: (संस्मरण – पार्ट 4) : दिल्ली में राधा कृष्ण बजाज उर्फ "भाया जी" दिल्ली गेट के पास अंसारी रोड के पास एक कोठी से अपना सत्याग्रह चलाते थे. यह कोठी किसी सेठ ने खरीदी थी और इसको लेकर लफडा था, सो उसने भाया जी को अपना आंदोलन यहीं से संचालित करने के लिए प्रेरित किया, ताकि वहां भजन-कीर्तन होता रहे, और भीड़-भाड़ बनी रहे. दो-चार साल बाद झगडा सुलट जाने के बाद उसने अपनी कोठी खाली करवा ली, और भाया जी कुछ दिन एक गेराज में रहने के बाद अंततः वापस वर्धा चले गए. यह ऐतिहासिक हवेली थी, जो कभी महात्मा गांधी और स्वामी श्रद्धानन्द के निकट सहयोगी रहे डॉ. अंसारी की संपत्ति थी.
यहाँ मेरा काम भाया जी के पत्र और लेख टाइप करने का था. लेकिन ड्यूटी चूंकि स्वेच्छिक थी, इसलिए जब मुझे फुर्सत मिलती तब करता, वरना नहीं भी करता. उन्हें पत्र लिखने का बड़ा चाव था. रोज गांधी जी की तर्ज़ पर गो रक्षा को लेकर दर्ज़नों पत्र लिखते, यद्यपि जवाब शायद ही किसी का आता हो. गाय के दूध, गोबर, मूत्र आदि के फायदे को लेकर लंबे लंबे लेख और प्रेस नोट बना कर मुझे सौंपते, जिन्हें अखबार वाले रद्दी की टोकरी के हवाले कर देते थे, लेकिन वह हार नहीं मानते, और सतत लिखते रहते.
अपने साथ रहने वाले हम पांच-छह स्थायी अन्तःवासियों को वह रोज प्रार्थना के बाद गाय के दूध पर प्रवचन देते. एक दिन हममें से सबसे वरिष्ठ महावीर त्यागी ने उलाहना दिया- आप हमेशा कहते रहते हो कि गाय का दूध हर भारत वासी को रोज कम से कम आधा सेर मुहैय्या होना चाहिए, जबकि यह हमें कभी नहीं मिलता तो औरों की बात क्या करें? भाया जी किकंर्तवयविमूढ हो गए, और नतीजतन हमें रोज रात को दो सौ ग्राम दूध मिलने लगा. गाय का दूध लेने प्रायः मैं ही जाता. एक दिन गाय का दूध उपलब्ध न होने पर सप्लायर ने भैंस का दूध दे दिया. भाया जी बहुत नाराज़ हुए और वह दूध वापस फेरना पड़ा. यह नौबत एकाधिक बार फिर आई, लेकिन अब प्रदाता ने मुझे साध लिया था. वह भैंस के दूध में चुटकी भर हल्दी पावडर मिलाता, और भाया जी देख कर खुश होते- देखो यह हुआ न असली गाय का दूध, रंग और स्वाद में कितना खरा है. मैं हामी भरता.
यहाँ मुझे रहने-खाने की कोई दिक्कत न थी, फिर भी मैं माथुर साहब से बार-बार कहता कि खाना कभी मिलता है कभी नहीं, जल्दी मेरा उद्धार कीजिए. लेकिन वह अडिग होकर कहते कि कम खाने से आज तक कोई नहीं मरा, दुनिया के तमाम लोग ज्यादा खाने से मर रहे हैं. प्रतीक्षा करो. मैं प्रतीक्षा न करता तो क्या करता? नवभारत टाइम्स में भी मैं स्वयंसेवा ही कर रहा था. असल में माथुर साहब का उद्देश्य यह था कि मैं कुछ काम सीख लूं, ताकि उन पर कोई आंच न आये. एक सतूना उन्होंने मेरा यह बिठा दिया था कि अखबार के उत्तर प्रदेश संस्करण में मेरे लेख या रपटें छप जातीं, जिनका मुझे भुगतान होता था. मैं हर माह एकाउंट में जाकर पूछता- मेरा चेक बना क्या? और जब पता चलता कि बन गया तो सौ या दो सौ रूपये का चेक लेने अपने गाँव टिहरी चला जाता, तीन सौ रूपये खर्च करके. चेक गाँव के पते पर ही जाता था, क्योंकि दिल्ली में मेरा कोई स्थायी ठिकाना तो था नहीं. गाँव आने-जाने का किराया भाया जी सहर्ष दे देते, लेकिन उन्हें वापसी में बस के टिकट सौंपने पड़ते. दो रुपये की चाय भी रस्ते में पी तो उसका भी अलग से पर्चा बना के देना होता.
