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आज की पत्रकारिता को आलोक तोमर की जरूरत थी

: आलोक तोमर के जन्‍म दिन पर विशेष : आलोक तोमर की जब पत्रकारिता को ज्‍यादा जरूरत थी तब वे हमारे बीच से चले गए. पत्रकारिता को आलोक तोमर की जरूरत आज इसलिए ज्‍यादा है क्‍योंकि आज पत्रकारिता में पत्रकारीय तेवर रखने वाले बहुत कम हैं. पत्रकारिता में पब्लिक रिलेशन करने वाले, पत्रकारिता में चारणगान करने वाले, पत्रकारिता में पॉलिटिकल पार्टी का एजेंडा लागू करने वाले लोग तो बहुत ज्‍यादा हैं लेकिन पत्रकारिता में पत्रकारिता का मान रखने वाले बहुत कम लोग हैं. आलोक तोमर ने पत्रकारिता में हमेशा जीवंतता को बनाए रखा.

: आलोक तोमर के जन्‍म दिन पर विशेष : आलोक तोमर की जब पत्रकारिता को ज्‍यादा जरूरत थी तब वे हमारे बीच से चले गए. पत्रकारिता को आलोक तोमर की जरूरत आज इसलिए ज्‍यादा है क्‍योंकि आज पत्रकारिता में पत्रकारीय तेवर रखने वाले बहुत कम हैं. पत्रकारिता में पब्लिक रिलेशन करने वाले, पत्रकारिता में चारणगान करने वाले, पत्रकारिता में पॉलिटिकल पार्टी का एजेंडा लागू करने वाले लोग तो बहुत ज्‍यादा हैं लेकिन पत्रकारिता में पत्रकारिता का मान रखने वाले बहुत कम लोग हैं. आलोक तोमर ने पत्रकारिता में हमेशा जीवंतता को बनाए रखा.

आलोक बहुत छोटी जगह से दिल्‍ली जैसे शहर में आए थे और इस बात की पूरी संभावना थी कि आलोक दिल्‍ली जैसे बड़े शहर की भीड़ का हिस्‍सा बन जाते या भीड़ में खो जाते, लेकिन आलोक तोमर ने अपनी जन्‍मभूमि के सम्‍मान की हमेशा रक्षा की. और बिल्‍कुल भिंड के तेवर में ही पत्रकारिता की. कभी किसी का अपमान नहीं किया लेकिन कभी किसी के सामने सर भी नहीं झुकाया. किसी से लड़े तो शालीनता रखी और जब लोगों से मिले तो उनका दिल जीत लिया. आलोक तोमर का व्‍यक्तित्‍व ऐसा था, जो हरेक को अलग अलग तरह की खुशबू देता था. किसी को आलोक में मानवता दिखाई देती थी, किसी को आलोक में जुझारूपन दिखाई देता था, किसी को आलोक में पत्रकार का अक्‍खडपन दिखाई देता था तो किसी को आलोक में अपना रिश्‍ता दिखाई देता था. आलोक करिश्‍माई पत्रकार थे और हमेशा खबर के पीछे पड़कर सत्‍य निकालने की कोशिश करते थे अब ऐसा करिश्‍मा देखने में नहीं आता.

आलोक को दिल्‍ली लाने में स्‍वर्गीय उदयन शर्मा का बहुत बड़ा रोल था. और रविवार ने आलोक तोमर को शुरुआती दिनों में निखारा, रविवार की पत्रकारीय शैली ने आलोक के ऊपर अमिट छाप डाली है. इतना ही नहीं आलोक तोमर जनसत्‍ता से जुड़कर और निखरे. आलोक लिखने में सामने वाले की शैली हूबहू उतार लेते थे. स्‍वर्गीय वीर बहादुर सिंह जब यूपी के मुख्‍यमंत्री थे और वे जब दिल्‍ली आते थे तो उनसे बहुत सारे पत्रकार इंटरव्‍यू लेते थे. आलोक ने एक इंटरव्‍यू लिया और वीर बहादुर सिंह की बोलने की पूर्वांचली शैली को ही अपनी हेडिंग बना दिया. वीर बहादुर सिंह का तकिया कलाम 'का हो' को हेडिंग बनाया. यह शैली चर्चित हो गई. आलोक विकास के रास्‍ते में आने वाले अवरोधों, दस्‍यु समस्‍या, बड़े नेताओं की असहजता और कुछ लोगों के बडप्‍़पन को हमेशा अपना विषय बनाते थे.

राजनेताओं मे आलोक तोमर की घनिष्‍ठता अर्जुन सिंह जी से सबसे ज्‍यादा थी. बहुत सारे पत्रकार, राजनेता, अधिकारी आलोक को अपना गार्जियन मानते थे, ल‍ेकिन इन सारी चीजों के बीच में आलोक तोमर ने कभी भी पत्रकारिता के मानदंडों को नहीं भुलाया. आलोक तोमर हमारे बीच नहीं है. लेकिन जब तक हम याद करने लायक रहेंगे हमेशा आलोक तोमर को उनके खुलुश उनके प्‍यार और पत्रकारिता के प्रति उनके डेडिकेशन को याद करते रहेंगे. आलोक का जाना सिर्फ उनकी पत्‍नी और परिवार के लिए ही अपूरणीय क्षति नहीं है बल्कि आज आलोक का न होना संपूर्ण पत्रकारिता के लिए बहुत बड़ी क्षति है.

संतोष भारतीय की गिनती देश के वरिष्‍ठ पत्रकारों में की जाती है. संप्रति वे साप्‍ताहिक चौथी दुनिया के प्रमुख संपादक हैं. यह लेख उनसे की गई बातचीत पर आधारित है.

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