Soumitra Roy : नेशनल एडिटर की परिभाषा भास्कर को बतानी चाहिए। बतौर नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक का अधिकार क्षेत्र क्या है ? भास्कर डॉट कॉम आइएमसीएल के अंतर्गत आता है। लेकिन उसके कंटेंट के लिए जवाबदेह कौन है? यह लंबी लड़ाई के विषय हैं। अगर भास्कर डॉट कॉम मूल कंपनी, यानी दैनिक भास्कर से अलग है तो भास्कर के रिपोर्टरों को प्रत्येक स्टोरी और फोटोग्राफ भास्कर डॉट कॉम में भेजने के लिए 50 रुपए कैसे मिल रहे हैं ? इस घालमेल को साफ किया जाना चाहिए। अगर भास्कर डॉट कॉम भास्कर ग्रुप के कंटेंट का उपयोग कर रहा है तो वह उससे या कल्पेश के कार्यक्षेत्र से अलग कैसे हो सकता है? वैसे, पता ये चला है कि असल में कल्पेश का आईएमसीएल या भास्कर डॉट कॉम के कंटेंट पर कोई दखल नहीं है। यह मूलत: गिरीश अग्रवाल और ज्ञान गुप्ता के हाथ में है। एक डायरेक्टर है तो दूसरा सीईओ। अब बताएं कि कल्पेश याग्निक काहे के संपादक बने घूमते हैं, जब उनका उस साइट पर ही कोई अंकुश नहीं, जहां सबसे पहले खबर आती है। यानी भास्कर डॉट कॉम। ज्ञान गुप्ता का नंबर है 098118502484.
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Samar Anarya : तमाम लोग कहानी सुना रहे हैं कि कल्पेश याग्निक और राजेश उपाध्याय का भास्कर वेबसाइट से कोई रिश्ता नहीं है. आपने उनका नाम लेके गलत किया. सो उनके लिये- बेहूदों अगर वेबसाइट का नाम bhaskar.com ना हो के भास्कर.ब्लॉगस्पॉट.कॉम होता तो कितने लोग पढ़ते बे? सो कहानी ना सुनाओ. और सुनो- बड़ा दर्द है तो इन दोनों को कहो कि मुझ पर निजता के हनन का मुकदमा करें. इनके फर्जी वकील न बनो. औकात अपनी चाहे कुछ न हो, इन दोनो से लड़ लेने में हलके ना पड़ेंगे.
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Vineet Kumar : दैनिक भास्कर का लाइन मारो कॉन्टेस्ट. जेएनयू की घटना पर दैनिक भास्कर डॉट कॉम ने जो घटिया हरकत की, उस पर पोस्ट लिखे जाने के बाद शैलेन्द्र( Shailendra Jha) ने याद दिलाया कि इस अखबार समूह ने इसी नाम से 14 फरवरी 2012 को कॉन्टेस्ट कराया था. फेसबुक पर हमने इसकी चर्चा भी की थी लेकिन अब शैलेन्द्र के बाद जब उस तस्वीर और स्टेटस को देखना चाहा तो उपलब्ध नहीं आया. गूगल पर सर्च करने पर संयोग से ट्विटर की लिंक मिल गई और वो स्टोरी भी..तो जो अखबार समूह खुलेआम इस तरह से लड़कियों को टीज करने के कॉन्टेस्ट प्रायोजित करता है, वो अगर पहले सेक्स कर चुकी थी लड़की जैसे शीर्षक लगाता है तो इसे हैरानी के बजाय इसके बिजनेस पैटर्न का हिस्सा माना जाना चाहिए और इसे एथिक्स के बजाय कानून और सामाजिक बहिष्कार का मुद्दा बनाया जाना चाहिए.
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रजनीश के झा : दैनिक भास्कर की मस्तराम संस्कृति में अहम् योगदान कल्पेश याग्निक का रहा है, वैसे क्रियेटिविटी के नाम पर दैनिक भास्कर कब का अश्लील किताब बन चूका है बिकता भी उसी प्रदेश में हैं जहाँ अखबार माने सेक्स होता है, झारखण्ड में सुपर फ्लॉप रहा है बिहार और उत्तर प्रदेश में घुसने की औकात और हिम्मत नहीं।
सौमित्र राय, समर अनार्या, विनीत कुमार और रजनीश के झा के फेसबुक वॉल से.