जैसे-जैसे दिन-महीने गुजरने लगे, मुझे माथुर साहब पर संदेह होने लगा कि वह मुझे टरका रहे हैं. राजेन्द्र माथुर कम बोलने वाले व्यक्ति थे, जिससे मुझ समेत कईयों को लगता था कि वह उपेक्षा कर रहे हैं, लेकिन ऐसा था नहीं. अब मैंने इधर-उधर हाथ-पैर मारने शुरू किये. राधा कृष्ण बजाज से मिलने टाइम्स ऑफ इंडिया वालों के कुल गुरु सदृश गांधी वादी बुज़ुर्ग साहित्य कार जैनेन्द्र कुमार (जैन) भी यदा-कदा आते थे. सुना था कि उनकी कोई बात टाइम्स वाले नहीं टालते. लेकिन भाया जी ने उनसे मेरा परिचय तो कराया, पर मेरा दिल्ली में होने का मकसद नहीं बताया. मुझे विश्वनाथ प्रताप सिंह का ध्यान आया, जो उन दिनों राजीव गांधी की सरकार में एक प्रभावशाली मिनिस्टर थे.
विश्वनाथ जी से मेरा परिचय पुराना था. वह मेरे पिता के प्रति स्नेह और आदर का भाव रखते थे. एक बार जब वह करीब पांच साल पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो उत्तराखंड के कुछ छुटभैया फरियादियों के साथ मैं भी लखनऊ स्थित उनकी कोठी पर पहुंच गया. करीब दो सौ फरियादियों को आनन-फानन निबटा कर मुख्यमंत्री कार में बैठ कर जाने लगे. हमारा नम्बर नहीं आया था. हमारे दल में से किसी ने ऊंचे स्वर में गुहार लगाई- सर ! सुंदर लाल बहुगुणा जी के सुपुत्र भी आपसे मिलने को खड़े हैं. कहाँ हैं, कहाँ हैं? यह कहते हुए मुख्यमंत्री स्टार्ट हो चुकी कार से उतर गए, और मुझे अपने साथ बिठा ले गए.
उन्होंने मुझसे पूछा- पढाई का खर्चा पर्चा आराम से चल जाता है? मैंने संकोच सहित नकारात्मक उत्तर दिया तो उन्होंने उत्तरकाशी के डीएम की मार्फ़त मुझे साढ़े तीन हज़ार रुपये भिजवा दिए. इस घटना से मेरा रूतबा बढ़ गया और मुझे धन दोहन की नयी राह मिल गयी. इसके बाद मैंने उन्हें दो-तीन बार और ठगा. उत्तरकाशी का डीएम मेरे कब्ज़े में आ गया, और जब भी मैं मांगू मुझे सरकारी गाड़ी मिलने लगी. खैर ……विश्वनाथ जी ने कहा कि उद्योगपतियों पर छापे के कारण टाइम्स वाले मुझसे नाराज़ हैं, लेकिन आपके लिए कोई और राह देखते हैं. लेकिन मुझे तो पत्रकार बनने की और वह भी राजेन्द्र माथुर के साथ काम करने की लगन लगी थी. अब मैंने हेमवती नंदन बहुगुणा का दर खटखटाया, जिनका मैं पुराना स्नेह पात्र था, और राजनीति का रास्ता छोड़ उन्ही के कहने पर पत्रकार बनने की ठानी थी.
