: (संस्मरण – पार्ट 3) : एक शाम को मुझे कुछ ज्यादा ही अन्यमनस्क देख माथुर बाबा मुझे साथ ले जाने लगे. पर उस वक्त मुझे बगल में ही काका कालेलकर के आश्रम "सन्निधि" जाकर राधा कृष्ण बजाज उर्फ भाया जी के लिए गाय का दूध ले जाना था. मैंने उनसे बताया तो उन्होंने कहा- मुझे भी वहीँ जाना है. क्यों जाना है, यह भला मै कैसे पूछता.
रास्ते में कार रोक कर उन्होंने चना मूंगफली का एक चटपटा पत्ता बना कर खुद भी खाया और मुझे भी खिलाया. वह एम्बेसेडर जैसी भारी भरकम कार खुद चलाते थे. अम्बेसडर कार खुद हांकने वाले मैंने दो ही बड़े आदमी देखे, एक माथुर बाबा और एक प्रधानमंत्री मन मोहन सिंह.
खैर उन्होंने मुझे इशारों ही इशारों में आश्वस्त किया कि भयातुर होने की कोई ज़रूरत नहीं है. कुछ ही समय बाद तुम्हे नवभारत टाइम्स का उप संपादक बना दिया जाएगा. लेकिन मेरी चौपट अंग्रेज़ी का क्या होगा? मैंने भाव कातर होकर पूछा. वह भी देख ली जायेगी. उनके इस अभयदान से मैं कृतार्थ हो गया.
यह बहुत बाद में पता चला, कई साल बाद, कि उनकी पत्नी श्रीमती मोहिनी माथुर काका कालेलकर के आश्रम में चुपचाप सफाई कर्मियों के बच्चों को निशुल्क पढाती थीं. रहने का स्थान तो मेरा ठीक ही हो गया था. अब जॉब का भी पक्का आश्वासन मिल गया.
सेठ जमना लाल बजाज के भतीजे राधा कृष्ण बजाज एक दिन मेरा फजीता देख मुझे अपने साथ ले गए. इस वृद्ध, त्यागी-तपस्वी मारवाड़ी भूतपूर्व सेठ को सभी लोग श्रद्धा से भाया जी कहते थे. वह युवावस्था में ही पूरी तरह गांधी के रंग में रंग कर अनिकेत हो गए थे.
गांधी ने उन्हें गोरक्षा का काम सौंपा था, जिसे अभी तक निभा रहे थे. उनका अपने पुश्तैनी व्यापार से कुछ लेना-देना नहीं था. फिर भी पारिवारिक कंपनियों से उनका नियत शेयर खुद-ब-खुद उनके एकाउंट में जमा हो जाता था. वह उस पैसे को खर्च नहीं करते, पर हिसाब के मामले में चौकस रहते थे. अपने बैंक एकाउंट चेक करते रहते थे.
इससे मुझे सीख मिली कि बनिया चाहे संन्यासी भी हो जाए, वह अपना वणिक धर्म नहीं छोड़ता. गांधी और विनोबा दोनों बजाज परिवार की जागीर पर वर्धा जिले में रहते थे. इधर उस भूमि का स्वामी, और भारत के गिने चुने प्रतिष्ठित धन कुबेरों में से एक दिल्ली में किसी के पुराने मकान में अकिंचन होकर रहता था. विचार चाहे जैसा भी हो, वह सचमुच व्यक्ति को अमूल बदल देता है.
अस्सी साल से ऊपर हो चुके राधा कृष्ण बजाज का जीवन सादगी की मिसाल था. उनकी पत्नी अनुसुईया देवी बजाज अंगीठी पर उनके लिए खाना बनाती. वह कस्तूरबा की प्रति मूर्ती लगती थीं. हर गुरुवार को भाया जी के नेतृत्व में गोरक्षा के लिए गिरफ्तारियां दी जातीं. वह एक कर्म कांड, बल्कि नाटक ही था. क्योंकि सत्याग्रहियों को कुछ ही देर बाद छोड़ दिया जाता, थाने में चाय पिला कर.
दिल्ली के आसपास के गांवों के लोग गिरफ्तारी देने आते और फिर शाम को दिल्ली घूम कर या सौदा सुल्फा कर वापस लौट जाते. बजाज जी की तरफ़ से उन्हें दो टाइम का खाना और बस का आने जाने का किराया मिलता था. सौदा बुरा नहीं था. बजाज जी खुद भी दिल्ली की लोकल बस में सफर करते. चमरौंधे का जूता पहनते, और खद्दर की मारवाड़ी धोती. चीनी की बजाय गुड़ खाते. बजाज ऑटो का काम देख रहे अपने भाईयों को ताबडतोड़ पत्र लिखते रहते, लेकिन उनका जवाब शायद ही कभी आता हो.
उनके यहाँ लक्ष्मण वोरा नामक एक कुमाउंनी लड़का भी काम करता था. हमवतन होने के नाते हम दोनों की खूब छनती. वह सीधा साधा बल्कि लाटा (बावला) सा था. एक दिन बजाज जी को कह बैठा कि मुझे रात में सपने में वीर्य गिरता है. भाया जी ने उसकी बात का बुरा नहीं माना, और सलाह दी कि वह रात को सोते समय भगवान का ध्यान करे. सब ठीक हो जाएगा. लेकन उसकी स्वप्न दोष की समस्या जारी रही. अब उसे मैंने सलाह दी कि जब मन करे हस्तमैथुन कर लिया कर. मेरे उपचार से उसकी समस्या हल हो गयी, और उस गधे ने मेरी तारीफ करते हुए यह बात भाया जी को बता दी.

राजीव नयन बहुगुणा के संस्मरण का अंश. राजीव उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं.
इसके पहले के पार्ट…
नभाटा के मेरे उत्तराखंडी वरिष्ठों ने अंग्रेज़ी के पर्चे में नकल करवा कर मुझे पास करा दिया
उन जैसा सज्जन, सीधा, झूठा, दिल का साफ़ और कलाकार संघी पत्रकार मुझे और कोई नहीं मिला





