देखिये धर्म कोई व्यर्थ की चीज नहीं है लेकिन हमने इन धर्मों का जो मतलब निकाला है और हमारी जो गन्दी तहजीब पैदा हुयी है, उससे तो ये ही लगता है की ये सब धर्म व्यर्थ है। और जितने भी महान लोग या गुरु हुए है वो सब ठीक है और वो माहन भी है लेकिन खास बात ये भी है की सिर्फ वे ही माहन थे और उसमे हमारा उसमे हमारा कोई योगदान नहीं है ? वो कुछ लोग अलग-अलग जगह और अलग-अलग समय पे कुछ ऐसे है जैसे कुछ एक दीपक यहाँ – तहां जल रहे हो लेकिन हमारी जिन्दगी में तो अँधेरा ही है, हमने बल्कि उन महान लोगो को अपनी बैसाखिया बना लिया और कभी अपने अंदर के अँधेरे को दूर करने की कोशिश नहीं की। दीपक तले वैसे भी अँधेरा होता होता है। अगर वो लोग महान है तो इसका मतलब ये नहीं की हमें भी महान होने का मैडल मिल जाता है।
हम स्वार्थी हो गए और कर्म न करने का बहाना ढून्ढ लिया। क्यों ? क्योकि हमारे पूर्वज महान थे ! यानी जब हमारे पूर्वजो ने ही इतने महान काम कर दिए तो फिर हमें क्या करने की जरूरत है। अगर आप ही दुनिया भर की दौलत कमा लो , तो फिर आपके बेटो को क्या कमाने की जरूरत है ? यानी उनकी महानता हमारे लिए बड़ी घातक सिद्ध हुयी। हम निकम्मे हो गए, हम कर्मशील नहीं बने। इसलिए यहाँ तरह -तरह की गलत पर्वृतिया पैदा हुयी। जैसे एक बेटे को कमाया हुआ बहुत सारा धन मिल जाये तो उसको कर्मठ होने की क्या जरूरत है और उसके भटकने के बहु चांस है। कहने का मतलब है ये हमरे गुरु कही- कही जलते दीपक है लेकिन हमारी जनता कुल मिलाकर आज तक अँधेरा ही धो रही है। सारी जनता अज्ञानता में डूबी है। अतः इन गुरवो, ग्रंथो, व् धर्मो को एक बार ब्रेक दे कर देखनी चाहिए। दीपक तले अँधेरा होता है और हमें थोडा इनसे दूर होकर देखना चाहिए।
देखिये हम इन धर्म गुरवो को अपने जीवन में लाना चाहते और बहुत कोशिश भी कर रहे है। खूब पाठ-पूजा कर रहे है लेकिन ये गुरु आज तक 1 % भी हमारी जिन्दगी में नहीं आये। इसका कारण एक ही लगता है की ये गुरु और सब ग्रन्थ हमें ज्ञान देने व आजादी देने की जगह हमारे एहम का कारण बन गए है, ये हमें आजाद बनाने की बजाय हमें गुलाम बना रहे है। हम इनसे गलत तरीके से जुड़ गए है। हमने इन्हें अपनी पहचान का विषय बना लिया। हमारी पहचान ये सब धर्म व् गुरु बन गए। हमारी अपनी कोई पहचान नहीं पनपी हमें इन गुरुओं व ग्रंथों से जुड़ना था लेकिन बंधना नहीं था। इन गुरवो में कुछ ऐसा बुरा या अच्छा नहीं पर जिस तरह से हमने इन्हें पकड़ा है उससे ये हमारे रास्ते में बाधा बन गए है। हर चीज उलटी हो गयी है, जीवन मौत बन गया है और सच झूठ बन गया है। हमारी दृष्टी धुंधली हो गयी है। ये ऐसे है जैसे हमारी आँखों में रेत पड़ गयी हो और हम तब तक साफ नहीं देख सकते जब तक रेत साफ़ न कर दे। ये साफ़ कैसे होगी रेत ? ये होगी ब्रेक दा रुल से।