उत्तराखंड मूल के, लेकिन इलाहाबाद से राजनीति के घाघ बने राज पुरुष हेमवती नंदन बहुगुणा उन दिनों दिल्ली में अपने दुर्दिन गुज़ार रहे थे. वह इलाहबाद से लोक दल के टिकट पर फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन से लोकसभा चुनाव हार कर फिर से स्थापित होने के लिए हाथ-पांव मार रहे थे. वह मेरी तो क्या खुद की ही कोई मदद करने की स्थिति में नहीं थे. राजीव गांधी अपनी माँ की हत्या से उपजी सहानुभूति के कारण भारी बहुमत से सत्ता में आये थे, और उनके हाली-मवाली दून स्कूल के गिटपिट अंग्रेज़ी बोलने वाले चाकलेटी भद्रलोक के साथी और हवाई जहाजों के ड्राईवर से नेता बने नौसिखुए दोस्त पुराने राज नेताओं को चुन चुन कर अपमानित कर रहे थे.
हेमवती नंदन बहुगुणा उनके निशाने पर सबसे पहले आये. उनसे सरकारी मकान छीन लिया गया, यद्यपि वह चुनाव हार जाने के बाद सरकारी मकान के हक़दार नहीं रह गए थे, लेकिन अपनी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष, स्वाधीनता सेनानी, सुदीर्घ राजनैतिक सेवा तथा दिल का मरीज़ होने की बिना पर उन्होंने सरकारी बंगले पर बने रहने देने की गुहार लगाई. लेकिन सरकार का रुख सख्त था. बंगले से सामान बाहर फिंकवाए जाने की नौबत आते देख वह चुपचाप कांस्टीट्यूशन क्लब के दो कमरों में शिफ्ट हो गए, यह व्यवस्था भी एक माह के लिए थी. इस दौरान मैंने उन्हें रोज मकान एलाटमेंट की अपनी फ़ाइल को फालो करने के लिए गृह मंत्रालय के बाबुओं के पास आते-जाते देखा.
आखिर स्वाधीनता सेनानी के नाते उन्हें डिफेन्स कालोनी में एक छोटा सा फ्लैट एलाट हो गया. यहाँ वह कुंठा, निराशा, क्रोध, ग्लानि और प्रतिशोध की भावना से ओतप्रोत लेकिन पुनर्स्थापन के लिए छटपटा रहे थे. उन पर सत्ता लोलुप तथा दल बदलू होने का ठप्पा लग चुका था, यद्यपि वह एक होशियार, वाकपटु, मिलनसार, मेधावी, महत्वाकांक्षी और अनुभवी लेकिन अधीर राज नेता थे. वह जिसे एक बार देखते, उसे कभी भूलते नहीं थे थे, और सालों बाद मिलने पर भी उसे नाम लेकर पुकारते थे. उनको ठीक ठीक समझना हो तो उत्तराखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री उनके पुत्र विजय बहुगुणा के व्यक्तित्व का ठीक विलोम कर लीजिए, तो हेमवती बाबू का व्यक्तित्व सामने आ जायेगा. लगातार पांच साल तक सत्ता से बाहर रहने, और कोढ़ पर खाज यह कि एमपी तक न बन पाने की विडंबना के कारण उनके फायनेंसरों ने उन्हें पैसा देने से लगभग हाथ खींच लिया था. एक बार मैं उनके साथ उन्हीं की कार से राजघाट की ओर गया तो, रास्ते में उन्होंने गाडी रोक कर खुद घर के नौकर चाकरों के लिए साबुन-तेल की खरीदारी की. यह देखना मेरे लिए त्रासद था, क्योंकि मै उनका चरम वैभव काल भी देख चुका था. उनकी फजीहत देख मैं कुछ देर के लिए अपना संकट भूल जाता.
