आमतौर पर घर की बेटियों और बहुओं में फर्क नहीं करने को कहा जाता है पर ज्यादातर घरों में बहू को बहू और बेटी को बेटी ही समझा जाता है. हर पति अपनी पत्नी से अपेक्षा करता है कि वह उसके मां-पिता को अपना मां-पिता माने पर मां-पिता अपनी बहू को अपनी बेटी मानने से बचते रहते हैं. इसी पर मेरी एक रचना….
बहू की आपबीती
-हरमीत मल्होत्रा-
पति कहे
मेरे मां बाप को अपने
मां बाप की तरह
समझना…
उनकी हर छोटी मोटी
बातों को अपने मां
बाप का ही लाड
समझना…
मैं कहूं– कभी उनसे
पूछा है?
कि क्या इसे बेटी की तरह
लाड करते हो?
मेरी बहन के हर गुनाह पर
परदे डालते हो…
तो इसकी गल्ती पे इसे
सुनाने के मौके क्यों
तलाशते हो?
सास जो कह दे एक बार
वो पत्थर की लकीर है..
बहू की बात ऐसे टाली
जाती है कि जैसे वो कोई
फकीर है…
बेटा काम से लौटे तो
ताजा गरम खाना
परोसो…
बहू सुबह से काम और
घर में पिस रही है…
उसका ध्यान रखे हुए
हो गए बरसो…
कोई उससे भी कहो– आओ
तुम्हें आज बैठा के
खिलाए
शायद तुम्हें खुश
रखने से अपनी बेटी के
खुश रखने की कर सकें
कामनाएं….
हरमीत मल्होत्रा आजाद पत्रकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. फेसबुक पर हरमीत के पेज 'मेरी आवाज' तक https://www.facebook.com/MeriAwaazsun के जरिए पहुंचा जा सकता है.





