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आलोक तोमर की असलियत पता है?

अब आलोक तोमर को मुझसे ज्यादा कोई नहीं जानता। मेरी अपनी विनम्र राय में आलोक तोमर एक फर्जी आदमी है। साहित्यकार और उसमें भी कवि बनने निकले थे। बाकायदा इलाहबाद जा कर महादेवी वर्मा, इलाचंद्र जोशी, नरेश मेहता और उपेंद्र नाथ अश्क आदि से मिल आए थे। लेकिन फिर कविता पीछे रह गई और चूंकि पत्रकारिता में नाम और दाम दोनों थे इसलिए साहित्य के चोर दरवाजे से पत्रकारिता में घुस गए।

अब आलोक तोमर को मुझसे ज्यादा कोई नहीं जानता। मेरी अपनी विनम्र राय में आलोक तोमर एक फर्जी आदमी है। साहित्यकार और उसमें भी कवि बनने निकले थे। बाकायदा इलाहबाद जा कर महादेवी वर्मा, इलाचंद्र जोशी, नरेश मेहता और उपेंद्र नाथ अश्क आदि से मिल आए थे। लेकिन फिर कविता पीछे रह गई और चूंकि पत्रकारिता में नाम और दाम दोनों थे इसलिए साहित्य के चोर दरवाजे से पत्रकारिता में घुस गए।

इस बात का बहुत डंका पिटता है कि आलोक तोमर ने एमए हिंदी साहित्य की परीक्षा में विश्वविद्यालय में सर्वोच्च अंक पाए थे और यह रिकॉर्ड अभी तक बना हुआ है। अब आपको उनकी इस डिग्री की पोल बता रहे हैं। साहित्य वगैरह पढ़ते रहते थे इसलिए कोर्स में जो किताबे थी, वे ज्यादातर पहले से पढ़ रखी थी। घर वाले डॉक्टर बनाना चाहते थे इसलिए बीएससी भी कर रखी थी। अंग्रेजी भी मां ने ठीक ठाक सिखा दी थी। आलोक तोमर ने अपनी उत्तर पुस्तिका में अपनी ही कविताएं कभी धर्मवीर भारती और कभी अज्ञेय के नाम से विशेष टिप्पणी के तौर पर लिख दी। फिर टूटी फूटी अंग्रेजी में कीट्स, शैले, वर्डसवर्थ आदि के नाम से पेल दी, बहुत साल पहले दिवंगत हो चुके महावीर प्रसाद द्विवेदी को आलोचना और धर्मयुग पत्रिकाओं में लिखते हुए उनके उद्वरण लिख दिए और इस चकाचौंध में टॉप कर गए। सार यह है कि आलोक तोमर की एमए की डिग्री फर्जी है।

अब जरा पत्रकार आलोक तोमर की बात करते हैं। ग्वालियर के स्वदेश में काम कर रहे थे। अखबार संघ परिवार का था मगर आलोक तोमर मार्क्‍सवादी पार्टी की छात्र शाखा एसएफआई के सदस्य थे। संघ परिवार ने दयाकर के संघ कार्यालय में रहने के लिए कमरा दिया तो वहां कार्ल मार्क्स की तस्वीर ले जा कर टांग दिया। दूसरे दिन बाहर कर दिए गए। स्वदेश में काम करते हुए रिपोर्टिंग की और कुछ दिनों बाद घटना स्थल पर नहीं जाते थे, फोन पर ही सारी जानकारियां वे लेते थे और हिट रिपोर्टर कहे जाते थे। दिल्ली आ कर यूएनआई में काम किया, वहां एक दिवंगत खिलाड़ी से शतक बनवा दिया, नौकरी से निकाल दिए गए, कुछ दिन बाद जनसत्ता में प्रभाष जोशी ने काम और नाम दोनों दिलवाए और वहां दस साल पूरे करने के पहले एक लेख में शरारत करने के इल्जाम में बाहर कर दिए गए। यहां पर उन्हें संदेह का लाभ देना पड़ेगा क्योंकि लेख में हेर फेर करने के लिए हिंदी की टाइपिंग आनी जरूरी हैं और वह आलोक तोमर को आजतक नहीं आती।

जनसत्ता की नौकरी गई तो शब्दार्थ फीचर्स खोल लिया। उसके पहले भी नाम बदल कर इधर उधर लिखते रहते थे। शब्दार्थ फीचर्स का ऑफिस कनॉट प्लेस की एक पिछली गली में मोटर पार्टस के एक गोदाम के कोने में था। शब्दार्थ चल निकली और जब इंटरनेट का जमाना आया तो डेटलाइन इंडिया शुरू कर दी। सिर्फ आश्चर्य है कि सिर्फ तीन चार घंटे में आलोक तोमर रोज एक लेख भी लिख देते हैं और दर्जनों खबरें भी और इससे शक होता है कि कहीं वे चोरी, चकारी तो नहीं करते। आज तक पकड़े नहीं गए हैं।