हेमवती नंदन बहुगुणा ने मुझे और मैंने उन्हें पहली बार 1975 में नवंबर महीने की चौदह तारीख को देखा. तब तक वह उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय, लेकिन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की आँख की किरकिरी वाले नेता बन चुके थे. टिहरी में एक नहर परियोजना का शिलान्यास करने के बहाने आये थे. सदियों से दमित, दलित, कुंठित और तिरस्कृत पूर्व टिहरी रियासत की प्रजा ने उनमें अपना अभिनव स्वाभिमान देखा था. मैं स्कूल में पढता था, लेकिन कुछ माह पहले ही चर्चित अस्कोट – आराकोट पदयात्र पूरी कर आया था. मेरे पिता और हेमवती नंदन बहुगुणा, दोनों तब तक एक दूसरे से लंबा और घातक वैचारिक युद्ध करने के बाद आत्म समर्पण कर चुके थे. दोनों पर एक दूसरे के प्रति सोफ्ट कोर्नर अपनाने का आरोप लगना शुरू हो गया था. इन्हीं सारे आरोपों के कारण, शायद मेरे पिता उनके टिहरी दौरे की खबर आते ही एक गुफा में ध्यानस्थ हो गए, अनिश्चित काल के लिए. ऐसा वह गाहे-ब-गाहे करते रहते थे, जब-जब उनके पुराने राजनैतिक दोस्त व दुश्मन कांग्रेसी उन्हें घेरने का प्रयास करते. आखिर मेरे पिता भी पुराने कांग्रेसी रह चुके थे, और अपने दोस्तों की रग-रग से वाकिफ़ थे. मंच पर लगभग दौड़ कर चढ़ कर उर्दू, हिंदी और गढवाली में सम्मोहक व्याख्यान देकर उन्होंने मुझे मोह लिया. यही जादू उन पर शायद मैंने भी किया, जब मैं थोड़ी देर बाद उनसे मिला. इसके बाद हम दोनों उनकी मृत्यु तक एक दुसरे के प्रति निष्ठावान रहे.
जन सभा में भाषण देने के बाद हेमवती नंदन बहुगुणा खुली जीप में खड़े होकर नेहरु स्टाईल में हाथ हिलाते शहर से होते हुए डाक बंगले पंहुचे. यह डाक बंगला पुराने टिहरी शहर की कचहरी के पास था. नीम अँधेरे में करीब दो सौ फरियादियों से मिलते हुए सभी की अर्जियां लेने लगे. मैं सबसे अंत में खड़ा था, और मैंने उनके हाथ में पहले से लिखित एक पन्ना थमा दिया, जिस्मे मेरा सम्पूर्ण परिचय तथा उनसे दो मिनट अलग से मिलने की गुहार थी. करीब दस मिनट बाद हड़बड़ाता हुआ एक एसडीएम मेरा नाम पुकारता आया. मुझे "सरकार" ने भीतर बुलाया था. इसका अर्थ यह हुआ कि बहुगुणा ने जनता से मिलने के बाद सारी अर्जियां पढ़ीं, उन्हें न तो रद्दी की टोकरी में फेंका और न किसी अधीनस्थ के हवाले किया. दिन भर की भाग दौड, धूल और भाषणबाज़ी से श्लथ होकर वह बिस्तर पर अकेले बैठे थे. यद्यपि उनका यह दौरा हेलीकोप्टर से हो रहा था, लेकिन बड़े लोग तो हवाई जहाज़ में भी थक जाते हैं. सामने मेज़ पर एक चम्मच में तीन-चार रंग बिरंगी गोलियाँ रखी थी. यह संभवतः उनकी ह्रदय रोग की दवा थी. ह्रदय रोग से उनका रिश्ता युवावस्था में ही जुड गया था. बहुत साल बाद उन्होंने एक बार प्रसंग वश मुझे बताया- मेरी माँ भी इसी बीमारी से मरी थीं.
वह मेरी – अस्कोट – आराकोट पद यात्रा की डायरी पलटने, बल्कि पढ़ने लगे. अचानक पढते-पढते उन्होंने हांक लगाई — शुक्ला!. दरवाज़े पर चपरासी की जगह खड़ा कलेक्टर, जी सरकार, कहता हुआ दोनों हाथ जोड़ कर अर्ध धनुषाकार में अवनत खड़ा हो गया. यह नौकरशाहों पर उस ज़माने के शासकों का रूतबा था, क्योंकि वह कलेक्टर की पोस्टिंग पैसे खा कर नहीं करते थे. अभी कुछ ही माह पहले उन्हीं के मुख्यमंत्री पुत्र ने कलेक्टर की शिकायत करने पर अपनी ही पार्टी के एक विधायक को शट अप कह कर हड़का दिया. खैर…… बहुगुणा ने कलेक्टर से गुस्से में पूछा- यह नैट्वाड कहाँ है? कैसे हो गया वह क़त्ल? वह मेरे जिले में नहीं, उत्तरकाशी में है सरकार, कह कर कलेक्टर ने राहत की सांस ली. उससे (उत्तरकाशी के डीएम से) कहो कि मुझसे बात करे, कह कर बहुगुणा फिर मेरी ओर मुखातिब हुए, और डीएम को बाहर जाने का इंगित किया. दरअसल मेरी यात्रा डायरी में एक जगह नैट्वाड में हुए एक ब्लाइंड मर्डर केस का ज़िक्र था, जिसे पढ़ कर बहुगुणा तुरंत हरकत में आये थे.
