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संपादक मतलब कुतुबमीनार

बहुत पहले संपादक की परिभाषा के परिप्रेक्ष्य में मास काम के कोर्स में एक जगह लिखा हुआ पढ़ा था कि ''हर सम्पादक अपने को कुतुब मीनार से कम नहीं समझता।'' अपने पुर्ववर्ती अनुभवों में मैंने इसे बहुधा सही भी पाया। एक जगह उप सम्पादक की परिभाषा लिखी थी कि '''उपसम्पादक युद्ध का बेनाम योद्धा होता है।''

बहुत पहले संपादक की परिभाषा के परिप्रेक्ष्य में मास काम के कोर्स में एक जगह लिखा हुआ पढ़ा था कि ''हर सम्पादक अपने को कुतुब मीनार से कम नहीं समझता।'' अपने पुर्ववर्ती अनुभवों में मैंने इसे बहुधा सही भी पाया। एक जगह उप सम्पादक की परिभाषा लिखी थी कि '''उपसम्पादक युद्ध का बेनाम योद्धा होता है।''

और यह एक हद तक सही भी है। उपसम्पादक सब कुछ तो करते है लेकिन उनका नाम कही शायद ही छपता हो। वर्तमान सम्पादकों के मीडिया हाउसों के बाजारवाद के भेंट चढ़ते-चढ़ाते देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि अब कुतुब मीनार का कुनबा गिर सा गया हो। ठीक ऐसे जैसे कुतुब मीनार आसमान की ओर न जाकर पाताल की ओर गया हो। जी न्यूज से लेकर प्रेस कौन्सिल में व्याप्त पेड न्यूज से लेकर बिहार में विज्ञापन घोटालों को लेकर अनेकों मामले इसके डिफेन्स में आ खड़े होंगे।

आजादी पश्चात मीडियाईयों और खासकर के सम्पादकों के रुतबे हुआ करते थे। उस समय पत्रकारिता कमीशन नही वरन मिशन हुआ करती थी। और चार लाइन की खबर पर शासन से लेकर प्रशासन तक में हलचल मच जाती थी। और खबरों के असर से सब वाकिफ भी थे। कहते हैं न कि ज्यादा जोगी मठ उजार। वैसे ही आजकल कुछ हो रहा है।

मीडिया के जोगियों की मात्रा में उछाल सा आ गया है। और मीडियाई मठ बेचारे चीख रहे है कि मुझे बचाओं। आजकल हर रोड हर गली में जो प्रेस का लेबल दिख रहा है वैसा आजादी के पश्चात् तो कतई नहीं था। लेकिन आज का माहौल ऐसा हो गया है कि पत्रकारों के भीड़ में मिशन और कमीशन वाले पत्रकारों की पहचान पुलिस की पहचान से बाहर सा हो गया है। रंगा सियार मानिंद।

कुकुरमुत्तों की भाषा अगर पत्रकारों को आती और अगर कोई पत्रकार उनसे उनकी जमात और अखबारों के जमात के बारे तुलना करता तो निश्चय ही वे अखबार और पत्रिका के आगे शर्म से गड़ जाते। विषय से भटकने का इरादा त्यागते हुए पुनः अपने विषय पर पधारने की कोशिश करते है। हां तो सम्पादक की चर्चा हो रही थी। ब्रिटिश इंडिया में सम्पादकों की भूमिका को समझने के लिए एक विज्ञापन ही काफी है जो मीडिया सेवकों के रोंगते खड़े कर देने वाला विज्ञापन है।

फरवरी 1907 में स्वराज्य इलाहाबाद के लिये विज्ञापन जोकि ‘जू उन करनीन’ में छपा था ”एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी, यह शहरे-तनख्वाह है, जिस पर ”स्वराज्य“ इलहाबाद के वास्ते एक एडीटर मतलूब है (आवश्यकता) है। यह वह अखबार है जिसके दो एडीटर बगावट आमेज्ञ (विद्रोहात्मक लेखों) की मुहब्बत में गिरफ्तार हो चुके है। अब तीसरा एडीटर मुहैया करने के लिए इस्तहार दिया जाता है, उसमें जो शरदे तलख्वाह जाहिर की गयी है, वास्ते ऐसा एडीटर दरकार है, जो अपने ऐशो आराम पर जेलखाने मे रहकर जौ की रोटी एक प्याला पानी तरजीह दे“।

लेखक विकास कुमार गुप्ता पीन्यूजडाटइन के सम्पादक है.

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