कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने आंध्र प्रदेश को विभाजित करके अलग तेलंगाना राज्य गठित करने का फैसला लिया है। इस मुद्दे को लेकर पिछले पांच दशकों से आंदोलन चलता आया है। कई बार इस मांग को लेकर खूनी तांडव भी हो चुका है। दावा तो यहां तक किया जा रहा है कि इस आंदोलन के चलते 500 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। उग्र आंदोलनों के चलते पूरे प्रदेश में कितनी संपत्ति आज तक स्वाहा हुई है? इसका तो हिसाब लगाना भी मुश्किल है।
लंबे संघर्ष के बाद सरकार ने तेलंगाना का फैसला लिया, तो इस क्षेत्र के 10 जिलों में जश्न का माहौल देखने को मिल रहा है। जबकि, आंध्र के बाकी हिस्सों में स्यापा जैसी स्थिति बनी हुई है। लोग भारी गुस्से में हैं। कोई बड़ी अनहोनी न हो पाए, इसके लिए दिल्ली और हैदराबाद की सरकारों ने सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त किए हैं। लेकिन, कोई नहीं जानता कि तेलंगाना गठन की पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्ण माहौल में हो भी पाएगी या नहीं?
अब यह तथ्य किसी से छिपा नहीं रहा कि कांग्रेस नेतृत्व ने चुनावी राजनीति के समीकरणों को देखते हुए तेलंगाना का फैसला इस मौके पर लिया है। क्योंकि, कई कारणों से कांग्रेस के लिए आंध्र की राजनीति ‘डूब’ की ओर बढ़ती दिखाई पड़ रही थी। ऐसे में ही नेतृत्व ने तेलंगाना का फैसला ले लिया है। माना जा रहा है कि इस फैसले से कम से कम 17 संसदीय सीटों वाले क्षेत्र में पार्टी अपनी मजबूत स्थिति बरकरार रखने में सफल रहेगी। 2009 के चुनाव में यहां पर पार्टी को 12 सीटों पर सफलता मिली थी। इस चुनाव में पूरा आंध्र प्रदेश ही कांग्रेस के लिए बड़ा ‘लकी’ साबित हुआ था। क्योंकि, यहां की कुल 42 सीटों में से 33 उसकी झोली में आ गई थीं। यूपीए-2 सरकार के गठन में कांग्रेस के लोग आंध्र की सफलता का बड़ा योगदान मानते हैं। लेकिन, पिछले वर्षों में पार्टी के लिए यहां के हालात लगातार खराब होते आए हैं। खास तौर पर वाईएसआर राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद यहां कांग्रेस के लिए दुर्दिन शुरू हुए। कोई नहीं जानता कि तेलंगाना का दांव चलने के बाद भी यहां कांग्रेस की कितनी चुनावी जमीन बच पाएगी?
दरअसल, 2009 में ही आंध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं दिग्गज कांग्रेसी वाईएसआर राजशेखर रेड्डी की मौत एक हवाई दुर्घटना में हो गई थी। रेड्डी की मौत के बाद उनके बेटे जगनमोहन रेड्डी ने नेतृत्व पर दबाव बनाया था कि पिता की खाली हुई कुर्सी उन्हें मिल जाए। लेकिन, एक नौसिखिया युवा सांसद को पार्टी मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने को राजी नहीं हुई। इसी को लेकर अंदरूनी टकराव इतना बढ़ा कि जगनमोहन, कांग्रेस आलाकमान को ठेंगा दिखाने पर उतारू हो गए। अंतत: वे कांग्रेस से निकल कर बाहर आए। उन्होंने कांग्रेस को चुनौती देने के लिए वाईएसआर कांग्रेस का गठन कर लिया। जगनमोहन रेड्डी की पार्टी का खास असर रॉयल सीमा क्षेत्र में समझा जाता है। जबकि, यही इलाका कांग्रेस का सबसे बड़ा गढ़ बन गया था। लेकिन, रेड्डी के विद्रोह के बाद यहां कांग्रेस की हालत काफी पतली समझी जा रही है। हालांकि, कांग्रेस से पंगा लेने की बड़ी कीमत जगनमोहन को चुकानी पड़ रही है। वे आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में फंस गए हैं। महीनों से जेल में पड़े हैं। लेकिन, वे यहां रहकर भी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं।
