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लखनऊ

यूपी में सरकार से बड़ा है खनन माफियाओं का तंत्र

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में खनन माफियाओं का तिलिस्म कभी कोई सरकार नहीं तोड़ पाई या यह कहा जाये कि राजनैतिक दलों के आकाओं ने जानबूझ कर इस ओर से अपनी आंखें बंद करके रखीं तो गलत नहीं होगा। भले ही अवैध खनन के मामले में यूपी कई अन्य राज्यों से थोड़ा पीछे हो लेकिन यहां भी समय के साथ यह धंधा बढ़ता जा रहा है। नदी किनारे, पहाड़ी इलाकों का कोई भी जिला ऐसा नहीं बचा है जो अवैध खनन माफियाओं से बचा हो।

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में खनन माफियाओं का तिलिस्म कभी कोई सरकार नहीं तोड़ पाई या यह कहा जाये कि राजनैतिक दलों के आकाओं ने जानबूझ कर इस ओर से अपनी आंखें बंद करके रखीं तो गलत नहीं होगा। भले ही अवैध खनन के मामले में यूपी कई अन्य राज्यों से थोड़ा पीछे हो लेकिन यहां भी समय के साथ यह धंधा बढ़ता जा रहा है। नदी किनारे, पहाड़ी इलाकों का कोई भी जिला ऐसा नहीं बचा है जो अवैध खनन माफियाओं से बचा हो।

बात यहीं तक सीमित नहीं है। इससे आगे जाकर देखा जाये तो खनन माफिया राजनेताओं के ही संरक्षण मे फलफूल रहे हैं। वाइन किंग के नाम से दौलत और शोहरत बटोरने वाले पोंटी चड्ढा (अब दिवंगत) ने मुलायम और माया की मेहरबानी से अवैध खनन में खूब नाम कमाया था। आज भी उसके ही कारिंदो की यहां तूती बोलती है। कई सांसद और विधायक तो सीधे तौर पर इस धंधे में जुड़े हैं। बसपा के पूर्व नेता और मंत्री रह चुके बाबू सिंह कुशवाह का तो सीधे तौर पर अवैध खनन में नाम आ चुका है। शायद ही कोई खनन माफिया होगा जो सफेदपोश संरक्षण के बिना आगे बढ़ रहा हो।

राज्य में प्रति वर्ष अरबों रूपये का अवैध खनन का कारोबार होता है। इस धंधे से अफसरों से लेकर नेताओं तक को और चंदे के रूप में राजनैतिक दलों को आर्थिक लाभ मिलता है। ऐसा नहीं है कि खनन माफियाओं पर नकेल कसने के लिये कानूनों की कमी हो, लेकिन हरे-हरे नोटों के कारण सब कानून ताक पर रख दिये जाते हैं। अक्सर देखने में यही आया है कि सरकार से बड़ा साबित होता है माफियाओं का तंत्र। समय-समय पर अवैध खनन का धंधा खूनी भी हो जाता है। गैंगवार होती है तो खून-खराबा होता है। अवैध खनन के खिलाफ कोई आवाज उठाता है तो उसे मौत की नींद सुला दिया जाता है। नोयडा में अवैध खनन का विरोध करने वाले किसान पाले राम की हत्या इस बात का ताजा प्रमाण है। प्राकृतिक संसाधनों का अवैध खनन रोकने के लिये अदालतें हमेशा सख्त रहती हैं, इसके बाद भी कभी भी खनन माफियाओं के हौसले पस्त नहीं हुए। अगर कभी अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई होती भी है तो वह महज खानापूरी से अधिक नहीं होती।

कहने को तो यूपी के युवा सीएम खनन माफियाओं के प्रति काफी सख्त दिखने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनका जिला इटावा ही जब खनन माफियाओं का गढ़ बना हो तो हालात समझे जा सकते हैं। खनन माफियाओं के कारण चंबल, यमुना समेत कई नदियों का स्वरूप बदल रहा है। लाखों रूपये प्रतिदिन खनन माफिया ‘दान’ में बांट देते हैं। इटावा के आसपास पर्यावरण का काम करने वाले ‘फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर’ के सचिव डा राजीव चौहान कहते हैं कि सत्तारूढ दल के लोग बंदूकों की नोक पर खनन का काम करते हैं। इटावा में कई विकास के काम चल रहे है, जिसके लिये बालू की व्यवस्था इन्हीं खनन माफियाओं से हो जाती है।