हेमवती नंदन बहुगुणा कार और ब्यूरोक्रेसी दोनों को तेज गति से हांकने के माहिर थे. उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने एक नकचढे नौकरशाह को कुछ मौखिक आदेश दिया. टालने के अंदाज़ में अफसर बोला- कल तक देखूंगा सर. ''कल तक तो तुम जेल चले जाओगे'', बहुगुणा ने उसे वार्निंग दी. वह कहा करते थे- नौकरशाही एक ऐसा घोड़ा है जो अपने सवार को पहचानता है. सवार अनाड़ी हुआ तो उसे पीठ से गिरा देता है. जब उन्होंने यह बात कही, संयोगवश उन्हीं दिनों उनको अपदस्थ कर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने नारायण दत्त तिवारी उत्तरकाशी जिले में हरसिल नामक जगह पर घोड़े से गिर पड़े थे.
नौकरशाह सचमुच बड़े ज़ालिम लोशन होते हैं. मैं एक गोपनीय प्रसंग आज आपसे शेयर कर रहा हूँ. 1996 में मेरे पिता टिहरी बाँध विरोधी अनशन कर रहे थे. केन्द्र सरकार की गहन चिंता के फलस्वरूप मुझे वार्ता के सारे अधिकार देकर दिल्ली भेजा गया. प्रधान मंत्री एच.डी. देवेगौड़ा से मिलने को मैं भी उत्सुक था कि दो टांग वाला तथा हवाई जहाज़ में उड़ने वाला गौड़ा कैसा होता होगा. (गढवाली में गौड़ा गाय को कहते हैं). देवे गौड़ा सचमुच हम्बल फार्मर थे. वह मुझे रिसीव करने अपने घर के पोर्च में खड़े थे. उन्होंने मिलते ही मुझे गले लगा कर कहा- ''आई कान्ट स्लीप नाव ए डेज़. ही इज आल्सो लाइक माय फादर.'' मैंने वहीं से अपने पिता को फोन किया कि यह तो लाल बहादुर शास्त्री से भी ज्यादा विनम्र प्रधान मंत्री है. इनकी लाज रखी जानी चाहिए.
तय हुआ कि कल दोपहर ग्यारह बजे प्रधानमंत्री के दफ्तर में हमारी फाइनल वार्ता होगी. अंग्रेज़ी में बात-चीत में मदद के लिए मैंने अपने मित्र शिमला विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर आरएस पिर्ता को बुलावा भेजा और अपने भाई प्रदीप को कहा कि वह भी कल सुबह तक गंगा जल की एक शीशी लेकर दिल्ली पहुंचे, ताकि प्रधान मंत्री की सदाशयता का उचित सम्मान दिया जा सके. देवेगौड़ा ने कहा कि वह मेरे पिता को अपने हाथ से चिट्ठी लिखेंगे, और उनका हर आदेश मानेंगे. अपने परिवार तथा साथियों के लंबे संघर्ष को फलीभूत होता देख मै भाव विह्वल हो गया. आप कहाँ रुके हैं? प्रधानमंत्री ने मुझसे पूछा. मैं जेएनयू के हास्टल में सो जाऊँगा सर. मैंने जवाब दिया. मेरी ही अंग्रेज़ी जैसी विकलांग हिन्दी में उन्होंने आह्वान किया- ''ये देबेगौडा गरीब का ब्यटा, किसान का ब्यटा. मास मच्छी को ये काता नी, मुर्गी, अंडा, सराब को ये पीता नी. तुम हॉस्टल में क्यों सोती, मेरे ही घर क्यों नी सोती.''
''थैंक्यू सर, थैंक्यू सर. सो कैन्ड आफ यू सर. आई विल कम्फेरतेबल दियर सर.'' मैंने प्रकटतः तो धन्यवाद देते हुए यह कहा, पर मन ही मन बोला- ''अरे चाचा तू मांस माछी, अंडा, सराब नी खाती-पीती, पर मैं तो खाती-पीती. मुझे प्रधान मंत्री निवास में क्या आलू का झोल खिला कर मेरा नास मारोगे.''
