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शेखर कपूर का धारावाहिक ‘प्रधानमंत्री’ महाराजा हरि सिंह को अपमानित करने की कुचेष्टा

शेखर कपूर विभिन्न विषयों को लेकर धारावाहिक या फिर फ़िल्में बनाते हैं । फ़िल्म बनाना अपने आप में एक बहुत बडी कलात्मक विधा है । किसी विषय का चयन करना और उसे दृष्यमान करना बहुत बड़ी चुनौती है । शेखर कपूर में इस चुनौती को पूरा करने की योग्यता है । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की निर्देशक जिस विषय को लेकर फ़िल्म बनाता है , वह उसका जानकार भी हो । वास्तव में उसे अधिकांश विषयों के बारे में प्रारम्भिक जानकारी भी नहीं होती । यह सारा धंधा विषय पर खोज करने वाले और पटकथा लेखकों का होता है ।

शेखर कपूर विभिन्न विषयों को लेकर धारावाहिक या फिर फ़िल्में बनाते हैं । फ़िल्म बनाना अपने आप में एक बहुत बडी कलात्मक विधा है । किसी विषय का चयन करना और उसे दृष्यमान करना बहुत बड़ी चुनौती है । शेखर कपूर में इस चुनौती को पूरा करने की योग्यता है । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की निर्देशक जिस विषय को लेकर फ़िल्म बनाता है , वह उसका जानकार भी हो । वास्तव में उसे अधिकांश विषयों के बारे में प्रारम्भिक जानकारी भी नहीं होती । यह सारा धंधा विषय पर खोज करने वाले और पटकथा लेखकों का होता है ।

उस माल को कलात्मक दृष्यमान अभिव्यक्ति देना ही निर्देशक का काम होता है । बाग़ में उछलने कूदने जैसे विषयों को लेकर जब फ़िल्में या धारावाहिक बनाये जाते हैं तो उसमें विवाद की गुंजाईश नहीं रहती । क्योंकि नायक नायिका के साथ निर्देशक भी उछल कूद करता रहता है । लेकिन कई बार निर्देशक ऐतिहासिक विषयों पर भी काम करना शुरु कर देते हैं । उसमें अतिरिक्त सावधानी की ज़रुरत रहती है । लेकिन लगता है शेखर कपूर ने प्रधानमंत्री के नाम से जो धारावाहिक बनाया है और जिसे पिछले दिनों ए बी पी पर दिखाया गया , उसमें उन्होंने वह सावधानी नहीं बरती । पर कुछ लोग शेखर कपूर को इतना सीधा मानने को तैयार नहीं हैं । उनका कहना है कि कपूर की अपनी एक निश्चित विचारधारा है ।

इसलिये जब वे राजनैतिक या ऐतिहासिक विषयों पर फ़िल्म बनाते हैं तो उसके माध्यम से वे अपना विशिष्ट संदेश देते हैं और अपनी विचारधारा का प्रचार करते हैं । अभी तक की सामग्री से यही कहा जा सकता है कि शेखर कपूर ने प्रधानमंत्री फ़िल्म में सामान्य सावधानी ही नहीं बल्कि अतिरिक्त सावधानी बरती है । लेकिन वह सावधानी कश्मीर के मामले में अपना या फिर कुछ दूसरी शक्तियों का ऐजंडा आगे बढ़ाने में ही बरती गई है ।

प्रधानमंत्री पर चर्चा करने से पहले शेखर कपूर का अपना एजेंडा जम्मू कश्मीर को लेकर क्या है , इसे जान लेना बहुत ज़रुरी है । जम्मू कश्मीर पर अपना या फिर अपने दोस्तों का एजेंडा स्पष्ट करना से पहले शेखर कपूर एक आधार भूमि स्थापित करते हैं कि ," याद रखो , भारत कभी भी एक देश नहीं था । यह अलग अलग राज्यों का समूह था जो अपनी इच्छा से कभी इक्कठे हो जाते थे और कभी परे छिटक जाते थे । अभी भी कमोवेश यही स्थिति है । इसलिये अच्छा है कि हम यानि भारत यूरोप की तरह बने । एक साँझे बाज़ार में भागीदार दस देश ।" वैसे शेखर कपूर का यह सूत्र पढ़ कर उनकी बौद्धिकता से आतंकियों होने की ज़रुरत नहीं है । जिन दिनों अंग्रेज़ों का इस देश पर राज्य था , उन दिनों ऐसे जुमला सातवीं आठवीं की इतिहास की किताबों में आम पढ़ाये जाते थे । ख़ैर इस समय इस पर चर्चा करने का प्रसंग नहीं है ।

