प्रति, असिस्टन्ट लेबर कमिशनर, जलगांव – 425001. विषय : 26/07/2013 को आपके ऑफिस में की गई इंटर्वेंशन रिक्वेस्ट (हस्तक्षेप बिनती) पीछे लेना और मैटर क्लोज करना. मा. महोदय, मैं भास्कर समूह के दैनिक दिव्य मराठी अखबार, डीबी कॉर्प लिमिटेड, 44, नई पेठ, बँक स्ट्रीट, जलगाव – 425001य इस आस्थापना में न्यूज एडिटर के पद पर कार्यरत हूं, को स्टेट एडिटर अभिलाष खांडेकर द्वारा इस्तीफे लेकर जारी दबाव और रेजीडेंट एडिटर दीपक पटवेद्वारा अभद्र व्यवहार के संबंध में उन्हे उचित समझ देने हेतु मैंने आपसे मदद मांगी थी.
17 जुलाई 2013 को मैंने आपके ऑफिस में इंटर्वेंशन रिक्वेस्ट (हस्तक्षेप बिनती) दर्ज की थी. इस विषय में 29 जुलाई को शाम 4.30 बजे सुनवाई रखी गई थी. किंतु लेबर कमिशनर ऑफिस से नोटिस मिलते ही मुझे 24 जुलाई को आनन-फानन में जळगाव से औरंगाबाद मुख्यालय बुलाया गया. वहां मुझे सोलापूर जाने का ट्रान्स्फर ऑर्डर दिया गया जो मैंने रिसीव्ह किया, एक्सेप्ट नहीं!
ज्ञात रहे, मैं आपके पास आया तो वो मेरी मजबूरी रही. सीनिअर्स मेरी एक बात सुनने तैयार नहीं थे. मैं तो 18 जुलाई को औरंगाबाद जाकर इस्तीफा सौंपने वाला था. मुझसे इस्तीफा मांगने वाले अनजान खांडेकर जी दो-चार मिनट मेरा पक्ष सुनें, इतनी सी गुजारीश थी. किंतु वो न जाने किस धुन में थे तथा उन पर 'आरई' की क्या 'मोहिनी' छा गई थी! इसी के चलते मेरे पास कोई और मार्ग नही था और मैंने आपके द्वार खटखटाए. जिंदगी में न जाने कितनी नौकरियां बदलीं, बिना कही और नौकरी लिए ऐसे ही एक दिन में इस्तीफे दे दिए किंतु कभी लेबर कमिशनर के पास नही गया. इस बार आया क्योंकि मजबूर किया गया था!
मेरा संघर्ष 'दिव्य मराठी' या भास्कर/ डीबी कॉर्प अथवा एम्प्लोयर या मैनेजमेंट इन सभी के खिलाफ कतई नहीं रहा है. कई बार ऐसा हो जाता है कि हायली पेड वरिष्ठ लोग जो कि मालिक के इनर सर्कल के अंदर होते हैं वो अपनी ईगो या प्रतिष्ठा के इश्यूज हम जैसे छोटे-छोटे लोगों से बना लेते हैं. वो एक अपनी भूमिका इसी ईगो से बना लेते हैं. फिर इन सब ग्राउंड रिएलिटीज से बेखबर, अनजान मालिक/मैनेजमेंट इस अंधी दौड़ में छोटे से सिपाही के ही खिलाफ सीना ताने खड़े हो जाते हैं. खैर, मेरा संघर्ष तो मालिक द्वारा प्रदान अधिकारों का गलत इस्तेमाल कर रहे चंद खांडेकर और पटवे जैसे प्रवृत्तियों के खिलाफ रहा. अपनी बात मनवाने हेतु अगर यह लोग मैनेजमेंट को घसीटकर बीच में ले आए, संस्था की प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी, तो क्या वो मेरी गलती रही? मेरे हक की लड़ाई पूर्णत: खांडेकर, पटवे जैसे 'हम करे सो' वाली प्रवृत्ति के खिलाफ रही, ना कि इन व्यक्तियों के खिलाफ!
बिना जांच-पडताल किए संस्था द्वारा सेट पैरामीटर्स, गैलेप सर्व्हे, संवाद फीडबैक, केआरए-एप्रायजल को रिव्ह्यू किए बिना चल रही धांधली के खिलाफ मेरी हक की लड़ाई रही. सत्य मेरे साथ रहा और उन्हें झूठ का आधार लेना पड़ा. दो लोग 'महाराष्ट्र टाईम्स' में चले जाने से खांडेकर इतने क्यो तिलमिलाए? ऐसी कौन सी आग लाग गई? इनका पिट्टू बना पटवे जिसकी पोल एक्झिट इंटरव्ह्यूमें खुल जाती तो उसे बचाने की यह गंदी चाल रही. इतना क्या 'खुश कर दिया' पटवे ने इन खांडेकर महोदय को?
