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अरिहंत के बाद आ गया विक्रांत, स्वदेशी तकनीक ने गाड़ दिए कामयाबी के झंडे

रक्षा क्षेत्र में महज तीन दिनों के भीतर दो बड़ी कामयाबियों ने एक नया इतिहास बना दिया है। शनिवार को विशाखापट्नम (आंध्र प्रदेश) में स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएएनएस अरिहंत के परमाणु रिएक्टर चालू कर दिए गए। इस परियोजना को नौसेना की एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। क्योंकि, यह परमाणु पनडुब्बी नौसेना के बेड़े में शामिल हो जाएगी, तो नौसेना की ताकत में बड़ा इजाफा हो जाएगा।

रक्षा क्षेत्र में महज तीन दिनों के भीतर दो बड़ी कामयाबियों ने एक नया इतिहास बना दिया है। शनिवार को विशाखापट्नम (आंध्र प्रदेश) में स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएएनएस अरिहंत के परमाणु रिएक्टर चालू कर दिए गए। इस परियोजना को नौसेना की एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। क्योंकि, यह परमाणु पनडुब्बी नौसेना के बेड़े में शामिल हो जाएगी, तो नौसेना की ताकत में बड़ा इजाफा हो जाएगा।

इस कामयाबी से देश की रक्षा जरूरतों पर विकसित देशों की निर्भरता की मजबूरी भी नहीं रहेगी। सोमवार को कोच्चि (केरल) में पूर्ण रूप से स्वदेशी डिजाइन एवं तकनीक से बनाया गया विमानवाहक पोत आईएएनएस विक्रांत का भी जलावतरण किया गया। सैन्य दृष्टि से कई विशेषताओं वाला यह भारी-भरकम पोत 2018 तक पूरी तौर पर तैयार होगा। इसके बाद ही इसे नौसेना को सौंपा जाना है।

करीब 40,000 टन का वजनी एअर क्राफ्ट करियर अपने में बेमिसाल खूबियों वाला है। कोच्चि शिप यार्ड से इसे सोमवार को समुद्र में उतारा गया। इस अवसर पर रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने यही कहा था कि नौसेना के इतिहास में आज का दिन हमेशा याद किया जाएगा। क्योंकि, भारत ने अपनी तकनीक से कामयाबी के एक बड़ी मंजिल हासिल की है। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन व फ्रांस के बाद भारत ऐसा छठा देश बन गया है, जिन्हें ऐसे पोत वाहक डिजाइन करने और बनाने की तकनीक में कामयाबी मिली है। 2016 से इस पोत वाहक विक्रांत के कई गहन परीक्षण शुरू हो जाएंगे। उम्मीद की जा रही है कि 2018 तक यह नौसेना के बेड़े में शामिल हो जाएगा। इस पोत वाहक में 30 लड़ाकू विमान खड़े करने की जगह है।

इस पोत में अभी तक 18,000 टन स्टील लग चुका है। 2018 तक इसमें 37,500 टन स्टील प्लेट्स लगने का अनुमान है। तय कार्य योजना के अनुसार, इस पोत की लॉन्चिंग (जलावतरण) में करीब डेढ़ साल की देरी हुई है। नौ परिवहन मंत्री जी. के. वासन के अनुसार इस पोत निर्माण के लिए जरूरी खास किस्म की स्टील आयात की जा रही थी। लेकिन, इस स्टील के आपूर्तिकर्ता दो देशों ने हीला-हवाली शुरू की थी। इसी वजह से स्टील की सप्लाई का काम ‘सेल’ को दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र की इस भारतीय कंपनी ने अच्छी गुणवत्ता वाला स्टील उपलब्ध करा दिया है। रक्षा मंत्री एंटनी ने उम्मीद जाहिर की है कि विक्रांत के बाद कोच्चि के शिप यार्ड में लगातार नए पोतों का निर्माण होता रहेगा। क्योंकि, भारतीय वैज्ञानिकों ने विक्रांत की खूबियों से यह जता दिया है कि हम किसी से कम नहीं हैं।

भारतीय नौसेना के पास पहला युद्ध पोत 1961 में रूस से आया था। इसका नाम भी आईएएनएस विक्रांत ही था। 1971 में पाकिस्तान से हुए युद्ध के दौर में यह विमान वाहक पोत काफी मददगार साबित हुआ था। 1997 में इस पोत करियर को नौसेना से विदाई दी गई थी। इसके बाद नेवी में आईएएनएस विराट आया। जो कि 28,000 टन वाला एअर क्राफ्ट करियर है। नए विमान वाहक पोत का नाम भी आईएएनएस विक्रांत रखा गया है। यह पोत देश में बना अब तक का सबसे बड़ा विमान वाहक पोत है। रक्षा मंत्री का दावा है कि इसकी लॉन्चिंग से भारत भी उन छह देशों में शामिल हो गया है, जिनके पास इस क्षमता वाले विमान वाहक पोत बनाने की तकनीक है। सैन्य सूत्रों के अनुसार, आईएएनएस विक्रांत अपने वजन के हिसाब से दुनिया का चौथा भारी विमान वाहक पोत होगा। क्योंकि, अमेरिकी नौसेना के पास परमाणु शक्ति से चलने वाला 1 लाख टन वजन का विमान वाहक पोत है। जबकि फ्रांस, ब्रिटेन व रूस के पास 60 हजार टन श्रेणी वाले विमान वाहक पोत हैं।

