किसी भी न्यूज चैनल में सबसे अंतिम और छोटी कड़ी होता है स्ट्रिंगर। सबसे महत्वपूर्ण भी। यही वो बंदा होता जिसके लिए असाइनमेंट डेस्क पर बैठा हर व्यक्ति विद्वान, काम का जानकार होता है। उनके निर्देशों का पालन माता-पिता के निर्देशों से अधिक करता है। उनकी डांट सुनता है। व्यक्तिगत टिप्पणी भी खून के घूंट पीकर रह जाता है। यही स्ट्रिंगर जब महीने बाद पेमेंट मांगता है तो यही असाइनमेंट वाले कहते हैं कि चैनल टेस्ट सिग्नल पर था। पेमेंट का पक्का नहीं है मिलेगी या नहीं। मिलेगी तो आपको बता देंगे।
यही हुआ ज़ी न्यूज प्लस राजस्थान “मरुधरा” में। दो माह तक स्ट्रिंगर्स से काम करवाया। पेमेंट मांगी तो पता लगा कि चैनल टेस्ट पर था इसलिए संभव है मेहनताना ना मिले। ये कहानी नहीं सच्चाई है। जी मीडिया के जी राजस्थान प्लस मरुधरा की। इस रिजनल चैनल के लिए जून में ही काम शुरू हो गया था। स्ट्रिंगर्स ने खूब काम किया। अपने क्षेत्र के सभी सीन। कोई आधे घंटे की स्टोरी, कोई पैकेज। वह सब भेजा जो चैनल के लिए जरूरी होता है। लेकिन अब दो माह पता लगा कि चैनल का 31 जुलाई तक टेस्ट सिग्नल था। इसलिए जरूरी नहीं कि इस अवधि की पेमेंट मिले।
अचरज की बात है कि किसी भी चैनल की सबसे अधिक महत्वपूर्ण कड़ी को मालूम ही नहीं कि उसे उसके काम का फल मिलेगा या नहीं। चलो ना मिले। इसके साथ साथ ये भी हो कि असाइनमेंट डेस्क से लेकर दूसरे सभी विभागों के अधिकारियों को भी टेस्ट सिग्नल की अवधि का वेतन नहीं मिलना चाहिए। स्ट्रिंगर्स ने तो पल्ले से फोन करके। जेब से खर्चा कर स्टोरी कवर की। ताकि उसके पास दो पैसे आएंगे। किन्तु ये तो उलटा हो गया। जो मिलना चाहिए वो तो मिलेगा नहीं। जेब से और गया।
यह स्ट्रिंगर्स के साथ अन्याय है। बोलेगा कोई नहीं। कोई इस बारे में आवाज नहीं उठाएगा कि काम किया है तो पेमेंट मिलनी चाहिए। क्योंकि सबको बड़े चैनल का नाम चाहिए। वह है ही। ये कैसा अन्याय है कि अधिकारी तो सेलरी लेंगे,बस स्ट्रिंगर्स को कुछ नहीं मिलेगा। बेबसी देखो कि अपने हक के लिए किसी को कुछ कह भी नहीं सकते। एक छोड़ेगा दस तैयार हैं फ्री में काम करने के लिए। कहते हैं कि मीडिया दूसरों के शोषण को तो आवाज देता है। लेकिन खुद के लिए कुछ नहीं कर सकता। लाचार है स्ट्रिंगर्स।
नाम गोपनीय रखने की शर्त पर एक स्ट्रिंगर द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित.





