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इलाहाबाद

रैना गांव में काहे को झुंझलाए टीपू सुल्तान

इलाहाबाद। यूपी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव अपने आकस्मिक दौरे में रायबरेली में विकास योजनाओं की हकीकत देख दंग रह गए। आईना में बदरंग तस्वीर ने उनकी झुंझलाहट बढ़ा दी। उफ! इतनी बदरंग तस्वीर। कक्षा सात के बच्चे एलीफैंट की स्पेलिंग नहीं बता सके। सीएम का गुस्सा देखने लायक था। सरकारी योजनाओं के तहत गांवों में बने शौचालय की दशा देखने के थोड़ी ही देर बाद उनके मुंह से हठात निकल गया- क्या यही है, विकास की सच्चाई। अखिलेशजी, वास्तविकता शायद कुछ ऐसी ही है। या हो सकता है इससे कुछ ज्यादा ही खराब हो।

इलाहाबाद। यूपी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव अपने आकस्मिक दौरे में रायबरेली में विकास योजनाओं की हकीकत देख दंग रह गए। आईना में बदरंग तस्वीर ने उनकी झुंझलाहट बढ़ा दी। उफ! इतनी बदरंग तस्वीर। कक्षा सात के बच्चे एलीफैंट की स्पेलिंग नहीं बता सके। सीएम का गुस्सा देखने लायक था। सरकारी योजनाओं के तहत गांवों में बने शौचालय की दशा देखने के थोड़ी ही देर बाद उनके मुंह से हठात निकल गया- क्या यही है, विकास की सच्चाई। अखिलेशजी, वास्तविकता शायद कुछ ऐसी ही है। या हो सकता है इससे कुछ ज्यादा ही खराब हो।

यह सर्वविदित है कि अफसरों की फाइल में ‘लोकलुभावन’ आंकड़े सिर्फ कागजों में ही बेहतर लगते हैं। सच्चाई ठीक उसके उलट है। शायद यही वजह है कि जहां भी मौके कायदे से स्थलीय निरीक्षण होता है, वहां गड़बड़ी का भारी भरकम गड्ढा मिलता है। गनीमत तो यह रही कि सीएम के रायबरेली के रैना गांव आने की पहले से खबर पाकर वहां दिनरात जुटकर अफसरों ने विकास योजना के कार्य को अमलीजामा पहनाया था। खुद सीएम ने मौके पर कहा भी कि शायद उनके यहां आने की सूचना पहले से अफसरों को हो गई। ज्यादातर कार्य आनन-फानन तरीके से कराए गए लग रहे हैं। जी हां, आपके इस दौर की सूचना पहले से ही पंचमतल से लीक की गई है। गोपनीय मामले लीक किए जा रहे हैं। यह गंभीर मामला है। सरकारी दफ्तरों के इन ‘जयचंदों’ की पहचान जरूरी है। इसे हर हाल में रोकना जरूरी है।

खास बात यह भी कि विकास योजनाओं की दुर्गतिभरी यह सच्चाई सूबे की राजधानी लखनऊ के बगल रायबरेली स्थित बछरावां के पास रैना गांव की है। यह तो सिर्फ बानगी है। अंदाज लगाया जा सकता है कि राजधानी से दूरदराज के इलाके की दशा क्या होगी? इलाहाबाद, कौशांबी, प्रतापगढ़, जौनपुर जिलों के कई इलाके ऐसे हैं, जहां विकास योजनाओं की कारगर तरीके से जांच कराई जाए तो काफी चौंकाने वाले नतीजे सामने आएंगे। साल के आखिर में मार्च-अप्रैल महीने में किताब, कॉपियां, ड्रेस का वितरण किया जाता है। वजीफे में जमकर घालमेल किया जा रहा है।

वजीफा फार्म भराने से लेकर उसे जमा करने के नाम पर प्रति छात्र तीस रूपए सुविधा षुल्क लिया जा रहा है। विधवा, विकलांग, वृद्धावस्था पेंषन के नाम पर ग्रामप्रधान से लेकर ब्लाककर्मी लाखों रूपए का घालमेल कर रहे हैं। केवल ब्लाक, तहसील और डीएम के यहां रोजाना पड़ने वाली षिकायती दरख्वास्तों की तादाद देख लीजिए, निष्चितरूप से असलियत देख किसी का भी माथा चकरा जाएगा। मनरेगा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की वास्तविकता देखने वाले किसी भी व्यक्ति को डॉक्टर से दिल का परीक्षण कराके आना होगा-यह कि अमुक साहब दिल के मजबूत हैं।

अखिलेशजी, बिना बताए इन जनपदों के ब्लाक, तहसील और डीएम दफ्तरों के आंकड़ों का मुआयना करने के बाद यहां के किसी भी गांव पहुंचकर हकीकत देख लीजिए, बहुत कुछ असलियत सामने आ जाएगी। सूबे का आवाम भी यही चाहता है। क्या ऐसा करेंगे, अगर सहमत हैं तो देर किस बात की। आप षुरू तो करिए, इसलिए भी कि आवाम को आपसे उम्मीद है। लखनऊ के पंचमतल से विकास योजनाओं की हकीकत नहीं देखी जा सकती। वास्तविकता का पता तो मौके पर आने के बाद ही पता चलता है। जैसा कि रायबरेली के रैना गांव में दिखा।

लेखक शिवाशंकर पांडेय इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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