अपनी इस आधारभूत स्थापना के बाद शेखर कपूर जम्मू कश्मीर के बारे में अपना एजेंडा स्पष्ट करते हैं । उसके अनुसार," भारत,पाकिस्तान,चीन,अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र संघ आपस में बैठ कर अगले पांच साल का एजेंडा तैयार करें जिसके अनुसार दोनों कश्मीर इक्कठे हो सकें । " दोनों कश्मीर इक्कठे होकर क्या करें , उसका संकेत भी शेखर ने आगे दिया है । उनके अनुसार," व्यक्तिगत तौर पर मेरा मत है कि यदि कश्मीर स्वतंत्र राष्ट्र बनना चाहता है तो भारत , पाकिस्तान और चीन को आपस में एक संधि करके इस नये राष्ट्र की प्रभुसत्ता की रक्षा की गारंटी देनी चाहिये । अन्यथा हम कश्मीर में एक और अफ़ग़ानिस्तान बना लेंगे। " जम्मू कश्मीर को लेकर कपूर ने अपना यह एजेंडा अगस्त 2008 में घोषित किया था ।

यह ठीक है कि पाकिस्तान और उस द्वारा पोषित आतंकवादी संगठनों ने कश्मीर को दूसरा अफ़ग़ानिस्तान बनाने का हर संभव प्रयास इन पाँच वर्षों में किया । उसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहायता चीन और अमेरिका ने भी की , जिनसे शेखर कपूर जम्मू कश्मीर के दोनों हिस्सों में सामान्य हालात स्थापित करने में  सबसे ज़्यादा आश्वासन दिखाई देते हैं । लेकिन इसे कपूर का दुर्भाग्य मानना चाहिये कि राज्य के डोगरों , गुज्जरों , बक्करवालों , पहाड़ियों , जनजातियों , शिया समाज , लद्दाखियों , कारगिल के बल्तियों और  पठान खानों ने कश्मीर को दूसरा अफ़ग़ानिस्तान बनने नहीं दिया । यह ठीक है कि घाटी के कुछ कौशुर भाषा बोलने वाले सुन्नी मुसलमानों ने विदेशी आतंकवादियों का साथ दिया लेकिन उनका भी जल्दी ही उनसे मोह भंग हो गया । दूसरे भारत अभी भी शेखर की इच्छानुसार यूरोप की तरह केवल साँझा बाज़ार विकसित करने के लिये दस देशों में नहीं बँटा ।

कश्मीर को लेकर अपना यह एजेंडा शेखर कपूर ने अगस्त 2008 में अपने ट्विटर पर जारी किया था और इसके पूरा होने में पाँच साल की अवधि की कल्पना की थी । लेकिन अब अगस्त 2013 में पाँच साल की अवधि तो पूरी हो गई पर दुर्भाग्य से कल्पना पूरी नहीं हुई । इसलिये शेखर कपूर को स्वयं मैदान में उतरना पड़ा । लेकिन इस मामले में वे अकेले नहीं हैं । यदि गिलानियों और यासिन मलिकों को छोड़ भी दिया जाये तो अरुन्धती राय , प्रशान्त भूषण और अब्दुल ग़फ़्फ़ूर अब्दुल मजीद नूरानी जैसे और भी कई इस मैदान में अरसे से चांदमारी कर रहे हैं । डा० सैयद ग़ुलाम नबी फ़ाई लम्बे अरसे से अमेरिका में बैठ कर कश्मीर को लेकर इसी प्रकार के एजेंडे पर काम कर रहा था । उसकी वाणी को बल देने के लिये दिलीप पडगांवकर से लेकर कुलदीप नैयर तक अमेरिका पहुँच जाते थे । यह तो बहुत बाद में पता चला कि कश्मीर को लेकर जिस एजेंडा को वह अपना बता रहा था , वह एजेंडा दरअसल पाकिस्तान की आई एस आई का था और फ़ाई तो मेहरा भर था । वह खुले में दिखता हुआ भी गुप्त एजेंडा पर काम कर रहा था । लेकिन अरुंधति राय से लेकर शेखर कपूर की इस बात के लिये तो प्रशंसा करनी पड़ेगी कि वे जो भी कर रहे हैं , वह खुल कर कर रहे हैं । उसमें कहीं कोई छुपाए या दुर्व्यवहार नहीं ।

