Mayank Saxena : कल शाम रुद्रप्रयाग के पहले रास्ते में पता चला कि टीवी पर अपन लोगों की स्टोरी चली है…बोले तो सीएनएन-आईबीएन पर…अंग्रेज़ी जानने वालों ने देखा भी…और बताया भी…अपन नहीं देख पाए…ख़ैर पायलट योगेंद्र अचानक मयाली के पहले बोले कि देखते हैं…चला जाएगा रात को ही गुप्तकाशी… गुप्तकाशी का रास्ता बेहद जोखिम भरा है…दिन में भी…फिर हम तो रात को चले थे…एक से एक ख़तरनाक रास्ते पार करते हुए हम डिडौली भी पार कर गए…जान हलक को आती रही…भूख परेशान करती रही…अचानक सामने ही एक जगह लैंड स्लाइड हो गई…गुप्तकाशी में बेस कैम्प पर खाना बना कर रहने को कहा था…
जा कर देखा तो समझ आया कि रात को लैंड स्लाइड का मलबा साफ नहीं किया जा सकता है…कुछ और लोग एक और गाड़ी से पहुंचे थे, उन्होंने कहा कि कर के देखते हैं…लेकिन ज़रा सा मलबा हटाते ही ऊपर से और लैंड स्लाइड शुरु हो गई…अंततः रात जंगल के बीच एक सड़क पर गाड़ी में सोकर ही काटनी पड़ी…सब भूखे थे और खाने को पास में कुछ नहीं…आखिरकार GOONJ ने बच्चों में बांटने के लिए चॉकलेट हॉर्लिक्स के जो पाउच दिए थे, उनको खा कर किसी तरह भूख से युद्धविराम किया गया…कितने खा पाए होंगे…आप ख़ुद ही अंदाज़ा लगाइए…
सुबह आर राहगीरों की मदद से एक बार फिर बूंद Boond के 4 जियालों ने सड़क साफ की…पायलट योगेंद्र ने शानदार तरीके से ख़तरनाक रास्ते को पार किया…लेकिन दो किलोमीटर आगे एक और लैंड स्लाइड इंतज़ार कर रही थी…उसको भी पार किया गया…लेकिन रास्ते में मेरी ज़िद पर एक जगहकम से कम चाय पीने के लिए गाड़ी रोकी गई…जगह थी छेनाघाट… Nalin Mishra रात से भूख से परेशान थे…लेकिन ये चूक भारी पड़ गई…
चाय पीते पीते ही सामने पुल के बार एक और लैंड स्लाइड हुई, रास्ता फिर से अवरुद्ध था…पायलट सहब लगातार चाय के लिए मना कर रहे थे…ख़ैर बारिश बंद होते ही और लोगों के साथ फिर बूंद यानी कि फिलहाल मैं, Gaurav Gupta नलिन और योगेंद्र काम पर लगे…रास्ता बनाया गया और योगेंद्र ने अंततः फिर जोखिम लेकर गाड़ी कुदा दी…हम लैंड स्लाइड के पार थे….
ल्वारा गांव पहुंचते पहुंचते पता चला कि आगे एक और लैंड स्लाइड है…ये वो जगह है जो गुप्तकाशी के 2 किलोमीटर पहले है और हमेशा यहां भू स्खलन होता रहता है…ल्वारा में पुरानी दुकान पर रुक कर समोसों और पराठों का भक्षण किया गया…भूख के मारे बुरा हाल था…रास्ता खुलते ही योगेंद्र ने गाड़ी और गियर को साथा…और अगले 20 मिनट में हम बेस कैम्प यानी कि घर पर थे…
हम सुरक्षित हैं…संतुष्ट हैं…खाना भी खाया है…स्वस्थ भी हैं…सुखी भी…पहले से कहीं ज़्यादा…
उम्मीद की बूंदें बरसती रहेंगी…भले ही तूफ़ान डराते रहें…ख़ामोशी को चुप्पी मत समझिएगा…शांति को युद्ध की तैयारी मानिएगा…
हम लड़ेंगे साथी…कि अब तक लड़े क्यों नहीं…
उम्मीद ज़िंदाबाद…
ज़िंदाबाद….
