Abhiranjan Kumar : मित्रों, मैं आप लोगों की बेचैनी समझ सकता हूँ, लेकिन मैं उन अवसरवादियों में नहीं कि कहीं ज्वाइन करने के लिए आर्यन टीवी को छोड़ दिया, मैंने आर्यन टीवी इसलिए छोड़ा है, क्योंकि मेरे लिए यहाँ और काम करना संभव नहीं रह गया था। आप लोगों के स्नेह और समर्थन से मैं समूचे बिहार-झारखण्ड के लिए लड़ा, लेकिन अपने साथियों की निराशा दूर नहीं कर पा रहा था।
साथी पत्रकारों के दिल के लहू को अपने कलम की स्याही बनाकर मुझे महान संपादक नहीं बनना। मैंने अपने दूसरे कविता-संग्रह "उखड़े हुए पौधे का बयान" (2006) की भूमिका में लिखा था- "मैं सपनों के साथ जीता, अपनों के साथ मरता हूँ। मैं साहित्य, समाज और मीडिया का एक अदना-सा कार्यकर्ता हूँ।" मैं अपना लिखा अभी नहीं भूला हूँ।
मैं आदमी छोटा ज़रूर हूँ, लेकिन ज़िन्दगी का मकसद बड़ा है। पवित्र साध्य के लिए सोच और साधन की पवित्रता भी ज़रूरी है। कवि हूं, गणितज्ञ नहीं, इसलिए ज़िन्दगी में कभी नफ़े और नुकसान का हिसाब नहीं लगाया। बिहार मेरी अपनी मिट्टी है और यह मिट्टी मेरी मां है।
बिहार के लोग मेरे अपने सगे भाई-बहन हैं। मेरे ऊपर उनका बहुत क़र्ज़ है। अपने शरीर में लहू की आखिरी बूँद रहने तक भी यह क़र्ज़ अगर उतार पाया, तो जीवन धन्य समझूंगा। इसलिए बिहार से नाता नहीं टूटेगा, इसके लिए निश्चिन्त रहें। बस मुझे थोड़ा वक़्त दें अपने को रिचार्ज करने के लिए।
पत्रकार अभिरंजन कुमार के फेसबुक वॉल से.