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट बताती है कि झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में पिछले पांच वर्षो में 3,200 करोड़ रुपये की राजस्व हानि उठानी पड़ीं थी। सीएजी इस संबंध में कहती है कि राज्य में बड़े-बड़े हाइवे बन गये और उसके लिये बड़े-बड़े पहाड़ों को खत्म कर दिया गया। इसके बाद भी खनन विभाग सोता ही रहा। सीएजी रिपोर्ट कहती है कि उत्तर प्रदेश में करीब साढ़े चार सौ मामलों में जिलाधिकारियों ने एनओसी जारी की थी, लेकिन खनन का राजस्व नहीं दिया। इससे भी सरकार को 238 करोड़ के करीब नुकसान हुआ।

आईएएस दुर्गा शक्ति का मामला सुर्खियों में आने के बाद अखिलेश सरकार और उनके करीबी नौकरशाहों ने डैमेज कंट्रोल के तहत खनन माफियाओं के खिलाफ कुछ सख्त कदम जरूर उठाये हैं। कई जगह अभियान भी चलाया जा रहा है। अवैध खनन रोकने के लिये लखनऊ में टास्क फोर्स का भी गठन किया गया है। मगर यह सब कदम नाकाफी साबित हो रहे हैं। वैसे चर्चा को खनन माफिया तक ही सीमित करना उचित नहीं होगा। यूपी में करीब एक दर्जन किस्म के माफियाओं की समय-समय पर बसपा-सपा सरकार में तूती बोलती रही है। दवा, भू, जंगल, पत्थर, तेंदू, लौह, कोयला, लाल बालू, अनाज, शराब, मिट्टी आदि तमाम तरह के माफिया समय-समय पर चर्चा में रहते हैं। परीक्षा का समय होता है तो शिक्षा माफियाओं की चांदी हो जाती है।

सरकारी ठेके हासिल करने के लिये तो माफियाओं के बीच जंग का इतिहास काफी पुराना है। पूर्वांचल के अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, अखंड सिंह, ब्रजेश सिंह, मुन्ना बजंरगी, धनंजय सिंह आदि का यहां नाम हमेशा सुर्खियां में रहा है। वर्तमान में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिला भदोही के विधायक और बसपा नेता नंद गोपाल नंदी पर हमले के अरोपी विजय मिश्रा, गाजीपुर के मुख्तार अंसारी, आजमगढ़ के अखंड और कुंटू सिंह, बनारस के विनीत सिंह और सुशील सिंह का पूरा गुट एकजुट होकर अवैध खनन से लेकर अन्य तमाम वैध-अवैध धंधों में एक छत्र राज कर रहा है। इसके गुट के आका का नाम विधायक विजय सिंह बताया जाता है। इन लोगों के नाम पर ही अरबों रूपये का कारोबार होता है। बागपत से लेकर सोनभद्र तक इस गुट का दबदबा है। बात पुरानी है लेकिन अनदेखी नहीं की जा सकती है। माफियाओं ने कभी मिर्जापुर  सोनभद्र में एक लाल पत्थर के पहाड़ को इस बेदर्दी से तराश डाला कि पूरा का पूरा पहाड़ ही ध्वस्त हो गया। गोरखपुर में इन दिनों रेलवे माफिया के नाम से मशहूर सुभाष दुबे का दबदबा चल रहा है। उसके ऊपर 45 मामले दर्ज हैं। दूबे रेलवे में कर्मचारी है और बिहार के रेल माफिया राजन तिवारी का दाहिना हाथ बताया जाता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खनन माफिया के साथ-साथ सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे, रंगदारी चीनी मिल मालिकों से जबरन वसूली का धंधा इन दिनों जोरों पर है। चर्चित माफिया गिरोहों में मुजफ्फर नगर के सुशील मूंछ, मेरठ के बदन सिंह बद्दो और बागपत के धर्मेन्द्र किरठल की दबंगई इस समय काफी तेजी पर है। बुलंदशहर के सपा विधायक गुड्डू पंडित का नाम भी माफिया सूची में टॉप पर है। नोयडा में अवैध  खनन के धंधे में लिप्त नरेन्द्र भाटी और उनके साथियों की चर्चा तो हो ही रही है। कानपुर में गंगा के किनारे से अवैध खनन, चमड़ा व्यापारियों से वसूली, सुपारी लेकर हत्या के मामले में अतीक पहलवान जेल से ही अपना गैंग संचालित करता है। इस गैंग को पुलिस रिकार्ड में डी-टू का कोड मिला हुआ है। इलाहाबाद में बीएसपी विधायक कपिल मुनि करवरिया उनके भाई भाजपा विधायक उदय करवरिया का बालू के अवैध खनन में कोई सानी नहीं है।