आप में से ज्यादातर जानते होंगे कि आलोक तोमर दो बार तिहाड़ जेल हो आए हैं। पहली बार पुलिस कमिश्नर के के पॉल से एक दुखी आत्मा की वजह से झगड़ा मोल ले लिया था और फिर जिस पत्रिका के वे संपादक बनाए गए थे उसमें पैगंबर का कार्टून छापने के इल्जाम में जेल गए और अपने आपको देश ही नहीं, पूरी दुनिया के पत्रकारों का हीरो साबित करने की कोशिश की। इस मामले में वे पत्रिका के मालिक को भी जेल यात्रा करवा चुके हैं। इस मालिक बेचारे का कसूर यह था कि अरबपति होने के बावजूद या शायद उसी के कारण वह पुलिस के हवलदार से भी डरता था और जैसे ही आलोक तोमर थाने पहुंचे, मालिक ने अपने टीवी चैनल पर गिड़गिड़ा कर कहा कि माई बाप मेरा कसूर नहीं है। मैंने तो आलोक तोमर को नौकरी से निकाल दिया है। बेचारा इस एक बयान पर सह अभियुक्त बन गया।

दूसरी बार आलोक तोमर जेल गए थे तो वह कोई प्रेस की आजादी का मामला नहीं था। उन पर धारा 420 के तहत सीधे जालसाजी का आरोप लगा था जिसके अनुसार उन्होंने अपनी भूतपूर्व कंपनी का एक चेक फर्जी एकाउंट में कैश करवा लिया था। हालांकि इस फर्जी एकाउंट से आलोक तोमर का कोई लेना देना नहीं था और न उन्होंने एकाउंट खुलवाया था मगर इस पूरे गोरख धंधे की जानकारी उन्हें थी, इसलिए उन्हें बहुत नाटकीय तरीके से हवाई जहाज से उतरते हुए पकड़ा गया। जेल से निकलकर वे सीधे एक ताकतवर मुख्यमंत्री के पास गए, पूरी कहानी सुनाई, यह भी बताया कि कंपनी का मालिक कार्टून वाले मामले में कानूनी खर्चा तक नहीं दे रहा और मुख्यमंत्री ने मालिक को जो झाड़ पिलाई, अगली पेशी में आधे घंटे में मामला खारिज हो गया।

इन दिनों आलोक तोमर एक टीवी चैनल में काम करते हैं और वहां सलाहकार संपादक हैं। न उनके आने का वक्त तय हैं और न जाने का। जाते हैं और सलाह दे कर खिसक लेते हैं। बाकी समय डेटलाइन इंडिया को देते हैं। अब यह पता नहीं कि ठाकुरवाद की वजह से या वाकई उनकी पत्रकारिता के प्रति सम्मान भाव से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह उन पर बहुत कृपालु हैं और कभी वेबसाइट को विज्ञापन दे देते हैं और कभी मासिक आधार पर जनसंपर्क विभाग से वेबसाइट के लिए भुगतान करवाते रहते हैं। ऐसी ही कृपा मध्य प्रदेश सरकार की भी है।

कहानी लंबी हो रही है इसलिए चलते चलते बता दिया जाए कि भारतीय पत्रकारिता में आलोक तोमर से बड़ा शराबी शायद ही कोई दूसरा पैदा हुआ हो। हालांकि अब वे शराब छोड़ने की घोषणा कर चुके हैं लेकिन बीच-बीच में डंडी मार लेते हैं। पत्रकारिता में उनके सरोकार प्रभाष जोशी से शुरू होते हैं और शायद उन्हीं के साथ खत्म हो गए हैं। प्रभाष जोशी अपने इस सबसे प्रिय शिष्य को जीवन जीनेका सलीका नहीं सिखा सके। अब आप ही बताइए कि ऐसे आलोक तोमर पर आप कितना विश्वास करेंगे, जिसे आम तौर पर हर नौकरी से निकाला ही गया हैं? आज तक में गए तो सिर्फ चार महीने काम किया और इस्तीफा दे कर निकल लिए। वहां से जैन टीवी चले गए। वेतन नहीं मिला तो मालिक को ही मार बैठे।

पायोनियर गए तो उड़ीसा के चक्रवात से ले कर कारगिल के हालात पर लिखा लेकिन एक दिन अचानक एनडीटीवी में जी मंत्री जी लिखने पहुंच गए। फिर स्टार के लिए केबीसी लिखने मुंबई पहुंचे और बिग बी से पता नहीं क्या हुआ कि चालीसवें एपिसोड के बाद प्रोग्राम छोड़ कर स्टार के खर्चे पर अगले दिन दार्जिलिंग में छुट्टियां मना रहे थे। प्रभाष जोशी सही कहा करते थे कि आलोक तोमर प्रतिभाशाली हैं मगर उनके अंदर काम करने का सातत्य नहीं हैं और ऐसी प्रतिभाएं खुद विस्फोट हो कर नष्ट हो जाती है। आप सब आलोक तोमर के नष्ट होने की प्रतीक्षा कीजिए।

अपने बारे में यह लेख काफी पहले खुद आलोक तोमर ने लिखा है. उनका यह लेख डेटलाइन इंडिया से साभार लेकर यहां प्रकाशित की जा रही है. 

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