Om Thanvi : ऐसे संकट की घड़ी में जब हम एक लेखक की अनुचित गिरफ्तारी की निंदा कर रहे हैं, विद्वान अपनी दुश्मनियाँ निकाल रहे हैं! दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी शिक्षक आशुतोष कुमार (गाली-गलौज की बहस वाले) ने अपनी वाल पर लिखा है: " … (ओम थानवी द्वारा) किस खूबी से 'मदरसे' को 'मस्जिद' और 'गिरवा सकते हैं' को 'गिराने का आरोप' बना दिया गया है. क्या यह खालीपीली सांप्रदायिक उन्माद भडकाना नहीं है?"
उनकी हिंदी पर मत जाइए। यह देखिए कि एक लेखक सरकार के मानसिक दिवालियेपन से गिरफ्तार होता है; दूसरी तरफ यह अदना (फेसबुकी!) लेखक, दूसरे लेखक द्वारा ही सांप्रदायिक उन्माद भड़काने वाला घोषित किया जा रहा है!! गुरु-जी, न्याय मांगने से पहले अन्याय न करना तो सीखिए।
हुआ यह है: कल मैंने एक पोस्ट लिखी, जिसका मुख्य भाव इन शब्दों में था: "कँवल भारती की गिरफ्तारी की जितनी निंदा की जाय, कम होगी। सत्ताधारियों में सहनशीलता पहले ही कब थी; अब वह, लगता है, पूरी तरह छीज गई है। …मेरी आज़म ख़ां से कोई सहानुभूति नहीं; उन्हें घोर अयोग्य नेता मानता हूँ। पर यह भी मानता हूँ कि कँवलजी धार्मिक मामलों की नजाकत समझते हुए अपनी अभिव्यक्ति में अधिक सजगता बरत सकते थे। फिर भी, इस असावधानी के लिए उन्हें गिरफ्तार करना सत्ता का सरासर दुरुपयोग है।"
धार्मिक नजाकत का हवाला रामपुर में रमज़ान में मदरसा गिराने वाली कँवल भारती की एक टिप्पणी के सन्दर्भ में था। वह टिप्पणी मैंने दो बार उद्धृत की और दोनों जगह मदरसे को मदरसा लिखा। एक जगह मदरसे को मसजिद टाइप कर गया। यह मेरी चूक थी; इसकी ओर ध्यान जाते ही एक कमेन्ट में सुधार कर खेद जता दिया। दरअसल भारती की उस पोस्ट के शुरू में नोएडा की मसजिद का जिक्र था, शायद वह सन्दर्भ जेहन में रहा और भूल हुई। मदरसे को गिराए जाने का सन्दर्भ तो पोस्ट में है, जहाँ भारती कहते हैं कि रमज़ान में मदरसा रामपुर प्रशासन ने गिराया, गिराने वालों पर कार्रवाई नहीं हुई, हो भी नहीं पाएगी, क्योंकि रामपुर में सिर्फ आज़म ख़ां का राज चलता है; वे रमज़ान में मदरसा गिरवा सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं। .. अगर और कोई सन्दर्भ या दूसरा आरोप आज़म ख़ां पर पोस्ट में होता तो 'बेनिफिट ऑफ डाउट' शायद दिया भी जा सकता था। मगर चाकू चलने के तुरंत बाद सीधे-सीधे किसी ताकतवर का नाम लेकर कहा जाय कि वह चाकू चलवा सकता है, कुछ भी कर सकता है, तो आप हिंदी शिक्षक बनकर, प्रकारांतर से मुलजिम के हक में, चाकू चलाने और चला सकने का अर्थ-भेद खोजेंगे? आपका कोई स्टैंड भी है या हरदम निजी एजेंडा धारण किए चलते हैं!
आशुतोष कुमार ने हमें सांप्रदायिक उन्माद भड़काने वाला तो बता दिया, अब लगे हाथ अखिलेश सरकार से गिफ्तारी की मांग भी कर लेनी चाहिए। इस माहौल में शायद बात बन जाय!
वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.