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Mayank Saxena : बूंद Boond की कहानी आज (सात अगस्त 2013) CNN-IBN दोपहर 1.30-1.50 के बीच प्रसारित करेगा…इस स्टोरी को Saahil Menghani ने किया है…इसमें बूंद के उत्तराखंड में अब तक किए गए काम के अलावा मेरा, Ila Joshi Deependra Raja Pandey और Nitish K Singh के उद्धरण भी हैं…ज़रूर देखें… आखिर दुनिया जाने कि उम्मीद कैसे जीतती है…
युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.
Yashwant Singh : जुझारू पत्रकार मयंक सक्सेना के सागर सरीखे 'बूंद' पर आज सीएनएन-आईबीएन पर स्टोरी दिखाई जाएगी, अबसे कुछ ही देर बाद, डेढ़ बजे से… आप सभी जरूर देखें और बताएं कि चैनल ने क्या दिखाया – बताया… मयंक और उनकी टीम ने 'बूंद' के जरिए गजब कर दिखाया है… दर्जनों प्रदेशों के सैकड़ों युवाओं को जोड़ा और सबको उत्तराखंड के आपदा ग्रस्त इलाके में वालंटियर के रूप में उतार दिया गया… शोक संतप्त और अभाव गरीबी से जूझ रहे लोगों को न सिर्फ इन लोगों ने दिलासा दिया बल्कि उनके साथ रह कर उनकी शोक दुख में शरीक हुए, उनके संग रोए, उनकी जरूरतों को जाना और पूरा किया… गजब का माद्दा है भई मयंक, इला और इनके सभी साथियों में… सैल्यूट.. और, साथ में यह प्रस्ताव भी कि हम जैसे अराजकों को भी उधर ही बुलवा लो… पहाड़ गांव घूमेंगे तो शायद जिंदगी में नयापन ताजगी लौट आए…
भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.
Vandna Tripathi : कल Mayank Saxena से फोन पर बात करके इतनी ख़ुशी हुई जैसे किसी सेलेब्रिटी सितारे से बात हो गयी हो…सच औरों के लिए अपनी नौकरी, सुख-सुविधा,सगे सम्बन्धियों को छोड़ कर, उत्तराखण्ड मे उनके पुनर्वास के लिए सच्चे मन से जी-तोड़ मेहनत करने वाले "मयंक की टोली" के नौजवान मेरे लिए किसी सुपर हीरो से कम नही….आइये हम आप भी अपनी सामर्थ्य भर सहयोग करें उनका ..उन्हे वालंटियर्स की जरूरत है नौजवान मित्र इस जरूरत को पूरा करें …और हम आर्थिक मदद देकर, उनके द्वारा किए गए कार्यों की सराहना कर के उन जियाले नौजवानों का मनोबल बढ़ा सकते हैं….कीजिये अच्छा लगता है…!
वंदना त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से.
Ankur Vijaivargiya : Mayank सर को पिछले छह सालों से जानता हूं। माखनलाल में मेरे सीनियर थे। छह सालों में जब भी उनसे मिला हूं, किसी ना किसी मुद्दे पर बहस ही हुई है और अमूमन हर बार उनके तर्क पर असहमति ही जताई है। पर पिछले एक महीने से उन्होंने उत्तराखंड में जो काम किया है, उस पर बिना किसी बहस के उनके इस शानदार प्रयास की तारीफ के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। मुझे ये स्वीकारने में भी जरा हिचक नहीं है कि जितनी हिम्मत इस काम के लिए मयंक सर जुटा पाते हैं, मेरे लिए उसके बारे में सोचना ही बड़ी बात है। सलाम मयंक सर, आपके इस जज्बे और आपकी पूरी टीम को। हमेशा ऐसे ही जिंदादिल बने रहिए….
अंकुर विजयवर्गीय के फेसबुक वॉल से.

उत्तराखंड में खुशियां बिखेरते ‘बूंद’ टीम के जन्मदाता द्वय मयंक और इला
Devika Chhibber Mehta : Some people lack destiny, some lack courage, some lack the will to fight, but some create it all. Proud to be friends with you both Mayank Saxena, Ila Joshi.
देविका छिब्बर मेहता के फेसबुक वॉल से.
Mayank Saxena : पिछले एक महीने में जो नींद आती है…वो अद्भुत है… बूंद Boond के ज़्यादातर वालंटियर्स इससे पहले देर रात तक जगने वाले प्राणी थे…लेकिन अब कई बार 25 किलोमीटर की दूरी पैदल चल कर रोज़ गांवों में जाने वाले साथियों समेत मैं…रात को हम सब जब दुखता बन लेकर निढाल हो कर बिस्तर पर गिरते हैं…तो क्या नींद आती है साहब…
शेर याद आ गया एक..
