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सुख-दुख...

नभाटा के मेरे उत्तराखंडी वरिष्ठों ने अंग्रेज़ी के पर्चे में नकल करवा कर मुझे पास करा दिया

: (संस्मरण – पार्ट 2) : श्याम सुंदर आचार्य के प्रकोष्ठ से निकल कर मैंने दफ्तर के नीचे थडी पर चाय पी और फिर राजस्थान विश्वविद्यालय की ओर चल पड़ा, जहाँ से मेरी कई विगतस्मृतियाँ जुडी थीं और जहाँ से मुझे हॉस्टल की मेस का बिल समय पर न देने के कारण फिर से दिल्ली का रुख करना पड़ा था. यहाँ (दिल्ली में) नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक राजेन्द्र माथुर मेरे पिता के पुराने मित्र और परिचित थे. इस बार मैंने उन्हें कहा कि मैं रिसर्च का काम छोड़ कर दिल्ली ही चला आया हूँ, और अब पूरी तरह से उनके सुपुर्द हूँ.

: (संस्मरण – पार्ट 2) : श्याम सुंदर आचार्य के प्रकोष्ठ से निकल कर मैंने दफ्तर के नीचे थडी पर चाय पी और फिर राजस्थान विश्वविद्यालय की ओर चल पड़ा, जहाँ से मेरी कई विगतस्मृतियाँ जुडी थीं और जहाँ से मुझे हॉस्टल की मेस का बिल समय पर न देने के कारण फिर से दिल्ली का रुख करना पड़ा था. यहाँ (दिल्ली में) नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक राजेन्द्र माथुर मेरे पिता के पुराने मित्र और परिचित थे. इस बार मैंने उन्हें कहा कि मैं रिसर्च का काम छोड़ कर दिल्ली ही चला आया हूँ, और अब पूरी तरह से उनके सुपुर्द हूँ.

तेजस्वी, भद्र, आत्मविश्वासी और उत्साही तथा भावुक राजेन्द्र माथुर स्वयं को एक आधुनिक व्यक्ति समझते थे, शायद हों भी. लेकिन परम्पराओं का आदर्शवाद उनमें हठात छलक -छलक जाता था. वह बोले- मेरे लिए इतना ही यथेष्ठ है कि तुम सुंदर लाल बहुगुणा के आत्मज हो, लेकिन यदि तुम पत्रकारिता के योग्य साबित न हुए तो मैं तुम्हे कहीं हिन्दी का प्राध्यापक बना दूँगा.

वैसे वह मुझे तथा हर छोटे बड़े को आप कह कर ही संबोधित करते थे. मैंने हामी भरी. उन्होंने मुझे न्यूज़ एडिटर हरीश अग्रवाल के सुपुर्द किया, और हरीश अग्रवाल ने यूपी डेस्क के इंचार्ज अरुण दीक्षित के. यहाँ बैठ कर मैं कापी एडिटिंग, हेडिंग लगाना, इंट्रो बनाना तथा कापी पुनर्लेखन काम सीखने लगा. सब कुछ तो ठीक था, पर जब कभी अंग्रेजी का तार मुझे अनुवाद को दिया जाता तो मेरे फ़रिश्ते कूच कर जाते. पहाड़ के टाट पट्टी वाले स्कूलों में हमने अंग्रेजी उन गुरुओं से सीखी थी, जो अंग्रेज़ी भी गढवाली भाषा में पढ़ाते थे.

उकता कर मैं बार-बार माथुर साहब के पास अपनी विनय पत्रिका लेकर जाता, तो उनका दो टूक जवाब यही होता कि किसी नए संस्करण के लिए जब परीक्षा होगी, तो मुझे वह क्वालीफाई करनी होगी. नियुक्ति का इसके सिवा कोई भी उपक्रम नही है. मैं उनसे हर मुलाक़ात के बाद घोर निराशा से भर उठता, क्योंकि नवभारत टाइम्स की पत्रकार परीक्षा में उस समय अंग्रेज़ी का एक कठोर पर्चा होता था, और मुझे अंग्रेज़ी उतनी ही आती थी, जितनी सोनिया गांधी को हिन्दी आती है. लेकिन मुझे क्या पता था कि नवभारत टाइम्स में सीनियर पदों पर काम कर रहे हमारे उत्तराखंडी वरिष्ठ मुझे अंग्रेज़ी के पर्चे में नक़ल करवा कर पास करवा देंगे.

…जारी…

इस संस्मरण के लेखक राजीव नयन बहुगुणा वरिष्ठ पत्रकार हैं.


पहला पार्ट पढ़ें–

उन जैसा सज्जन, सीधा, झूठा, दिल का साफ़ और कलाकार संघी पत्रकार मुझे और कोई नहीं मिला

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