Jitendra Dixit : कल गाजियाबाद में सौ से अधिक लड़के-लड़कियां एक होटल में अलग-अलग कमरों में निजी पल बिताते पकड़े गए। पुलिस उन्हें उनके अभिभावकों को सौंपेगी। संभव यह है भी है कि लड़कियां अभिभावकों को सौंप दी जाए और लड़कों को जेल भेजा जाए। अक्सर इस तरह के मामलों में ऐसा होता है। विवाह से पूर्व इस तरह युवक-युवतियों का निजी पल एकांत में बिताना हमारे समाज में सही नहीं माना जाता जबकि कानूनी दृष्टि से वयस्क युवक-युवती सहमति से शारीरिक संबंध बना सकते हैं।
जाहिर है कि होटल में इनका मिलन सहमति से ही होगा। मुझे बड़ा अजीब लगता है कि जब इस तरह के मामलों में दोहरे मापदंड अपनाए जाते हैं। एक तरफ लड़कियों के देर रात तक घूमने-फिरने और दोस्तों से मिलने-जुलने की वकालत की जाती है। लिव इन का चलन शुरू हो चुका है। शरीर पर सिकुड़ते जा रहे उनके कपड़ों को सही ठकराया जाता है, तो फिर होटल में उनके मिलने पर पाबंदी क्यों?
मेरठ में कुछ वर्ष पूर्व गांधी बाग में पुलिस ने इस तरह के जोड़ों की धरपकड़ की थी, तब पुलिस को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी। बात मानवाधिकार तक की हुई थी। खबरिया चैनलों ने कई दिनों तक पुलिस कार्रवाई के विरोध में चटपटी खबरें परोसी थीं। मेरा आशय यह है कि दोहरे मापदंड न अपनाए जाएं। या तो उन्हें मिलने पर पाबंदी न हो या फिर पहनावा, देर रात तक बाहर रहने, ब्वाय फ्रेंड-गर्ल फ्रेंड बनाने आदि के चलन के विरोध को सही ठहराया जाए।
यदि पुलिस की कार्रवाई सही है तो फिर बेलेंटाइन-डे का विरोध भी सही है और उस दिन भी पुलिस की कड़ी चौकसी रहनी चाहिए। युवक-युवतियों के होटल में मिलने की शुरूआत तो वेलेंटाइनी दोस्ती जैसे फंडो से ही होती है। इस पूरे मामले में समाज, कानून और पुलिस को अपनी दृष्टि बदलने की जरूरत है।
मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र दीक्षित के फेसबुक वॉल से.





