यूपी के आईएएस अफसरों के गाल पर सीधा तमाचा है दुर्गा नागपाल का निलंबन। साथ ही भविष्य के लिए साफ तौर पर संकेत भी है कि यदि इस निलंबन को वापस नहीं लिया गया तो यह तय मानना चाहिए कि भविष्य में भी नौकरशाह सिर्फ राजनेताओं के इशारे पर ही नाचने को मजबूर होंगे। यूपी की नौकरशाही पहली बार इतने दबाव में आयी है कि उसे समझ ही नहीं आ रहा कि वह इस गलत काम का किस स्तर तक विरोध करे।
दुर्गा नागपाल का निलंबन आधी रात को किया गया। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री की सबसे ताकतवर सचिव अनीता सिंह ने रात के ग्यारह बजे के बाद कार्यवाहक मुख्य सचिव आलोक रंजन को फोन करके कहा कि ऊपर से कहा गया है कि तत्काल दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबित किया जाये। आदेश के बाद किसी को किसी से पूछने या कुछ सोचने की जरुरत ही नहीं बची। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो अनीता सिंह के फोन के बाद यूपी के अफसरों की इतनी हिम्मत भी नहीं थी कि वह अपने दिमाग का इस्तेमाल कर सकें।
किसी भी अफसर की तैनाती या निलंबन की फाइल नियुक्ति विभाग को बनानी होती है। प्रमुख सचिव नियुक्ति को ही यह फाइल तैयार करवाकर मुख्यमंत्री को देनी होती है अगर कोई ईमानदार प्रमुख सचिव नियुक्ति होता तो वह इस बात का विरोध करता और फाइल बनाने से मना करता। पर सरकार ने ऐसी ही परिस्थितियों को ध्यान में रखकर एक बेईमान और तीन साल के सजायाफ्ता अफसर राजीव कुमार को प्रमुख सचिव नियुक्ति बना रखा है। अब जिस अफसर को खुद भ्रष्टाचार के मामले में तीन साल की सजा हो चुकी हो वह भला किस मुंह से सरकार को सलाह दे सकते है। लिहाजा आधी रात को बिना किसी ठोस कारण के दुर्गा शाक्ति को निलंबित कर दिया गया।
सरकार और उसके चमचे बड़े अफसर जब अपनी इस कारगुजारी को अंजाम दे रहे थे तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि इस निलंबन पर इतना भारी बवाल मच जायेगा। सुबह जैसे ही यह खबर अखबार और चौनलों पर चली तो नोएडा में हड़कंप मच गया। नोएडा से निकली खबर देखते ही देखते पूरे देश में फैल गयी। कुछ घंटों में ही सबको समझ में आ गया कि सरकार में मंत्री स्तर का दर्जा पाये नेता के गुर्गों को रेत खनन से रोकना दुर्गाशक्ति को भारी पड़ गया। दुर्गा शक्ति नागपाल लगातार खनन मफियाओं की गुंडागर्दी को रोकने की कोशिश कर रहीं थीं।
खनन माफियाओं ने लगातार दुर्गा शक्ति नागपाल को प्रलोभन और धमकी दोनों दीं मगर वह नहीं मानीं। निलंबन से ठीक एक दिन पहले दुर्गा शक्ति नागपाल ने दो दर्जन खनन माफियाओं की गाड़ी बंद कर दी थीं। पिछले दो महीनों में वह दो सौ से अधिक खनन माफियाओं की गाड़ी जब्त कर चुकी थीं। आखिर जब वह नहीं मानी तो इसकी शिकायत ऊपर तक पहुंचायी गयी। मगर अपनी तेजतर्रार शैली से दुर्गाशक्ति लोगों की निगाहों में नायक बन चुकी थीं। देश के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार ने पहले पेज पर ही दुर्गा शक्ति की तारीफ में खबरें छापी थीं।
इस निलंबन से सब लोग भौचक्के थे। इसके बाद जब टीवी चौनलों पर खबर चलना शुरू हुई कि आखिर आईएएस एसोसिएशन इसका विरोध क्यों नहीं कर रही है तो एसोसिएशन के लोगों को थोड़ी शर्म आयी। एसोसिएशन के पदाधिकारी कार्यवाहक मुख्यसचिव आलोक रंजन से मिले और अपना विरोध दर्ज कराया।
