शा भी जारी हुआ था। मगर चुनावों के बाद अजित सिंह ने कांग्रेस से हाथ मिला लिया और हरित प्रदेश का आन्दोलन ठंढे बसते में चला गया। आज पश्चिम में सिर्फ हाई कोर्ट की पीठ का मामला ही कभी कभी सुर्खियों में आ जाता है। हरित प्रदेश आन्दोलन का जमीन से ले कर असमान तक कही पता नहीं है। अब तेलंगाना के गठन के बाद अजित हरित प्रदेश का मुद्दा फिर उठा सकते हैं क्योंकि उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का जनाधार हालिया दिनों में काफी गिरा है और हरित प्रदेश के बहाने वे इसे बचने की कोशिश कर सकते हैं।
सबसे गंभीर मांग अलग बुंदेलखंड राज्य की है। प्रदेश में सबसे पुरानी मांग भी बुंदेलखंड की ही रही है मगर यह आन्दोलन भी कभी परवान नहीं चढ़ पाया। सिने कलाकार रजा बुंदेला ने इस मांग को हवा दी और अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग के एजेंडे के साथ राजनितिक दल भी बनाया। मगर चुनावो में बुन्देली जनता ने उन्हें कोई समर्थन नहीं दिया। बुंदेलखंड के बुद्धिजीवियों ने इसके लिए जरूर कुछ ठोस पहल की मगर कोई जनांदोलन नहीं खड़ा हो सका।तेलंगाना पर फैसला होने के बाद बुंदेलखंड राज्य के समर्थन में नेताओं के बयानों की झड़ी लग गई है. लेकिन ये मांग कितनी हवा-हवाई है इसे नेताओं के संसद में किए आचरण से देखा जा सकता है.मौजूदा लोकसभा में बुंदेलखंड क्षेत्र के बारे में 14 सवाल पूछे गए, लेकिन उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड वाले इलाके के एक भी सासंद ने लोकसभा में अलग बुंदेलखंड राज्य बनाने के विषय पर कोई सवाल नहीं किया. राज्यसभा में बुंदेलखंड से जुड़े तीस सवाल पूछे गए. इसमें बीएसपी के पूर्व राज्यसभा सांसद गंगाचरण राजपूत ने ही दिसंबर 2009 में एक बार अलग बुंदेलखंड राज्य के बारे में सरकार से सवाल किया था. 31 जुलाई से झांसी से अलग बुंदेलखंड की मांग नए सिरे से उठाने जा रहे राजपूत ने 2011 में इस बारे में प्राइवेट मेंबर बिल भी पेश किया था.
अलग पूर्वांचल राज्य के लिए भी कई कोशिशें हुयी। समाजवादी नेता शतरुद्र प्रकाश ने इस पर एक पुस्तक भी लिखी, बनारस से ले कर गोरखपुर तक कई सम्मलेन भी हुए मगर उनकी पार्टी ही इस मांग के विरूद्ध खड़ी होने की वजह से वे भी शांत पड़ गए। समय समय पर नए गुटों ने पूर्वांचल का मुद्दा उठाने की कोशिश की मगर उसे सामाजिक राजनितिक रूप नहीं दे सके। बहुजन समाज पार्टी. भारतीय जनता पार्टी तथा राष्ट्रीय लोकदल छोटे राज्यो के पक्षधर हैं जबकि कांग्रेस का रवैय्या इस मुद्दे पर लगभग उदासीन रहा है। प्रदेश की सत्तारुढ समाजवादी पार्टी हालांकि हमेशा से ही इसके विरोध मे रही है। प्रदेश के
वरिष्ठ मंत्री और पार्टी प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी का कहना है कि सपा प्रदेश विभाजन का विरोध करेगी क्योकि आजादी के बाद से इस मांग को लेकर कोई बहुत बडा आन्दोलन कभी नहीं हुआ और उनका दल तो उत्तराखण्ड बनाये जाने का भी पक्षधर नहीं था। अब जब मायावती ने उत्तर प्रदेश के विभाजन के लिए अपने पुराने प्रस्ताव को फिर दोहराया है ऐसे में क्या यह राजनेतिक एजेंडा बन पायेगा इसमें संदेह है।
लेखक उत्कर्ष सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक चिंतक हैं.





