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‘डे एंड नाइट’ चैनल की पत्रकारिता और पतन पर जगमोहन फुटेला की टिप्पणी

पंजाब में एक प्रोफेशनल चैनल की संभावनाओं के बावजूद 'डे एंड नाईट' की विफलता आखिरकार कंवर संधू की शहीदी ले के मानी. पिछले दिनों चैनल के दफ्तर में छुट्टी तक पे चल रहे कर्मचारियों को बुला कर उन्होंने अपनी विदाई का ऐलान किया. संधू एक महीने में चैनल से चले जाएंगे. उन्होंने बाकी लोंगों से भी नई नौकरियां ढूंढ लेने को कहा है. दो महीने से अटकी तनख्वाहें, उन्होंने कहा, कि सब को चार छ: दिन में मिल जाएंगी.

पंजाब में एक प्रोफेशनल चैनल की संभावनाओं के बावजूद 'डे एंड नाईट' की विफलता आखिरकार कंवर संधू की शहीदी ले के मानी. पिछले दिनों चैनल के दफ्तर में छुट्टी तक पे चल रहे कर्मचारियों को बुला कर उन्होंने अपनी विदाई का ऐलान किया. संधू एक महीने में चैनल से चले जाएंगे. उन्होंने बाकी लोंगों से भी नई नौकरियां ढूंढ लेने को कहा है. दो महीने से अटकी तनख्वाहें, उन्होंने कहा, कि सब को चार छ: दिन में मिल जाएंगी.

मिली जानकारी के मुताबिक़ चैनल के संपादक संधू की अपने मालिक से बातचीत तक होनी बंद हो गई थी. चैनल आने के बाद से कंपनी लगातार कुछ न कुछ खो ही रही थी. कंपनी पंजाब में कोका कोला के फ्रेंचाइज़ी कंधारी की है. कंवर संधू उन के संपर्क में अपनी पत्नी की वजह से आए. उनकी पत्नी एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी चलाती हैं और कोका कोला का धंधा भी उन्हीं के पास था. संधू चंडीगढ़ में हिंदुस्तान टाइम्स के रेज़ीडेंट एडिटर थे. पता नहीं किस पीनक में वे एक बार अकालियों की एक सभा में एक ऊंचे मचान पे विराजमान हो गए और शोभना भारतीय ने उन्हें रेज़ीडेंट एडिटर की कुर्सी से नीचे उतार दिया. ऐसे में उन की पत्नी उन के काम आई और उन्हें 'डे एंड नाईट' का संपादक बनवा दिया.

टीवी चैनल का संपादक होने के बाद जो भी गलतियां कोई अखबारी संपादक कर सकता है वो सारी कंवर संधू ने कीं. वे अपनी ही तरह टीवी की विधा से अनजान लोगों को चैनल में लाए. तकनीकी तौर पे हालत ये थी कि चैनल में पैकेजिंग तक चीज़ का किसी को कोई पता नहीं था. खबर बीच में बैक टू बैक बाइटों के साथ एंकर से शुरू हो के एंकर पे ही ख़त्म हो जाती. कंवर संधू ने पहले अकालियों और फिर उन को मज़ा चखाने के लिए कांग्रेसियों की ऐसी लल्लो चप्पो की कि चैनल की विश्वसनीयता मिट्टी में मिला दी. हिमाचल के चुनाव में रुख किया उस हिमाचल का जहां एक भी स्टाफ रिपोर्टर नहीं था उन का. इंटरव्यू वो प्रेम कुमार धूमल के दिखाते रहे. सरकार कांग्रेस की बन गई.

चैनल का उधर मोहाली और इधर पंचकुला के आगे कहीं कोई स्टाफ रिपोर्टर नहीं था लेकिन खबरें अमरीका और कनाडा तक की चलती रहीं. चैनल के साथ पंजाबियों को जोड़ने के लिए संधू पंजाबी, हिमाचलियों को जोड़ने के लिए हिंदी और आप्रवासी भारतीयों को पटाने के लिए अंग्रेजी में बुलेटिन चलाते रहे. नतीजा हुआ कि उन्हें न खुदा ही मिला, न विसाले सनम. उन्हें पता ही न था कि दो या तीन भाषाओं वाले चैनलों की कोई टीआरपी काउंट ही नहीं होती, न एड ही मिलती है उस आधार पे. एडविहीन चैनल बीमार पे बीमार होता चला गया. ग्रोथ रुक गई. कंटेंट में वैसे भी दम नहीं था. हर चैनल का संपादक शाम को प्राइम टाइम पेश करता है. संधू को प्राइम टाइम का मतलब भी कभी समझ नहीं आया. वे रक्षा मामलों पे एक प्रोग्राम करते रहे. तब भी कि जब कारगिल के बाद से फौज या लड़ाई देश के एजेंडे पे भी नहीं है. देश जब सो रहा होता था तो वे सुबह छ: बजे अंग्रेजी में ख़बरों के मतलब समझाया करते थे. शायद कनाडा में अपने बेटे के मित्रों को समझाते होंगे. उन का बेटा वहां रहता है.

