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मीडिया में सेक्स भी बिकता है, ये गुरुमंत्र बहुतों ने अपने कई चेलों को दिया होगा

Nadim S. Akhter :  न्यूज रूम किसी सीनियर के मुंह से सुना था कि पत्रकारिता में 3C बिकता है…यानी Crime, Cricket और …. वैसे "C" से अंग्रेजी के बहुत शब्द लिखे जा सकते हैं…एक और वरिष्ठ ने कहा था, अपने से वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह को quote करते हुए कि खुशवंत साहब का कहना था कि वो नंगी आदिवासी महिलाओं की तस्वीरें इसिलए छापते हैं कि इससे रिस्पॉन्स अच्छा मिलता है…

Nadim S. Akhter :  न्यूज रूम किसी सीनियर के मुंह से सुना था कि पत्रकारिता में 3C बिकता है…यानी Crime, Cricket और …. वैसे "C" से अंग्रेजी के बहुत शब्द लिखे जा सकते हैं…एक और वरिष्ठ ने कहा था, अपने से वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह को quote करते हुए कि खुशवंत साहब का कहना था कि वो नंगी आदिवासी महिलाओं की तस्वीरें इसिलए छापते हैं कि इससे रिस्पॉन्स अच्छा मिलता है…

पता नहीं, खुशवंत साहब ने ये बात कब और कहां कही थी, लेकिन वरिष्ठ साथी पत्रकार ने इसका जिक्र बहुत उत्साह से किया…टीवी में जब रिपोर्टर किसी मुद्दे पर आम लोगों की बाइट (byte) लेने जाते हैं तो उन्हें कई दफा ये सलाह दी जाती है कि – देखो, सुंदर-सुंदर चेहरे दिखाना, खूबसूरत कन्याओं से बात करना, सादी रोटी लाओगे तो पड़ी रह जाएंगी, टीवी दिखने-दिखाने का माध्यम है, ग्लैमर होना चाहिए….वगैरह-वगैरह…

यह अनायास नहीं है कि कैटरीना कैफ और रणवीर कपूर विदेश में जब छुट्टियां मना रहे थे, उनकी अंतरंग तस्वीर स्टारडस्ट ने छाप दी…फिर क्या था, होड़ लग गई और लगभग सभी टीवी चैनलों ने लपक-लपक कर हेडलाइंस में उस तस्वीर को दिखाया…कुछ थोड़े शालीन निकले, और फोटो में कैटरीना के शरीर के कुछ हिस्सों को blur कर दिया…लेकिन बाकियों ने मजे ले-लेकर दिखाया…अब कैटरीना मीडिया से दुखी और खफा हैं और अपनी निजी फोटो छापे-दिखाए जाने पर मीडिया को एक खुली चिट्ठी भी लिखी है…

-सेक्स- एक ऐसा शब्द है, जिसकी परिभाषा बहुत व्यापक है…कौन जाने, मीडिया माध्यमों में फोटो छापे-दिखाए जाने पर पाठकों-दर्शकों ने उसे किस नजर से देखा होगा…कितनों की निगाह में वासना की लपटें लिपटी होंगी? आखिर टीवी बाइट में खूबसूरत चेहरे की क्या दरकार है? अगर लड़की तथाकथित रूप से सुंदर नहीं होगी, तो क्या बात नहीं बनेगी? और क्या -खूबसूरत चेहरे- के पीछे भी वही कुंठा काम नहीं कर रही है कि महिलाएं सिर्फ -उपभोग- की वस्तु है…? महिलाओं की ही नंगी तस्वीरें क्यों छपती हैं, पुरुषों की क्यों नहीं छापते? किंगफिशर के वार्षिक कैलेंडर में खूबसूरत महिला मॉडल ही क्यों कम कपड़ों में दिखती हैं और क्यों इस कैलेंडर का इतना हव्वा बना रखा है???!!!! कौन इसको हवा देता है? विजय माल्या आत्महत्या कर रहे किसानों के परिवार वालों के साथ कोई फोटो कैलेंडर क्यों नहीं शूट करते-करवाते? वह अपनी CSR यानी Corporate Social Responsibility क्यों नहीं निभाते, गरीबी-भूख को क्यों नहीं बेचते? ग्लैमर और अर्ध नग्न मॉडलों को क्यों बेचते हैं??? कोई तो खरीदार होगा…शायद हम में से ही कई…बहुत सारे….