हमारा इगो हमारे इन सब धर्मो,गुरवो, विचारो,विश्वाशो, प्रथाओ देश की वजह से है। हर चीज जिसके हम स्पर्श में आते है उसे हम पकड़ते जाते है, उसमे हम संलिप्त होते जाते है और ये हमरे इगो को मजबूत करती है और जितना हमारा इगो मजबूत होता है उतना हम भगवान् से दूर होते जाते है। हमारा शुद्ध अस्तित्व इन सब की वजह से ढक जाता है जैसे मूर्ति पत्थर में ढक्की हुई है। इस फालतू के पत्थर को हटाने के लिए हथोड़े की चोट मारनी पड़ेगी, अनावश्यक पत्थर हटाना पड़ेगा। इसी तरह से हमारे इगो के चारो और फालतू पत्त्थर हटाना पड़ेगा। हमें जो गुरवो ने सिधांत दिए वो Rediscover होने थे पर हम लोगो ने उन्हें repeat करना शुरू कर दिया। इससे कोई नया जीवन पैदा नही हुआ, बस जीवन दोहराया जाने लगा और लोग दौड़ते तो नजर आ रहे है लेकिन वास्तव में जीवन रुके हुए पानी की तरह है यानी नयी चेतना नहीं पनप रही। नयी चेतना क्यों नहीं पनप रही ? कयोकि हर आदमी वैसे का वैसा है , वो अलग नहीं होना चाहता, वो हमेशा एक जैसा ही रहता है, उसमे कोई अनोखापन नहीं होता। इससे प्रवृति से कोई नया एहसास या कोई नयी अनुभूति नहीं पैदा होती। जब आप पुराने को ही दोहरा रहे है तो कुछ नया कैसे पैदा होगा ? जब तक आप पुराने को चेलेंज नहीं करते, तब तक कुछ नया नहीं होगा। ऐसे में पुराना ही वर्तमान में आ जाता है और और हमारा अतीत ही हमारा वर्तमान बन जाता है। क्योंकि सृजन रुक जाता है इसलिए जीवन में कोई उमंग नहीं पैदा होती और जीवन बोरडम बन जाता है।
अगर जीवन में सृजन हो, बढ़ोतरी हो कुछ नया हो, तो जीवन उल्लास बन जाता है और यही उल्लास है जिसे धर्म परमानन्द कहते है और यही सवर्ग है और यही मुक्ति है। ये उल्लास आपके सारे बधन काट देता है। जब उल्लास नहीं होता तो हम हर चीज, हर ग्रन्थ, हर गुरु को पकड़ने की कोशिश करते है, मायूस मन ही हर चीज को चिपकता है। हमारा सव्भाव पकडके बैठने वाला हो जाता है। क्यों ? कयोकि हमारे पास ख़ुशी का कोई साधन नहीं, हम हर चीज,गुरु व् देश को अपनी शान व् पहचान का जरिया बना लेते है और इसे ख़ुशी का जरिया बना लेते है जो वहां है ही नहीं कयोकि जीवन में उमंग नहीं है इसलिए हम हर तरह के गलत काम करते है और एक दुस्चक्क्र का शिकार हो जाते है और इससे कभी बाहर नहीं निकल पाते। ये जो सृजन होता है और इससे जो उल्लास पैदा होता है, ये एक ऐसा गुण है जो आपको हमेशा निर्लेप व् निष्पक्ष रखेगा। जैसे चलता पानी खुद अपने आप को साफ़ करता रहता है ऐसे ही ये सक्रियता व् निष्पक्षता व् कर्मठता आपमें एक बोध पैदा करेगी जो आपको हमेशा पानी की तरह साफ़ रखेगी। ये ज्ञान या बोध एक बार पैदा करके इसे आप हमेशा पर्योग नहीं कर सकते। ये हर क्षण पैदा करना पड़ेगा। तभी आपमें जागरूकता पैदा होगी और आप इतने सजग हो जाओगे की ज्यों ही कोई चीज आपसे चिपकेगी , आप उसे कंधे हिल कर निचे गिरा देते है ताकि कही ये आपके इगो का एक अंग न बन जाये।