भारतीय नौसेना के पास रूस में निर्मित आईएएनएस विक्रमादित्य विमान वाहक पोत है। जो कि 44 हजार टन का है। लेकिन, इसमें नए बन रहे आईएएनएस विक्रांत जैसी खूबियां नहीं हैं। चीन भी विमान वाहक पोत बनाने में जुटा है। उसका पहला विमान वाहक पोत बर्याग करीब 55 हजार टन की श्रेणी वाला है। आईएएनएस विक्रांत की लॉन्चिंग को लेकर चीन के रक्षा विशेषज्ञों ने भी कहा है कि भारतीय नौसेना की यह महत्वपूर्ण सफलता है। चीन के एक रक्षा जर्नल में कहा गया है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने जिस तरह से विक्रांत को विकसित किया है, उससे भारतीय नौसेना की ताकत काफी बढ़ जाएगी।

स्वदेशी पनडुब्बी आईएएनएस अरिहंत के परमाणु रिएक्टर सक्रिय कर दिए गए हैं। जमीन और हवा   के बाद अब समुद्र के भीतर भी परमाणु हमला करने की देश की क्षमता इस स्वदेशी पनडुब्बी की कामयाबी से बढ़ गई है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि समुद्र के भीतर से कहीं भी दुश्मन पर किसी जगह से परमाणु हमला किया जा सकता है। नौसेना और भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन (डीआरडीओ) ने मिलकर इसे विकसित किया है। इसमें मध्यम दूरी के परमाणु प्राक्षेपास्त्र बीओ-5 को भी तैयार किया गया है, जो कि किसी भी दिशा में 700 किमी तक निशाना साध सकता है। इसकी मारक क्षमता बढ़ाने के लिए प्रयास जारी हैं। इस तरह की परमाणु पनडुब्बी अभी तक अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस व चीन के पास ही हैं। इस तरह से भारत दुनिया का छठा देश हो गया है कि जो कि परमाणु पनडुब्बी बनाने में कामयाब रहा है।

पिछले वर्षों में तीनों सेनाओं की सबसे बड़ी शिकायत यही रही है कि हथियारों और जरूरी संसाधनों की खरीद में अनावश्यक देरी की जा रही है। विदेशों से होने वाले हथियार सौदों में दशकों का समय लग जाता है। इससे कई बार सुरक्षा के मामलों में जोखिम लेना पड़ रहा है। कई दशकों तक पनडुब्बियों के विकास और आधुनिकीकरण पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। 80 के दशक में जर्मनी के साथ हुआ एचडीडब्ल्यू पनडुब्बी निर्माण योजना का करार रद्द कर दिया गया था। जबकि इस परियोजना में भारत के करीब 15 करोड़ डॉलर खर्च भी हो गए थे। दरअसल, राजनीतिक रूप से यह हल्ला मच गया था कि इस करार में बड़ी कमीशनखोरी हुई है। इसी के चलते यह परियोजना रद्द हो गई थी। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना रद्द नहीं होती, तो पनडुब्बी निर्माण के क्षेत्र में देश काफी आगे निकल गया होता।

भारत की तटीय सीमा काफी लंबी है। ऐसे में, समुद्री सीमा सुरक्षा की अहम जरूरत है। 2008 में मुंबई में आतंकी हमला समुद्र के रास्ते से ही हुआ था। इस हमले के बाद तटरक्षा की जरूरतों पर सरकार का ध्यान गया है। परमाणु पनडुब्बी अरिहंत को इस दिशा में बड़ी कामयाबी मानी जा रही है। सोमवार को ही ओडिशा के चांदीपुर टेस्ट रेंज से परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम पृथ्वी-2 का सफल परीक्षण किया गया। यह मिसाइल जल्द ही सेना में शामिल कर ली जाएगी। इसका पहला टेस्ट पिछले साल दिसंबर में किया गया था। यह मिसाइल 350 किमी तक निशाना साधने में सक्षम है। इस मिसाइल में 500-1000 किलो हथियार साथ ले जाने की ताकत है। टारगेट तक ले जाने के लिए इसमें आधुनिक गाइडेंस सिस्टम लगाए गए हैं। रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने अनौपचारिक बातचीत में मीडिया से कहा है कि सैन्य मोर्चे पर उनका मंत्रालय पूरी तौर पर सक्रिय है। तमाम व्यवधानों के बावजूद रक्षा अनुसंधान कामों के लिए पर्याप्त बजट दिया जा रहा है। क्योंकि, हमारी सरकार सुरक्षा मामलों के किसी मोर्चे पर पीछे नहीं रहना चाहती। एंटनी का दावा है कि डीआरडीओ के वैज्ञानिक विकसित देशों के मुकाबले कहीं कम संसाधनों में बेहतर परिणाम दे रहे हैं। इस बात का गर्व पूरे देश को होना चाहिए।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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