तो मीडिया में सेक्स भी बिकता है, ये गुरुमंत्र बहुतों ने अपने कई चेलों को दिया होगा…और कई -प्रतिभावान- ऐसे होंगे, जिन्होंने देख-सुन कर इस गुरुमंत्र को कलेजे से लगा लिया होगा…कुछ ने अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए और नौकरी को ताक पर रखकर सेक्स बेचने के आइडिया को तिलंजलि दे दी होगी और कुछ ने इसे परवान चढ़ा दिया होगा…बहुत सारे कारण हो सकते हैं…क्या कारण है कि नामी-गिरामी पत्रिकाएं भी SEX SURVEY छापती हैं??? ये बताने का क्या मकसद है कि दिल्ली-पटना-हैदराबाद में 14 साल से कम उम्र की कितनी प्रतिशत लड़कियों ने सेक्स संबंध स्थापित कर लिया है…कितनी प्रतिशत virgin हैं आदि-आदि…मतलब साफ है…इस पूरी कवायद और कसरत के केन्द्र में है बाजार और बिजनेस…बस ऊपर से पत्रकारिता की चाशनी लगा दी जाती है….

मुझे याद है कि दिल्ली के एक बड़े अखबार ने सेक्स की विभिन्न भंगिमाओं वाले कार्टून के साथ -सुरुचिपूर्ण- टिप्पणी भी छापी थी, बिल्कुल कॉमिक वाले अंदाज में…अंग्रेजी अखबार ने अपने पुलआउट में इसे छाप दिया था. लेकिन जब समूह के हिंदी अखबार को भी वही छापने का ऊपर से आदेश आया और ये भी कि हर भावभंगिमा वाले कार्टून के साथ लिखी -सुरुचिपूर्ण टिप्पणी- का हिंदी में अनुवाद करके छापिए, तो एक -माहिर उपसंपादक- को लगाया गया…सीनियर्स ने उस ट्रांसलेशन को देखा लेकिन छपते-छपते संपादक जी को चैन नहीं था….वे परेशान थे कि अंग्रेजी के पाठकों ने तो पचा लिया लेकिन हिंदी में छपने के बाद अगले दिन कहीं पाठक अखबार के ऑफिस पर धावा ना बोल दें…मैनेजमेंट का डिसीजन था, सो छपना तो था ही…छपा…अखबार के गौरवपूर्ण इतिहास में एक और -अध्याय- जूड़ गया….

तो पत्रकारिता की चाशनी लगाकर बहुत कुछ बेचा जा रहा है….दोष सिर्फ पत्रकारों को मत दीजिए…मीडिया संस्थानों में -एडिटोरियल डिपार्टमेंट- की क्या औकात है, सबको पता है…आप सिर्फ गोली को देख रहे हैं, गोली फायर करने वाले को नहीं…हां ये पत्रकार के विवेक पर निर्भर करता है कि वह मैनेजमेंट के हुक्म की तामील लेट कर करता है, सिर झुकाकर या फिर नौकरी को लात मारकर कोई दूसरा विकल्प तलाशने निकल पड़ता है…और नौकरी को लात मारने का माद्दा सबमें नहीं होता… हमेशा कहता आया हूं कि पहला पत्थर वो मारे, जो पापी ना हो…जब अखबार और टीवी चैनल को -PRODUCT- कहने का दौर आ गया हो, तो इस तरह की पंक्तियां सुनाई पड़ती रहेंगी—-अब नया लक्स-रिन-एरियल-फेयर एंड लवली, एक्टिव ऑक्सीजन के साथ, ऊलजलूल फार्मूला के साथ, पहले से बेहतर, एक महीने की गारंटी, नहीं तो पैसे वापस, आपने चाहा-हमने बनाया.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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