कर्मचारी हित देखे बिना, कोई जांच किए बिना बस बड़े लोगों के कहने पर कठपुतली की तरह झूम रहे 'एचआर' का रवैया बेहद निराशाजनक रहा. ऐसे लोगो से कार्मिक हित, एम्प्लोयी के भले की बात की अपेक्षा रखना, निस्पक्षता, तटस्थता तथा न्याय की अपेक्षा रखना मूर्खता रहेगी. जिस अखबार द्वारा सत्य धर्म के पालन एवं रक्षा की अपेक्षा रखी जाए वही झूठ के संग अगर असत्य के मार्ग पर चल पड़े तो ऐसी नैया में क्या और क्यों रहना?
एक कठपुतली बना 'एचआर' डिपार्टमेंट, गलत लोगों का साथ देता प्रबंधन, महाराष्ट्र को अपनी जागीर मान बैठे खांडेकर एवं धुलिया में जातिवाद के एक क्रिमिनल केस में आज भी आरोपी बनकर पेश होनेवाले 'आरई' पटवे इन सभी का निषेध करते हुए मैं एमडी सुधीरजी को आज त्यागपत्र सौंप रहा हूं. बेखबर-अनजान मालिक उसे देखे, ना देखे इस सब एपिसोड में तो महाराष्ट्र में 'भास्कर' की छवि पर धब्बा लग जाएगा. कर्मचारी आगे से जरूर सोचेगा कि उसे काम करने का क्या फल मिलता है. उसे संस्था के प्रति नहीं व्यक्तियों के प्रति निष्ठा रखना है.
मेरे त्यागपत्र के साथ मैने यह विषय अब खत्म कर दिया है. कृप्या आप भी इस फ़ाईल को बंद करें. मैं 26/07/2013 को आपके ऑफिस में की गई इंटर्वेंशन रिक्वेस्ट (हस्तक्षेप बिनती) पीछ ले रहा हू. कृपया अब यह मैटर क्लोज करें.
धन्यवाद!
आपका,
विक्रांत पाटील.
(न्यूज एडिटर, दिव्य मराठी, जलगाव)
डेट : 02/08/2013
साथ संलग्न/ऐटेच :
एमडी सुधीरजी को सौपा त्यागपत्र
प्रति,
मा. सुधीरजी अग्रवाल,
एमडी डीबी कॉर्प, भोपाल.
मा. महोदय,
सस्नेह नमस्ते!
जलगाव 'दिव्य मराठी' के 11 सितम्बर 2011 के प्री-लॉन्च से इस संस्था से जुड़े रहने का सौभाग्य प्राप्त रहा. हमने यहां कठोर परिश्रम लिए. अखबार/संस्था का लौकिक बढाने हेतु दिन-रात एक कर दिया. अखबार के कामकाज संबंधी अगर कोई गलती का कारण मुझसे पूछा जाता, इस्तीफा मांगा जाता तो उसमें बुरा लगने का कतई सवाल ही नहीं होता. किंतु स्थानीय एडिटोरियल लोगों दवारा और उनके बहकावे में आकर दुर्भाग्यवश स्टेट एडिटर अभिलाष खांडेकर द्वारा भी मेरे खिलाफ टीम के लोगो को महाराष्ट्र टाईम्स अखबार में जाने हेतु प्रेरित करने का बेबुनियाद, निहायत झूठ रचा गया. इसी अधार पर खांडेकरजी ने मुझे इस्तीफा देने के लिये कहा. लेकिन मैंने उससे मना करने पर, जहां पहिले से ही दो न्यूज एडिटर कार्यरत हैं ऐसे सोलापूर जैसे दूर-दराज इलाके में मेरा ट्रान्स्फर कर दिया.
जहां ऑर्गनायजेशन के लिए खून-पसीना एक किया वहां से विदा लेते हुए आज मुझे बहुत दु:ख हो रहा है. उससे भी ज्यादा वेदना हो रही है अनजान व्यवस्थापन को बहलाकार रचे गए झूठे और तर्कहीन आरोपो से!
मेरी मराठी पत्रकारिता की पात्रताएं सिद्ध करने की कोई जरूरत नहीं किंतु मैं आपको यह बता दूं कि पूना विश्वविद्यालय के रानडे इन्स्टीट्यूट जैसे नामांकित और बेहतरीन जर्नलिज्म स्कूल से मैंने पत्रकारिता की डिग्री हासील की. केवल कुमार और अरुण साधू जैसे शिक्षकों से इन्नोवेशन्स और अलग अंदाजमें पत्रकारिता की शिक्षा हासिल हुई. कुमार केतकरजैसे कई जाने-माने व्हीजिटिंग लेक्चरर्स द्वारा भी मार्गदर्शन मिला. 'सकाल' जैसे संस्था में मेरे डेस्क वर्क और प्रामाणिक पत्रकारिता की नींव रखी गई. 'दिव्य मराठी' द्वारा चयनित किए जाने के बाद मैंने दो सालों में अपनी योग्यता साबित कर दिखाई. जलगांव में मैं संस्था का शुरू से साथी रहा, फ़ाउंडर मेंबर!