आप चाय में चीनी कितनी लेंगे सर? विनम्र प्रधान मंत्री ने चीनी की टिकिया मेरे कप में डालते हुए पूछा. अतिशय सौहार्दपूर्ण वातावरण में कल मिलने का निश्चय कर मैं वहां से विदा हुआ, ताकि जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के भद्र ढलानों पर नीम अँधेरे में बैठ कर प्रणयबद्ध जोड़ों को देख कर हलके सुरूर में अपनी थकान उतार सकूं.

जेएनयू के उन्मुक्त लेकिन शिष्ट वातावरण में गंगा ढाबे के पीछे कल रात झुरमुटों और चट्टानों की ओट से आने वाली प्रणय कलह की उन्मादक ध्वनियाँ फंतासी बन कर अभी भी मेरे मस्तिष्क में कौंध रही थीं. मैं उन्हीं के सहारे बोरियत से बच रहा था. क्योंकि प्रधान मंत्री ग्यारह बजे का समय देकर एक बजे तक भी नहीं मिले थे, जबकि उन्होंने कल कहा था कि- मैं ठीक ग्यारह बजे अपने ऑफिस में आपका स्वागत करूँगा. बताया गया कि वह ज़रूरी मीटिंग में व्यस्त हैं.
राजनेताओं से मेरा साबका बचपन से ही खूब पड़ा है, और बाद में अखबार का रिपोर्टर रहते हुए तो उनसे चोली-दामन का जैसा साथ रहा, इसलिए मैं सब समझता था कि राजनेता मीटिंग के बहाने ईटिंग और चीटिंग खूब करते हैं. यह ईटिंग मुर्गे की भी हो सकती है और नोटों के बोरे की भी. उकता कर मैं प्रो. पिर्ता के मना करने के बाद भी, गलियारे में चहलकदमी करने लगा. मुझे प्रधान मंत्री के गवाक्ष से ऊर्जा मंत्रालय का एक अफसर बाहर निकलते दिखा, जो कुछ दिन पहले ही ऊर्जा मंत्री के साथ टिहरी में हमारी कुटिया पर आया था. अब मुझे आभास होने लगा कि मीटिंग क्या चल रही है, और देरी का कारण क्या है. मैं प्रधान मंत्री के विश्वस्त अफसर जैन के कमरे में घुसा, तो वहां मुझे टिहरी के पूर्व सांसद परिपूर्ण नन्द पैन्यूली बैठे मिले.
आखिर हमारे तीन सदस्यीय दल को बुलावा आया. कल अतिशय अपनत्व के साथ पेश आ रहे प्रधानमंत्री का व्यवहार आज औपचारिक था. मुझे लगा कि कल घर की बात थी आज ऑफिस में हैं, इसलिए प्रोटोकाल की मर्यादावश ऐसा होगा, लेकिन उन्होंने मेरे पिता के नाम टाइप किया हुआ जो पत्र मुझे थमाया, उससे मैं सब कुछ समझ गया. कल उन्होंने अपने हाथ से पत्र लिखने की बात कही थी, लेकिन आज यह सधा हुआ कुटिल सरकारी भाषा विन्यास वाला पत्र. ब्यूरोक्रेसी उन्हें यथार्थ के मस्लेहत आमेज़ धरातल पर ला चुकी थी. घोड़ा अपने सवार को गिरा चुका था. पत्र में कहा गया था कि वह टिहरी बाँध बनने दें और राष्ट्र हित में अपना अनशन समाप्त करें. वचन और स्वप्न भंग के फलस्वरूप मैं सन्नाटे में आकर रुआंसा हो गया. बस इतना ही किया जा सकता है, प्रधान मंत्री ने कहा.
मुझे फिर इंदिरा गांधी, हेमवती नंदन बहुगुणा और मोरारजी देसाई जैसे राजनेता याद आये, जिनसे ऐसे ही मसलों पर हमारा पहले साबका पड़ चुका था, और जिनका कहा पत्थर की लकीर होता था
इस संस्मरण के लेखक राजीव नयन बहुगुणा हैं. राजीव उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं.
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