: (संस्मरण – पार्ट 5) :1996 में अटल विहारी वाजपेयी की सरकार का तेरह दिन में ही शीघ्र पतन हो जाने के फलस्वरूप कर्णाटक के मुख्य मंत्री हरदन हल्ली डोडेगौड़ा देवे गौडा अकस्मात प्रधानमंत्री बन बैठे. जनता दल के अन्य बड़े नेता ठिकाने लग गए थे. लालू प्रसाद यादव चारे की चिरकुटई में फंस चुके थे. शरद यादव जैन हवाला कांड की चपेट में आकर स्वीकार कर चुके थे कि हाँ, मैंने जैन से पैसा खाया है. कर्नाटक के ही एक और बड़े नेता राम कृष्ण हेगड़े चुनाव में ही खेत रहे थे, सो देवेगौड़ा को लाल किले से भाषण देने का अवसर मिल गया. न तो वह उत्तर भारत की राजीति और सामजिक ढाँचे से अवगत थे, और न उत्तर भारत उनसे परिचित था.
उत्तर भारत की वर्चस्व वादी राजनीति के मद्दे नज़र यह अच्छा लक्षण था कि दक्षिण के किसी व्यक्ति को प्रधान मंत्री बनने का अवसर मिले. लेकिन इससे पहले दक्षिण के ही पामुल्रापति व्यंकट नरसिम्हा राव ने जो गंद फैलाई, उससे सब थू थू कर उठे थे. इसलिए देवेगौड़ा को लेकर भी एक शंका सबके मन में थी. लेकिन नरसिम्हाराव अव्वल दर्जे के घाघ और घुन्ना आदमी थे. उन्होंने टिहरी बाँध आंदोलन के दौरान हमें सर्वाधिक सताया. पिटवाया, अपहरण करवाया और मुकद्दमे लदवाये. इसके विपरीत देवेगौड़ा टिहरी बाँध विरोधी आंदोलन को लेकर भारी दबाव में थे. उन्हें पद भार ग्रहण करते ही सर्वप्रथम इस अज़ाब से दो चार होना पड़ा था.
मेरे पिता अनशन पर थे और उस समय मीडिया इतना बाजारू नहीं हुआ था कि ऐसे मामलों की पूरी तरह अनदेखी कर राखी सावंत के ठुमके दिखाता रहे. सो मीडिया ने भी इस मामले में खूब हाईप बना रखी थी. जनता दल के वरिष्ठ नेता और समाजवादी चिन्तक-लेखक सुरेन्द्र मोहन टिहरी बाँध विरोधी आंदोलन के समर्थक और मेरे पिता के मित्र थे. उन्होंने देवेगौड़ा को डराया कि सुंदरलाल बहुगुणा इस क्षेत्र की सर्वमान्य सामजिक हस्ती हैं. अनशन के फलस्वरूप उन्हें कुछ हो गया, तो भारी मुसीबत में फंसोगे. प्रधानमंत्री का पद तो जाएगा ही, उत्तर भारत की ओर आना-जाना भी दूभर हो जायेगा. जबकि हालत इसके ठीक विपरीत थे. उत्तर भारत के तमाम बड़े राज नेता बाँध समर्थक थे. पिछले कुछ वर्षों से हर प्रधानमंत्री के घर बाँध के ठेकेदार का आना जाना था. खुद टिहरी में ही जितने लोग बाँध के विरोध में थे, उससे कहीं गुना अधिक बाँध के समर्थन में एकजुट थे, क्योकि बाँध का पैसा किसी न किसी चैनल से उन तक भी पंहुच रहा था.
सब कुछ बाँध के पक्ष में था. हमारे पक्ष में यदि कुछ था, तो वह था विज्ञान और मानवीय मूल्यों का सत्य. लेकिन विज्ञान और मानवीय मूल्यों को तो राजनेता ठेंगे पर रखते हैं. सुरेन्द्र मोहन चतुराई से काम लेकर देवेगौड़ा को दबाव में ला चुके थे. लेकिन अनर्थ होता देख बाँध समर्थक लाबी ने देवेगौड़ा को आश्वस्त किया कि सुंदर लाल बहुगुणा के साथ कोई नहीं है.तु म्हारा कुछ भी नहीं बिगड़ेगा. तुम्हारे पास इस बाँध को रुकवा कर खोने और पाने को हर तरह से करोड़ों के हरे-गुलाबी, कड़क और सुंदर नोट के बोरे हैं.
…जारी…

इस संस्मरण के लेखक राजीव नयन बहुगुणा हैं. राजीव उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं.
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मुझे धन दोहन की नयी राह मिल गयी और मैंने उन्हें दो-तीन बार फिर ठगा