काम के प्रति बेईमानी, संस्थागत नियमों का भंग, ब्रांड के इमेज में बाधा.. ऐसा कोई अपराध मैंने किया है, मैनेजमेंट की प्रतिष्ठा पर दाग लगाया है, ऐसा एक भी इन्सीडेन्स कोई नहीं दिखा सकता, इस बात का मैं गौरवपूर्ण उल्लेख जरूर करना चाहूंगा. 'दिव्य मराठी' मेरा श्वास बन चुका था; मेरा विश्वास था. चाहता तो मै भी 'महाराष्ट्र टाईम्स'के लिए बाहर जा सकता था. यहा हर एकका सपना होता है – 'महाराष्ट्र टाईम्स'से जुडनेका! लेकीन मैने यह बात सोची भी नही. क्योकी मेरा 'दिव्य मराठी'से एक अतूट रिश्ता बन चुका था. मैने अगर कभीभी, कोईभी बात कही होगी तो वो संस्थाके हितमेही! 'दिव्य मराठी'से लगाव, समर्पण और अपनेपनकी भावनासेही मैने गलत चल रही बातोसे खुलकर संबंधितोको अवगत कराया था. इसमे मेरी क्या स्वार्थभावना रही होगी?
अखबारके सभी रिपोर्टर्स प्रामाणिकतासे काम करे; इस भावना में मेरा क्या स्वार्थ था? कोई ऐसा एकभी उदाहरण दिखा दे की, मैने 'दिव्य मराठी'के मासिक पारिश्रामिकके अलावा कोई लाभ प्राप्त किया हो या बाहरसे किसीसे कोई गिफ्ट्स स्वीकारे हो. नि:स्वार्थ एवं निष्ठा से किए गए सेवाकी कदर ना किये जानेसे मेरी कोई नाराजगी नही किंतु व्यक्तिगत ईगो हेतु जीन लोगोने पर्सनल रायव्हलरी बनाकर कंपनीको बिना किसी वजह इस पुरे एपिसोड में खींचा; उन लोगोमेंही मैनेजमेंटद्वारा विश्वास रखा जाना अत्यंत कष्टप्रद; क्लेशकारी है.
'दिव्य मराठी' से दो लोगों का 'महाराष्ट्र टाईम्स' में जाना; इसमें मेरी कोई गलती नहीं. उन्हें इस कदम के लिये किसने मजबूर किया, यह उनके 'एक्जिट इंटरव्यू' खुलकर बता रहे हैं. बेबुनियाद आरोप एवं झूठ के इमले रचकर मुझे 'दिव्य मराठी' से निकलवाने का षडयंत्र रचने वालों के साथ ही मैनेजमेंट का खड़ा रहना और ईमानदारीसे काम करने वाले का बलि दिए जाना, इस बेहद कटुतापूर्ण अनुभव के साथ आज मैं अपने ही घर से बाहर जा रहा हूं. इस बात का दु;ख तो अतीव है.
'दिव्य मराठी' का मैं त्याग नहीं कर रहा हूं. 'दिव्य मराठी' पर मैंने जान दी, यह प्यार हमेशा कायम रहेगा. 'दिव्य मराठी' को मेरी सदिच्छाएं सदैव रहेगी. लेकिन आज मैं छोड़ जा रहा हूं अन्यायी और असत्यवचनी मैनेजमेंटको! असिस्टन्ट लेबर कमिशनर को मैं इस पत्र की कॉपी भेज रहा हूं. मैने वहां की हुई इंटरवेंशन रिक्वेस्ट भी मैं पीछे ले रहा हूं. धन्यवाद!
विधी सल्लागार श्री. जगतराव सोनवणेद्वारा दी गई सलाह मैने बहुत सोचने के बाद स्वीकार की. उनके द्वारा मुझे लिखे गए पत्र की कॉपी भी आपके जानकारी हेतु संलग्नित कर रहा हू. श्री. जगतराव सोनवणेजी का परिचय मैं यहां नहीं करवा रहा हूं. अगर आपको आवश्यक लगता है तो आप वो जानकारी हासिल कर सकते हैं. आपके प्रति आदर कायम रखते हुए धन्यवाद!
आपका
विक्रांत पाटील
दिनांक : 02/08/2013