एक जानकारी के मुताबिक़ संधू कोई सत्तर बहत्तर लाख के पॅकेज पर थे. पांच छ: सालों में इतनी तो उन की बचत ही हो गई होगी कि जीवन के बाकी दिन किसी और का ऐसा कोई नुक्सान किये बिना बिता सकें. लेकिन चैनल के बाकी लोगों की हालत अब बहुत खराब है. उन के सामने अभी तो कोई और चैनल या चारा नहीं है. जहां तक 'डे एंड नाईट' की बात है तो उस के भविष्य के बारे में अभी कोई जानकारी नहीं है. सिवाय इस के कि चैनल बिकने नहीं वाला. किराए पे दे नहीं सकते. इस में मोटा रिस्क है. खबर कोई उलटी सीधी किराएदार चलाएगा. सज़ा मालिक को भुगतनी पड़ेगी. अभी तो जानकारी ये है कि संधू महीने बाद अपने घर और चैनल के सौ से अधिक कर्मचारी सड़क पे होंगे…और ये सब होगा इस लिए कि संपादक एक अच्छा पत्रकार तो था लेकिन उस को टीवी पत्रकारिता नहीं आती थी..!

'डे एंड नाईट' से महीने भर में विदा होने से पहले चैनल के संपादक कंवर संधू ने यू ट्यूब पे भी संजो के रखे गए अपने विदाई संदेश में कुछ खरी, कुछ भावनात्मक बातें कही हैं. इन्हें उन्होंने 'डे एंड नाईट' का सच बताया है. लेकिन असल में सच को ही स्वीकार नहीं किया है. हालांकि सब को सच स्वीकारवाना भी ज़िम्मेवारी मेरी नहीं है. मगर क्या करूं दर्शक और पत्रकार मैं भी हूं. दर्द मेरे भी सीने में है. उम्मीद मुझे भी थी कि रिपोर्टरों से पैसे ले के चैनल चलाने और फिर वो डकार कर भाग जाने वाले ज़माने में कंवर संधू कुछ तो बेहतर करेंगे.

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नज़र मार के देख लीजिए. पंजाब में एक के बाद एक चैनल आए और शहीद हो गए. पंजाब टुडे, चैनल वन, लश्कारा, पंजाबी वर्ल्ड, पीबीसी और डीईटीवी. पंजाब टुडे भारत इंदर सिंह चाहल की कृपा से कांग्रेस के राज में झोलियां भर के निकल लिया. कांग्रेसियों की ऐसी जय जयकार करी उस ने कि अकालियों की सरकार आने के बाद जुगल जैन के ट्रकों तक ने कभी पंजाब की तरफ मुंह न किया. चैनल वन का मालिक तो खुद चाय समोसे वाली प्रेस कांफ्रेंसों में माइक आई डी ले ले के घूमने के बावजूद चैनल न चला सका. लश्कारा का रेडियो से आया एक ऐसा संपादक था जो एक वाक्य बोलने में ही तीन बार होंठ ऐसे कस के भींच लेता था कि कहीं सरकार के खिलाफ कोई शब्द बाहर न निकल पड़ें. पीबीसी पंजाब में अकालियों की सरकार और उस में विधायक और मुख्यमंत्री का रिश्तेदार भी होने के बावजूद अजायब सिंह मुखमैलपुर से न चला. एक बार मेरे भी पास आए थे वो चैनल का लायसेंस लेने के बाद. कह रहे थे कि रिपोर्टरों से पचास और कैमरामैनों से तीस तीस हज़ार रूपये लेंगे सेक्योरिटी खाते में. मैंने पूछा था कलम और कैमरा भी जब उन का ही होगा तो सेक्योरिटी किस चीज़ की? उन का जवाब था, सभी चैनल तो ऐसा ही करते हैं पंजाब में…पीबीसी भी निबट गया और वो डीईटीवी भी जिस के मालिक सुरजीत सिंह रखड़ा के अमेरिका में चार सौ पेट्रोल पंप तब भी चलते थे और जो पंजाब की अकाली सरकार में आज मंत्री जो भी हैं.