एक बार एक धोबी एक घोड़े के ऊपर बहुत सार समान लाद कर रात को जा रहा था। रास्ते में एक बहुत बडा गड्ढा आ गया और दिखाई न देने की वजय से वो गधा उस गड्ढे में गिर गया। धोबी ने उस गधे को निकालने की काफी कोशिश की लेकिन वो उसे नहीं निकाल पाया। अंत में धोबी ने सोचा कि ये गधा बाहर तो नहीं निकल पायेगा, इसलिए उसने सोचा की वो उस गधे को गड्ढे के अंदर ही दबा देना चाहिए। अब धोबी ने एक कसी के साथ उसके ऊपर मिट्टी डालनी शुरू की। जयो ही धोबी कसी से कुछ मिटटी ऊपर से गधे के ऊपर डालता, गधा उस मिटटी को अपने कंधों को झक्जोड़ के निचे गिरा देता। इस प्रकार मिटटी गधे के पेरो के निच्चे चली जाती और गधा उस मिटटी के उप्पर चढ़ जाता। हर बार धोबी मिटटी गधे के ऊपर फेंकता है, पर गधा उसे झाड़ के निचे फेंक दता है और गधा खुद उस मिटटी के ऊपर चढ़ जाता है। सुभह होते-होते गधा गड्ढे से बहार आ जाता है। इसी तरह से इस दुनिया बहुत सी चीजे आपके ऊपर फेंके गी और हर चीज आपके साथ चिप्केगी और आपके एहम का कारण बनेगी।
आपका अहम जितना मजबूत होता जायेगा आप उतना ही उस सुप्रीम शक्ति से दूर होते जाओगे। उतना ही आपके जीवन में उलास ख़त्म होता जायेगा। ये गुरु, ग्रन्थ, भाषा, देश, परदेश सिर्फ आपके घमंड को बढ़ाएंगे। धीरे-धेरे आपमें शिथिलता आ जाएगी और आप जड़ हो जाओगे। इसलिए जयो ही कोई भी चीज आपसे चिपके आप को उसे गधे की तरह अपने कंधे हिला के उसको निचे गिर देना है और उसको कुचलते हुए आगे निकल जाना है। यही है ब्रेक दा रुल। आप दिन रात भागते नजर आते हो, पर वास्तव में आप जड़ है, आप बंधे हुए है। आप एक अनजान बोझ के निचे दबे हुए और आपके धार्मिक गुरवो को मालूम है की आपको अब बाहर नहीं निकाला जा सकता, इसलिए वो दिन रात आप पर और भी कचरा फेंक रहे है। आप चारो तरफ से घिर गए है, सिमित हो गए, कही फस गए है। ये ऐसे ही है जैसे आपकी शर्ट का अगर पहला बटन गलत बंद हो जाये तो सारे बट्टन गलत बंद हो जाते है। स्वामी के,के ब्रेकानंद इसे कहते रुल में बंधना, सिमित हो जाना। यानी आपका विस्तार रुक जाता है। आप ने हर चीज का मालिक बनना था लेकिन आप हर चीज के गुलाम बन जाते हो। ये धर्म, ये भाषा, ये देश सब आपके लिए है न की आप इनके लिए बने है।
आप कैसे निष्पक्ष रह सकते हैं? आप कैसे गुरुओं व ग्रंथों का सम्मान कर सकते हैं? आपके आचरण से से तो यही लगता है की आपने अपने गुरुओं, ग्रंथों व पूर्वजों का घोर अनादर किया है। आपके समाज में व्याप्त असामनता, अन्याय व हिंसा इस बात का प्रमाण है की आपने अपने गुरुओं व पूर्वजों से धोखा किया है। क्योंकि आपने अपने स्वार्थ के लिए इन्हें पकड लिया ये सोच कर की इनके हाथो या इनकी बीन बजाने से शायद कोई करिश्मा हो जाये। लेकिन याद रखना जीवन ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है और इस जीवन को जीने की कला सीखना और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। आपको सच्चाई, ख़ुशी,रूहानियत, अध्यात्म कोई गुरु या देवता थाली में परोस कर नहीं दे सकता, ये ग्रहण नहीं किये जा सकते, ये सब अर्जित करने पड़ेंगे, ये सब गुण कमाने पड़ेंगे और अगर हमें ये सब नहीं मिले तो लकीर के फ़कीर बनने की बजाय हमें अपने तौर तरीको में बदलाव करना चाहिए। आज तक मैंने कोई ये पूछता नजर नहीं आया की आखिर इन धर्मो व् धर्म गुरवो का हमारे समाज को क्या योगदान है ?