सो जाते हैं फुटपाथ पर, अखबार बिछा कर
मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते
युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.
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Mayank Saxena : और जैसे कि दुनिया बदलती है… Ahmer Khan गुप्तकाशी से अपने घर लौटे…ज़ाहिर है कि ईद थी और अहमर को घर जाना ही था…यहां वो पिछले 20 दिनों से उम्मीद उत्तराखंड के लिए काम में लगे थे… यहां आने से पहले अहमर के घर में उनके उत्तराखंड की आपदा में चले आने को लेकर को भी इत्तेफ़ाक नहीं रख पा रहा था…अहमर सोच कर गए थे कि लौट कर न जाने क्या होगा…घर के एक सदस्य ने तो तंज़ भी किया था…ज़ाहिर है हमने ऐसा ही समाज रचा है…मंदिरों और मस्जिदों को इंसानों से अहम बना देने वाला…
ख़ैर, कभी जीवन में मिले बड़े धोखे और झटके के बाद अहमर के वालिद की धारणा ये थी कि हिंदू आमतौर पर कभी मुसलमान का साथ नहीं देगा…अहमर घर पहुंचे…और उनसे यहां का हिसाब किताब लिया गया…
आप हैरान मत हो जाइएगा…जब अहमर ने यहां किए गए कामों का लेखा जोखा दिया…तो घर का एक एक शख्स खुशी से झूम उठा और वालिदैन का सीना चौड़ा हो गया…फ़ख्र की बातें तमाम थीं क्योंकि अहमर अब तक के सबसे सफल वालंटियर्स में से एक रहे हैं…लेकिन दुनिया बदलनी बाकी थी अभी…
अहमर ने अपने अब्बू को एक वाकया बताया…कि कैसे जब गुप्तकाशी के रास्ते में एक शख्स मुसलमानों को गाली बक रहे थे…मैं तुरंत उनके पास गया था…मैंने अहमर का हाथ पकड़ कर उनसे कहा था…कि… "ये अहमर खान है…और ये मेरा भाई है…ये पिछले 15 दिन से आधा पेट खा कर और आधी नींद सोकर…जान जोखिम में डाल कर यहां काम कर रहा है…यहां के लोगों के साथ हंस भी रहा है और फूट फूट कर रो भी रहा है…"
आपको मालूम है…कल शाम अहमर का फोन आया था…मैं जानता हूं कि उसकी आंखों में आंसू थे…क्योंकि दूसरी ओर मेरी आंखों में भी आंसू थे…हम दोनों की आंखों में आंसू थे…क्योंकि इस वाकये को सुन कर अहमर के वालिद की आंखों में भी आंसू थे…
तब से अहमर के वालिद न जाने कितनी बार वो किस्सा सुन चुके हैं…अहमर भी बार बार किस्सागोई कर रहा है…
आपको मालूम है…हम दुनिया बदलने निकले हैं…और दुनिया ऐसे ही बदलती है…
मुझे Julius Caesar का पहले एक्ट का एक संवाद याद आ रहा है…
I am mender of souls….
जी हां हम आत्मा की मरम्मत करते हैं…तसल्लीबख्श तरीके से…हम कर रहे हैं…और करते रहेंगे…तब तक…जब तक कि दुनिया बदल नहीं जाती…तब तक…जब तक कि उम्मीद है…
उम्मीद ज़िंदाबाद…
बूंद ज़िंदाबाद…
ज़िंदाबाद….
युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.