शेखर कपूर क्योंकि फ़िल्म जगत के जीव हैं , इसलिये उन्होंने इस लड़ाई में फ़िल्म को ही ,अपना थीसिस आगे बढ़ाने में हथियार बनाया है । उनको इस काम के लिये कश्मीर के इतिहास में से किसी ऐसे नायक को तलाशना था जिसका कश्मीर को लेकर एजेंडा उनके आज के अपने एजेंडा से मिलता हो । इसके लिये शेख मोहम्मद अब्दुल्ला से बेहतर नायक कौन हो सकता था ? शेखर कपूर ने तो कश्मीर का स्वतंत्र देश बनाने और भारत , पाकिस्तान और चीन द्वारा उसकी रक्षा की गारंटी देने की बात 2008 में शुरु की लेकिन शेख ने तो यह सब 1948-49 में ही कहना शुरु कर दिया था । जो लोग "भारत कभी एक देश नहीं था"इस ब्रिटिश अवधारणा में अब भी विश्वास करते हैं ,उनके लिये सैक्युलर , प्रगतिवादीका , राष्ट्रवादी , आधुनिक और न जाने क्या क्या , वही हो सकता है जो भारत को तोड़ने की बात करे । इस फ़्रेम में शेख अब्दुल्ला के अतिरिक्त और भला कौन आ सकता था ? "प्रधानमंत्री" के अनुसार शेख दो राष्ट्र सिद्धान्त और भारत विभाजन के खिलाफ थे और पाकिस्तान में शामिल नहीं होना चाहते थे । जबकि दस्तावेजी प्रमाण कहते हैं कि जिन्ना शेख को घास नहीं डाल रहे थे , इसलिये वे पाकिस्तान जाने के इच्छुक नहीं थे । कश्मीर को स्वतंत्र देखने व करवाने के लिये वे अंतिम दम तक प्रयास करते रहे ।

शेखर कपूर अपने नायक शेख अब्दुल्ला का सहस्रनामा पढ़ते रहते , यह समझ में आ सकता है , लेकिन इसके लिये जम्मू कश्मीर के अंतिम शासक महाराजा हरि सिंह को गालियाँ देने की क्या ज़रुरत थी ? डाक्युमैंटरी के अनुसार हरि सिंह घोर साम्प्रदायिक व्यक्ति थे और जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र देश बनाना चाहते थे । इसमें शेखर कपूर का दोष नहीं है । लार्ड माऊंटबेटन के पूरा ज़ोर लगाने के बावजूद हरि सिंह ने राज्य को पाकिस्तान में मिलाने से इन्कार कर दिया , कपूरों और अरुन्धतियों की दृष्टि में इससे ज़्यादा साम्प्रदायिकता क्या हो सकती है ? वे पाकिस्तान में मिलने के बजाये हिन्दुस्तान में मिल गये यह तो फिरकाप्रस्ती की इन्तहा है । रही हरि सिंह द्वारा राज्य को आज़ाद रखने की बात । अभी तक इस बात का कोई दस्तावेज़ी प्रमाण हासिल नहीं हुआ है , सिवाय शेख जैसे लोगों की अफ़वाहों के । लेकिन शेखर कपूर के लिये हरि सिंह पर ये सारे आरोप लगाने ज़रुरी थे , क्योंकि वे फ़िल्म बना रहे थे और कोई भी फ़िल्म खलनायक के बिना पूरी नहीं हो सकती । जब शेखर कपूर , शेख जैसे लोगों को नायक का दर्जा देंगे तो हरि सिंह खलनायक के सिवा और क्या हो सकते हैं ? खलनायकी का सबसे बड़ा सबूत तो यही है कि उन्होंने जम्मू कश्मीर को भारत में मिला दिया जबकि कपूर तो अभी भी राज्य की स्वतंत्रता का ताबूत सिर पर उठाये घूम रहे हैं । शेखर कपूर द्वारा हरि सिंह को इस प्रकार अपमानित करने से राष्ट्रवादी शक्तियाँ सकते में हैं । कुछ का यह भी कहना है कि हरि सिंह के कुल दीपक कर्ण सिंह को शेखर कपूर पर क़ानूनी कार्यवाही करनी चाहिये । महाराजा हरि सिंह की यही सबसे बड़ी त्रासदी है । यदि डा० कर्ण सिंह महाराजा हरि सिंह के साथ होते तो शेखर कपूर तो क्या शेख अब्दुल्ला और पंडित जवाहर लाल नेहरु की ही हिम्मत उन्हें अपमानित करने की न पड़ती।

डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री का विश्लेषण.

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