केबल नेटवर्क की दुनिया में आए बदलावों, देश भर में बन गए समूहों और खासकर पंजाब के पूरे केबल नेटवर्क पे एक ही कंपनी के जैसे एकाधिकार के बाद पंजाब पे फोकस करते हुए कोई चैनल चला पाना आसान रह भी नहीं गया था. खासकर उसी ग्रुप का अपना एक चैनल भी होने के बाद. ऐसे में ये तय था कि कंवर संधू या तो अपने भीतर के पत्रकार को मार के चैनल चलाएंगे या जिस दिन उन के भीतर का पत्रकार जागा तो वे खुद डूब जाएंगे. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि विकल्प नहीं थे. यकीन मानिए मैंने कंवर संधू को बिना शर्त मदद का भरोसा भी दिया था. देश में किसी भी प्राइवेट चैनल के सब से शुरूआती पत्रकारों में से था मैं. मदद कर पाने की हालत में भी था. मगर कंवर ने परवाह नहीं की. मैंने साईकोलोजी पढ़ी है. वे डरे हुए थे. मुझे पता है मीडिया में दो तरह के लोगों की ज़रूरत नहीं होती. एक वे जो बहुत गए बीते हों. दूसरे वो जो आप से ज्यादा समझदार हों.

कंवर संधू ने छांट छांट के ऐसे बंदे भर्ती किए जिन्हें टीवी नहीं आता था. वरना बताओ आप, देखा है कभी कोई ऐसा चैनल आप ने कि जिस में ख़बरों की पैकेजिंग ही न होती हो. कोई एक खबर याद कीजिए किसी भी हिंदी, अंग्रेज़ी या किसी भाषाई चैनल की कि जिस में खबर एंकर से शुरू हो के बिना किसी स्क्रिप्ट, वायस ओवर या किन्हीं दृश्यों के, एंकर के साथ ही ख़त्म हो गई हो. चैनल पता नहीं क्या सोच के एक साथ तीन भाषाओं (हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी) में शुरू किया गया. इस सच्चाई से बिलकुल अनजान कि इस देश में बहुभाषी चैनलों की कोई टीआरपी काउंट ही नहीं होती और विज्ञापन का सारा दारोमदार उसी पर है.

चैनल का कंसेप्ट या सेगमेंट भी कोई होता है, संधू से आज पूछ लो. उन्हें आज भी नहीं पता. होता तो वो चैनल की प्लानिंग और उस के कंटेंट से दिखना चाहिए था. दिखा नहीं मगर कभी. हिंदी हरियाणवियों व हिमाचलियों, पंजाबी पंजाबियों और अंग्रेज़ी अमेरिका, कनाडा जा बसे भारतीयों की भाषा मान कर उन्होंने तीन तरह के बुलेटिन आगे पीछे चलाने शुरू किए. होता ये था कि पंजाबी कोई खबरें देखने आता तो हिंदी का बुलेटिन चल रहा होता था और हरियाणवी कोई आता तो पंजाबी का.

उस पर उच्चारण भी बस बूझो तो जानें जैसा. मिसाल के तौर पे हिंदी प्रोग्रामों में चैनल के पंजाबी होस्ट 'यानी कि' को 'जणकी' और 'या' को 'जां' बोलते रहे. असली ज़ुल्म तो दर्शकों पे तब होता था जब अंग्रेज़ी के बुलेटिन में रिपोर्टर का फ़ोनों हिंदी और हिंदी बुलेटिन में पंजाबी में आने लग जाता था. मैं अपनी बात कहूं. मैं तो चैनल किसी सूचना, खबर या ज्ञानवृद्धि के लिए नहीं, दिल बहलाने या दिमागी थकान मिटाने के लिए देखने लग गया था.

सारी दुनिया की टीवी इंडस्ट्री में सारा ज़ोर प्राइम टाइम पे है. शाम आठ बजे से लेकर रात दस साढ़े दस बजे सोने तक का ही वो टाइम है जब, माना जाता है कि टीवी को टिक कर, ज़रुरत के तौर देखा जाता है. इसी लिए आप देखेंगे कि हर चैनल दिन के महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़े गेस्ट बिठा कर अपने संपादकों के ज़रिए दर्शकों की दिमागी और बौद्धिक ज़रूरतें पूरी करता है. समाज को हिलाने, डुलाने और किसी के भी बारे में उस की राय बनाने, बिगाड़ने का ज़रिया भी वही है. लेकिन डे एंड नाईट पे तो खबरें ही चलती रहती थीं उस टाइम पे. वही दिन भर से चलती आ रही खबरें. किन्हीं को मुद्दा मान के कभी संपादक ने कोई चिंतन, मनन, डिस्कशन किया हो, कभी हुआ नहीं. किसी भी चैनल के संपादक का अपना प्रोग्राम एक तरह से चैनल का चेहरा होता है. यहां संपादक जी का अपना प्रोग्राम सुबह छ: बजे तब होता था जब भारत सो और कनाडा जाग रहा होता था. इस के अलावा बस एक प्रोग्राम वे और करते रहे. लगातार. और वो उस युद्ध विषय पर होता था जो कारगिल के बाद कभी हुआ नहीं. उन का एजेंडा वो रहा जो देश का था ही नहीं.