मुख्यमंत्री तब कर्नाटक के दौरे पर थे। उन्होंने लौट कर मामले को देखने को कहा। मगर जब तक मुख्यमंत्री लखनऊ लौटे तब तक मामला तूल पकड़ चुका था। राजनैतिक हालात इतना बदल चुके थे कि मुख्यमंत्री ने बयान दे दिया कि दुर्गा शक्ति ने मस्जिद की दीवार गलत तरीके से गिरवायी जिससे धार्मिक भावनायें भड़क सकती थीं। लिहाजा यह निलंबन जायज है और उसे किसी भी कीमत पर वापस नहीं लिया जायेगा।
प्रदेश के आईएएस मुख्यमंत्री के इस कदम से भौचक्के थे। उन्हें लग रहा था कि मुख्यमंत्री उनकी भावनाओं को समझ कर यह निलंबन वापस ले लेंगे। मगर मुख्यमंत्री के इन तेवरों से आईएएस एसोसिएशन के लोगों की कंपकपी चढ़ गयी। यूपी में आईएएस एसोसिएशन लंबे समय से बेहाल हालत में है।
मायावती के शासनकाल में एक आईएएस हरमिंदर राज सिंह ने खुद को गोली तक मार ली थी। मगर एसोसिएशन के पदाधिकारी इसके विरोध में आंदोलन तो क्या बैठक तक नहीं कर पाये थे। अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद एसोसिएशन सक्रिय हुई। पांच साल बाद एसोसिएशन ने बैठक करी। मुख्यमंत्री के साथ मैच खेला। मगर यह दोस्ती दुर्गा शक्ति नागपाल को लेकर एक बार फिर बिगड़ गयी है। सभी अफसर मान रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के साफ आदेश हैं कि कोई भी धार्मिक स्थल बिना अनुमति के नहीं बनाया जा सकता।
इन स्थितियों में दुर्गा शक्ति नागपाल ने सही कदम उठाया। मगर अब मुख्यमंत्री के सामने यह बात बोलने की हिम्मत किसी में नहीं है। सभी कह रहे है कि कोई इतना असाधरण मामला नहीं था कि जिसके लिए आधी रात को दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबित किया जाता। मगर यह बात मुख्यमंत्री के सामने कहने का मतलब है कि अगले तीन साल महत्वहीन जगह पर तैनाती। यूपी के आईएएस अफसर पोस्टिंग और पैसा कमाने के चक्कर में अपनी इज्जत बेचने को तैयार बैठे हैं।
यही कारण है कि सरकार चलाने वाले लोग आईएएस अफसरों को लगातार बेइज्जत कर रहे हैं। उन्हें पता है कि कमाऊ कही जाने वाली पोस्टिंग पाने के लिए अफसर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। लिहाजा नेता भी अफसरों को अपनी मनमर्जी के मुताबिक काम करने को कहते हैं। अफसरों ने भी अपनी नौकरी को व्यापार समझ लिया है। कुछ दिन पहले तक मंडल में तैनात एक आईएएस अफसर आबकारी विभाग में अपनी तैनाती को लेकर इतना बेचैन हो गये कि उन्होंने पोंटी चड्ढा के बेटे के पैर तक छू लिये। उनको बता दिया कि एक बार तैनात करवा दीजिए फिर विभाग में जो चाहे करिए। उन्होंने भी इन अफसर को निराश नहीं किया। यह अफसर मायावती सरकार में भी इसी तरह से या फिर पैसे खर्च करके हमेशा बढिय़ा पोस्टिंग पाते रहे हैं।
सरकार को भी पता है कि जब बड़े अफसर इस तरह अपनी इज्जत दांव पर लगाकर तैनाती मांगेगे तो उनसे मनचाहा काम करवाया जा सकेगा। हलांकि केन्द्रीय आईएएस एसोसिएशन के तेजतर्रार नेता संजय भूस रेड्डी के नेतृत्व में कुछ अफसरों ने प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात मंत्री नारायण सामी से मुलाकात कर अपना विरोध दर्ज कराया। उधर नोएडा के डीएम कुमार रविकांत सिंह ने हिम्मत दिखाते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा कि एसडीएम ने मस्जिद नहीं गिरवायी। देखना यह है कि अभी यूपी के अफसरों की बेइज्जती और होगी या फिर अब इस फजीहत के बाद अफसर अब अपनी कार्यशैली को सुधारेंगे।
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं और वीकएंड टाइम्स हिंदी वीकली के संपादक हैं.