अलग तेलंगाना राज्य के गठन के खिलाफ वाईएसआर रेड्डी भी थे। उन्हीं के दबाव के चलते कांग्रेस नेतृत्व ने वायदे के बावजूद तेलंगाना गठन की पहल नहीं की थी। जबकि, कांग्रेस ने 2004 के अपने चुनावी घोषणा पत्र में तेलंगाना गठन का वायदा किया था। इसी राजनीतिक एजेंडे के भरोसे तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेता के. चंद्रशेखर राव यूपीए-1 सरकार में शामिल हो गए थे। लेकिन, तेलंगाना का मुद्दा टलते जाने से दुखी होकर वे बाद में यूपीए से बाहर चले गए। 2009 में उन्होंने तेलंगाना के मुद्दे पर दबाव डालने के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया था। उनकी हालत खराब होने लगी, तो तेलंगाना की स्थिति नियंत्रण से बाहर जाने लगी। लोग हजारों की तादाद में सड़कों पर आने लगे। चौतरफा माहौल हिंसक बनने लगा। तमाम युवाओं ने आत्मदाह करना शुरू कर दिया था। हालात नाजुक देखकर दिसंबर 2009 में तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने तेलंगाना गठन का ऐलान कर दिया था। लेकिन, इस ऐलान के बाद शेष आंध्र के हिस्सों में हिंसक तांडव शुरू हुआ, तो केंद्र सरकार ने तेलंगाना का फैसला टालने के लिए नए-नए करतब किए। 2010 में जस्टिस कृष्णा समिति गठित की गई थी। इस समिति ने अलग राज्य बनाने के बजाए छह विकल्पों की सिफारिश की थी। लेकिन, तेलंगाना के लोगों ने ये सिफारिशें स्वीकार नहीं कीं।
तेलंगाना के मुद्दे पर सरकार के रणनीतिकार कई बार यह भी तर्क देते रहे हैं कि नए राज्यों के गठन के लिए जरूरी हो गया है कि एक नया राज्य पुनर्गठन आयोग बने। वरना, देशभर में अलग राज्य बनाने के लिए होड़ शुरू हो जाएगी। इससे देश में एक नए तरह का राजनीतिक संकट खड़ा होगा। इस तरह के तर्क परोसने के बाद भी चुनावी मौके पर कांग्रेस ने तेलंगाना का फैसला ले लिया है। इस तरह से तेलंगाना देश का 29वां राज्य बनेगा। नया राज्य बनने से इस क्षेत्र का कितना विकास होगा, इसको लेकर तरह-तरह की बातें की जा रही हैं। यह भी सुझाव है कि रॉयल सीमा क्षेत्र के कर्नूल और अनंतपुर जिलों को तेलंगाना में शामिल कर लिया जाए। इसको लेकर भी चुनावी समीकरणों का खेल अहम माना जा रहा है।
लेकिन, तेलंगाना के फैसले के बाद देशभर में नए राज्यों के गठन की मांग ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया है। माना जा रहा है कि देश के विभिन्न हिस्सों में करीब 50 नए राज्यों की मांग की जा रही है। इनमें से पांच-छह हिस्सों में दशकों से अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन चलते आ रहे हैं। महाराष्ट्र के 11 जिलों को मिलाकर अलग विदर्भ राज्य बनाने की मांग कई दशकों से चली आ रही है। इस क्षेत्र के कांग्रेसी सांसद विलास मुत्तमेवार ने कहा है कि तेलंगाना के बनने के बाद यदि विदर्भ की मांग को और दबाया गया, तो यहां भी माहौल हिंसक बन सकता है। ऐसे में, केंद्र सरकार को समय रहते फैसला ले लेना चाहिए।
पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग इलाके को गोरखालैंड राज्य बनाने की मांग काफी पुरानी है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) इस मुहिम में सालों से जुटा है। तेलंगाना का मुद्दा गर्म होने से जीजेएम ने अपना आंदोलन तेज कर दिया है। इसके नेता कह रहे हैं कि अब अलग राज्य लेकर ही रहेंगे। उत्तरी असम के चार जिलों को मिलाकर बोडोलैंड राज्य बनाने की मांग को नई हवा मिल गई है। इस इलाके में बोडो आदिवासी बड़ी संख्या में हैं। ये अपने लिए अलग राज्य चाहते हैं। 2011 में तत्कालीन मायावती सरकार ने उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों (पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल, बुंदेलखंड व अवध प्रदेश) में बांटने का मुद्दा गर्म किया था। बसपा सरकार ने प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने के लिए विधानसभा से प्रस्ताव पास कराकर भी केंद्र को भेजा था। यह अलग बात है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बसपा सरकार के इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल रखा है। तेलंगाना के ऐलान के बाद मायावती ने यूपी को चार हिस्सों में बांटने की मांग को रफ्तार देने की रणनीति बनाई है। चर्चित लेखिका शोभा डे ने अपने ट्विटर में लिख दिया कि मुंबई को भी अलग राज्य का दर्जा देना चाहिए। इस पर महाराष्ट्र में भारी बवाल खड़ा हो गया है। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर, अकेले तेलंगाना ही क्यों?
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