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Mayank Saxena : टीम के कुछ सदस्यों को दिल्ली के लिए छोड़ने और गौरव गुप्ता को लेने के लिए आज ऋषिकेश के रास्ते में हूं…रात हो गई तो एक होटल में रुका हूं…होटलों के किराए लगभग नगण्य हो चुके हैं…रुद्रप्रयाग के एक होटल में हूं…अर्से बाद अच्छा पलंग देखा है…पाश्चात्य शैली का कमोड देखा और इस्तेमाल किया (फिलहाल ये बड़ी बात है)…महीने भर बाद टीवी देखा, एक फिल्म देख डाली…टीवी पर ख़बर देखी…दीवार पर पहली बार एक भी मकड़ी नहीं दिखी…हां, रात बहुत हो गई थी सो खाने के लिए सिर्फ फ्राइड राइस मिले…अर्से बाद इंटरनेट 3जी दिखा रहा है… Ravish Kumar का प्राइम टाइम देखने की कोशिश चल रही है…बिजली लगातार आ रही है…ये सब देखना सुखद है लेकिन उससे ज़्यादा सुखद है कि मैं और हमारी पूरी टीम उत्तराखंड में पिछले 1 महीने और 10 दिन से बिना इन सब सुविधाओं के हम खुशी खुशी रह रहे हैं…और इनका अभाव खलता नहीं है…
Aha Zindagi के एक अंक के लिए लिखे गए एक लेख में अपनी ही लिखी कुछ पंक्तियां याद आ रहीं हैं…आपसे साझा करता हूं…
"यकीन मानिए सुख-सुविधा एक बेकार और बेहूदा शब्दयुग्म है, ये साथ संभव नहीं। सुखी आप तब होते हैं, जब आप सुविधाओं के बिना जीना सीख लेते हैं। "
हां…हम लगातार सुविधाहीन हैं…लेकिन हम सुखी हैं…बेहद सुखी…
ज़िंदाबाद
युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.
Ila Joshi : कल रात से लगातार बारिश के बाद हुए भूस्खलन के बाद रुद्रप्रयाग की तरफ जाने वाला मार्ग बंद है, टीम बूँद ने जेसीबी के आने से पहले पत्थर हटा कर रास्ता खोलने में श्रमदान किया, अभी भी बहुत तेज़ बारिश हो रही है इसलिए रास्ता खुलने में अभी समय लगेगा…बिजली के तार टूटने की वजह से कल रात से शहर में बिजली नहीं है इसलिए ज़्यादातर वालंटियर्स के फ़ोन बंद हो गए हैं, हम सब यहाँ सुरक्षित हैं और बारिश रुकते ही मैं Pauline Huidrom और Nadeem Anwar के साथ दिल्ली के लिए रवाना होंगे.
'बूंद' टीम की नेतृत्वकारी सदस्या इला जोशी के फेसबुक वॉल से.
Mayank Saxena : "चलो भागो यहां से…राशन नहीं मिलेगा, कह तो दिया…तुम लोग नेपाली हो…पहले यहां के लोगों को राशन दे दें…" भूख से परेशान और जोशीमठ से भाग कर जान बचा कर गुप्तकाशी पहुंचे 20-25 नेपाली परिवारों के लोगों को गुप्तकाशी में ये कह कर आपदा राहत की टीम्स और स्थानीय लोगों ने राशन देने से इनकार कर दिया…वे भूल गए कि उत्तराखंड की आपदा में इस वक्त मदद कर रहे ज़्यादातर लोग भी उत्तराखंड के बाहर से ही आए हुए बाहरी हैं…विदेशी भी…
ये परिवार राशन की किल्लत से जूझ रहे थे…दो महिलाएं 8 माह से अधिक की गर्भवती थीं…और कई बच्चे गंभीर रूप से बीमार… बूंद Boond बूंद Boond Boond Volunteers की टीम ने इनको तुरंत गाड़ी में बिठाकर सरकारी अस्पताल की ओर कूच किया…और इन सबको को चिकित्सकीय सलाह उपलब्ध करवाई…अब हम इनके लिए रसद के इंतज़ाम की कोशिश में लगे हैं… GOONJ की ओर से अंशु गुप्ता ने आश्वासन दिया है कि वो हमारी पूरी मदद करेंगे… हम भी इंसानों की मदद के लिए पूरी इंसानी कोशिश करते रहेंगे…
ज़िंदाबाद…
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Mayank Saxena : बूंद Boond के साथ उम्मीद… उत्तराखंड में आने वाले साथियों के नाम एक अपील… हम यहां लोगों के लिए, उनके बीच, उनके साथ काम करने आए हैं…कृपया उम्मीद उत्तराखंड के साथ एडवेंचर टूरिज़्म या फिर आपदा पर्यटन करने के इच्छुक लोग न जुड़ें…ये लोगों का पैसा है…हम आपको इस संसाधन और पैसे पर पर्यटन नहीं करने दे सकते हैं…कृपया कोई और ज़रिया ढूंढें इस उद्देश्य के लिए…हमें बख्श दें…
युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.