एक पत्रकार के रूप में मेरा मानना है कि चैनल पंजाब में न चल पाने का नज़ला सरकार या अकाली दल पे उतारना हद दर्जे की भूल, बल्कि बेवकूफ़ी थी. इस से न केवल चैनल की क्रेडिबिलिटी का कचरा हुआ बल्कि पंजाब में अपने मालिक के लंबे चौड़े कारोबार को भी आपने जोखिम में डाला.

विदाई के समय भावुक हो जाने वाले देश में मैं शोक में डूबा कंवर संधू का विदाई संदेश सुनवाऊं आप को उस से पहले एक निवेदन. भावुक होने की ज़रूरत नहीं है. सहानुभूति तो 'डे  एंड नाईट' के मालिक से होनी चाहिए जिस का करोड़ों का धन डूबा और चैनल के ज़रिए अगर कोई शान, शौकत, इज्ज़त और पूंजी बढ़नी थी तो उस के अवसर भी. जहां तक कंवर संधू की बात है तो वे जाते जाते भी मालिक का नुक्सान कर के जा रहे हैं. वे अपनी भूलें और गलतियां स्वीकार करने की बजाय आज भी उन को बुरा भला कह के जा रहे हैं जिन के पंजाब में होने के बावजूद टोटल जैसे रीजनल और ज़ी, आजतक, एबीपी, इंडिया टीवी और एनडीटीवी, टाइम्स नाव जैसे चैनल चले ही हैं. आप का नहीं चल सकता था तो आप को पता होना चाहिए था. पता था और फिर भी नहीं चला तो ये आप की असफलता है…और चला ही जो सकते होते आप तो खुद आप के मुताबिक़ देश और उस में आप का आपरेशनल एरिया तो पंजाब के अलावा और भी था. आप के लिए सारी संभावनाएं सारे देश के साथ शुरू हो के अकेले पंजाब के साथ कैसे समाप्त हो गईं? ये भी कहां की अकलमंदी है कि 2014 जैसे निर्णायक चुनावों के मद्देनज़र जब बाढ़ आई हुई है नए चैनलों और अख़बारों की तो आप दुकान समेट के घर जा रहे हैं?

(नोट- अब वो वीडियो यूट्यूब से हटा लिया गया है जिसमें कंवर संधू ने कहा था कि उनके चैनल को पंजाब में केबल नेटवर्क पे चलने नहीं दिया गया. इससे टीआरपी नहीं आई और उससे विज्ञापन. तंगी के चलते कभी अमेरिका तक में दिखता चैनल सात डिशों के बाद सिर्फ दो पे रह गया. उन्होंने अपने इस विदाई संदेश में पंजाब के प्रमुख राजनेताओं की चैनल की लांचिंग के समय की पुरानी क्लिपिंग दिखाई और चैनल बंद होने का ठीकरा सब उन पे फोड़ दिया. इस विदाई संदेश में संधू ने ये दावा तो किया कि चैनल पंजाब के बाहर देखा और बहुत पसंद किया जा रहा है. लेकिन ये नहीं बताया कि पंजाब के बाहर इतना लोकप्रिय होने के बावजूद बाहर से भी कहीं से कोई एड क्यों नहीं आई और चैनल इतना ही लोकप्रिय बना दिया है आप ने तो अपनी सारी टीम समेत आप चैनल से क्यों बाहर जा रहे हैं? …जाते जाते भी ग्रेस संधू ने नहीं दिखाई. ये मालिकों को नागवार गुज़रा. खबर है कि उन्हीं के दखल के बाद ये वीडियो यू ट्यूब, ट्विटर और फेसबुक से हटाना पड़ा. विदाई का वीडियो चैनल की वेबसाईट से भी हटा लिया गया है लेकिन पंजाब में चैनल चल न पाने की दुहाई 'द हिंदू' अख़बार की एक खबर के साथ टेक्स्ट के रूप में अब भी है. कंवर संधू का पुराना वीडियो भी है इसके साथ. देखिए …)

NOTE: Day & Night News is not available to viewers on the Cable Platform in Punjab, Chandigarh and Panchkula. This is because Day & Night News, which is a venture of Kansan News Private Limited, was taken off by the Cable Cartel in Punjab in early-2011, ostensibly because of its fair & fearless reportage.

On our complaint, the Competition Commission of India (CCI), in its order dated 03.07.2012 not only imposed on the various entities that have formed the Cable Cartel a penalty of Rs 8.04 Crore but also directed them to “cease and desist” from indulging in “anti-competitive practices.” The news report which appeared in newspapers is reproduced here for information of our readers/viewers.

Kanwar Sandhu
Managing Editor, Day & Night News

ये रहा उस का लिंक …

http://www.dayandnightnews.com/cant-watch-us-in-punjab

लेखक जगमोहन फुटेला वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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