देखिये अगर कोई भी चीज या फार्मूला या गुरु काम नहीं कर रह तो हमें कुछ और संभावनाओ को तलाशना चाहिए। देखिये पहले तो ये समझ ले की कोई भी गुरु,धर्म, नाम, खानदान, देश आपके लिए है, सबसे पहले आपका जीवन महत्वपूर्ण है। अगर आप जीवित है, या सृजन की अवस्था में है या आप रचनाकार है तो आप अपने देश व् गुरु के लिए भी कुछ कर सकते है, लेकिन अगर आप सृजन में नहीं है तो आप सिर्फ एक लाश है जो अपने ही बोझ तले दबे मरे जा रहे है, जिसमे से एहम, लाचारी, निकम्मेपन की बदबू आ रही है। ऐसी लाश की वफादारी की देश व् धर्म को कोई जरूरत नहीं। इसके उल्ट एक ऐसी शख्शियत जो प्रेम ,उमंग, व् उल्लास से भरपूर है, चाहे कही भी रहे, वो जहाँ होगा वाही प्यार की खुशबू फेलायेगा। आप फूल से वफादारी की उम्मीद नहीं करते कयोकि खुशबू बिखेरना उसका सवभाव है। ऐसे ही आपसे किसी वफादारी की उम्मीद नहीं है। देखिये हमारा मकसद सब बाहर के सहारों को तिलांजली देना है ताकि हम अपने पेरो पैरो पे खड़े हो सके , ताकि हम अपने अंदर जो बेस्ट है उससे जुड़ सके। जब तक सहारा है तब तक हम आश्रित ही रहेंगे, अनुयायी ही रहेंगे और अनुयायी कभी इतिहास नहीं रच सकता। जैसे बच्चे को चलना सिखाने के लिए उससे ऊँगली छुडवानी ही पड़ेगी। अब आप कहोगे की अगर आपको चलना आ गया और आप गुरवो,पूर्वजो को छोड़ देंगे ! ये तो पूर्वजो से धोखा है। तो क्या आप ये चाहते है की की बच्चे को अगर चलना आ गया तो हमें भूल जायेगा, इसलिए इससे ऊँगली मत छुड्वाओ ताकि वो हमेशा आप पर निर्भर रहे। क्या आप ऐसा करते हो ? नहीं ! कयोकि किसी को चलाना और वो भी अपने बेटे को चलना सिखाने में अपना ही मजा है, और ये अपने आप में असीम आनंद देता है, इसमें आप बच्चे से आभार की उम्मीद नहीं करते। जीवन हर क्षण एक खुशबू है, एक आनंद है, एक तोहफा और इसके बाद किसी एहसान की जरूरत नहीं होती।
बुद्ध ने खुद कहा था कि आपको जहां कहीं बुद्ध मिले उसे मार डालना। उसे मालूम था की उसके शिष्य उसकी भी देवी-देवताओ की तरह पूजा करने लग जायेंगे और वही हुआ। आज जितनी मुर्तिया बुध की है और किसी की नहीं। यानी धर्म को हमने एक षड्यंत्र बना दिया। क्या आपको लगता होगा की बुध उसके अनुयायियों की ये मुर्खता देख कर बहुत खुश होते होंगे ? नहीं, निश्चित ही ये सब देख कर उसका सर शर्म से झुक जायेगा। यही हाल आपने गुरुनानक, राम व् रहीम के साथ किया। गुरुनानक ने जिन वेहम व् भर्मो को छोड़ने के लिए कहा था आज सारा सिख समाज उन्ही में फंसा पड़ा है। लेकिन गुरुनानक जी नाम पर लड़-लड़ के मर जायेंगे। ये दर्शाता है की हमारी दिमागी हालत ठीक नहीं, हम बीमार है। बीमार क्यों है ? कयोकि हमने गलत चीजो को पकड लिया है और हम जीवन की धारा से unplug हो गए है, हमरे अंदर उर्जा का सपन्द्न नहीं हो रहा। हम जो भी कर रहे, जिसको भी हमने पकड़ा हुआ है, उसे ब्रेक देना होगा। ब्रेक देते ही हमारा मन असंख्य संभावनाओ के लिए खुल जायेगा। आज तक समाज ने हमारे ऊपर चीजे थोपी थी, लेकिन इन सबको ब्रेक देते ही, एक पागलपन की दौड़ रुक जाएगी और रुकने के बाद सबसे पहला सवाल ये उठेगा की अब आगे क्या ? ये जिन्दगी में पहली बार होगा जब आपने अपनी इच्छा से किसी चीज पर ब्रेक लगाये होंगे और ये पहली बार होगा जब आप आपने आप को अकेला महसूस किया होगा और ये पहली बार होगा जब आपको खुद फेसला करना होगा। जब आप अपने चेतन मन यानी अपने मन से फेसले करने लग जाते हो तो आप अपने आप को खोजने या अनावृत करने लग जाते हो। जीवन फूल की तरह खिलने लगता है, आपको पहली बार आनंद के दर्शन होते है और जीवन एक म्युज़िक की तरह बजने लगता है। इस तरह का जीवन ही आपके गुरवो के लिए सबसे बड़ा तोहफा है। आपके गुरु, आपके पूर्वज कभी नहीं चाहते की वो हमेशा आपके लिए बैसाखी बने रहे, नहीं, वो चाहते की आप जल्दी से जल्दी उनके सहारे से आजाद हो जाये।
लेखक स्वामी जेएस ब्रेकानंद हैं जो 'ब्रेक द रुल' संगठन से जुड़े हुए हैं.





