15 अगस्त और 26 जनवरी आते ही जिले-जिले में पत्रकारों की बाढ़ सी आ जाती है। यह पत्रकार खरपतवार की तरह अपने पैर पसारने लगे हैं। कोई अपने आपको साप्ताहिक अखबार का प्रधान संपादक बताता है तो कोई मैगजीन का ब्यूरो। इन छुटभैय्या पत्रकारों की भीड़ ने जिले के मुख्य पत्रकारों को भी पीछे छोड़ दिया है और मानों 15 अगस्त या 26 जनवरी इनके लिए कोई त्यौहार की होता है, जो साल में एक बार आता है।
इन्हीं तिथियों में इनका अखबार बाकायदा मार्केट में उतरता है और फिर ईद के चांद की तरह गायब भी हो जाता है। मुहुर्त और तिथि देखकर अखबार निकालने वाले ये पत्रकार पत्रकारिता को बदनाम कर रहे हैं। अपनी गाड़ियों में बड़े-बड़े अक्षरों से प्रेस लिखाकर वसूली के बहाने लोगों को चमकाते नजर आते हैं। इसके साथ-साथ अपने वाहन में सवारी बैठाकर छेड़खानी से भी बाज नहीं आते।
आज पत्रकारिता में ज्यादातर गुण्डा प्रवृत्ति के लोगों का समावेश हो गया है। कई बार वास्तविक पत्रकारों ने इन सभी बिंदुओं अपनी आवाज उठाई लेकिन आज तक इस पर कोई कार्यवाही सामने नहीं आई। मजे की बात तो यह है डी लिस्ट में जाने वाले अखबार भी प्रकाशित हो रहे हैं, किंतु इस ओर जनसंपर्क अधिकारी गंभीर नहीं है। वास्तविक पत्रकारों द्वारा इन फर्जी पत्रकारों के विरूद्ध कई बार आवाज उठाई गई, किंतु विभाग द्वारा कोई नकेल इन पर नहीं कसी गई।
मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