बुंदेलखंड में बाबू सिंह कुशवाह का दबदबा घटने के बाद यहां पर झांसी के सपा नेता चन्द्र पाल यादव और सपा के ही घनश्याम अनुरागी के गुर्गो ने पूरी बेतवा नदी पर ही कब्जा कर रखा है। यहां से निकली महीन और मोटी मौरंग की मांग पूरे देश है। यह जानकार आश्चर्य होगा कि बाजार में चालीस हजार रूपये प्रति ट्रक बिकने वाली मौरंग का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खनन के समय ही इन गुर्गों द्वारा वसूल लिया जाता है। बेतवा से मौरंग का अवैध खनन करने के बाद ट्रकों को माफिया के लोग सुरक्षित रूप से 50 से सौ किलोमीटर के दायरे तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी लेते हैं। सुल्तानपुर में सोनू सिंह और मोनू सिंह का अपना सशक्त गिरोह है। सोनू सिंह हाल में ही भाजपा में शामिल हुए हैं। इलाहाबाद में संत ज्ञानेश्वर हत्याकांड में भी दोनों जेल में बंद रहे थे। सुल्तापुर, फैजाबाद, अंबेडकर नगर में इस गैंग खनन से लेकर अनेक अपराधों में तूती बोलती है। सत्ता की हनक और राजनैतिक दंबगई के बल पर गोंडा में बृजभूषण शरण, रायबरेली के अखिलेश कुमार सिंह, बलरामपुर के जहीर, लखनऊ के अरूण कुमार शुक्ला उर्फ अन्ना महाराज,रामचन्द्र प्रधान,उन्नाव के बृजेश पाठक भी अवैध धंधों का साम्राज्य स्थापित किये हुए हैं।

बात खूनी खेल की कि जाये तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसकी दस्तक पहली बार सुनाई दी। गोरखपुर में पूर्वोत्तर रेलवे में 70-80 के दशक में स्क्रैप और रेलवे के अन्य ठेकों को लेकर हरी शंकर तिवारी और वीरेन्द्र प्रताप शाही गुट के बीचं जंग शुरू हुई थी। इसी जंग के बाद जातीय आधार पर यह दोनों माफिया नेता बन कर भी सामने आए। इसी के बाद शुरू हुआ डान कहलाने वाले लोगों का विधायक और सांसद बनने का सिलसिला। यह लोग कितने ताकतवर थे इस बात का अहसास एक घटना से हो जाता है जब कोयला माफिया के सरताज कहलाने वाले सूर्यदेव सिंह के ऊपर गाज गिरी तो प्रधानमंत्री रहते हुए चंद्रशेखर उनके पक्ष में खड़े दिखाई दिए।

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने 1998 में तत्कालीन गुह विभाग से प्रदेश में सक्रिय माफियाओं की बाकायदा सूची तैयार करवाई थी, जिसके अनुसार, उस समय उत्तर प्रदेश में 744 माफिया गिरोह सक्रिय थे और तब उनका सालाना टर्न ओवर दस हजार करोड़ रूपये का था। तब ही पहली बार अधिकृत रूप से यह पता चला था कि यूपी में कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बचा था, जिसमें माफिया सक्रिय न हो। कल्याण के इशारे पर इन माफियओं के सफाए के लए ‘स्पेशल टास्क फोर्स‘ का गठन हुआ था, कई माफिया सरगना मारे गए। इसके बावजूद माफियाओं के हौसले पस्त नहीं पड़े। 2006 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माफियाओं के संबंध में सरकार से सरकार से रिपोर्ट मांगी तो खुलासा हुआ कि कि सभी आर्थिक क्षेत्र में माफियाओं का दखल है।

बात अवैध खनन के प्रभावों की कि जाये तो अवैध खनन का प्रभाव जगह-जगद दिखने लगा है। फैजाबाद के गुप्तारघाट के निकट बने बांध को खतरा पैदा हो गया है। यही हाल फैजाबाद के उमरपुर गांव का है, जहां धड़ल्ले से अवैध खनन किया जा रहा है। अंबेडकर नगर मेंघाघरा के तट पर अवैध खनन कर माफिया जहां राजस्व की तगड़ी चपत लगा रहे, वहीं इससे भूस्खलन और कछार के इलाकों में कटान का खतरा भी उत्पन्न हो गया है। अंबेडकर नगर के ही जहांगीरगंज थाना क्षेत्र के मांझा इसौरी नसीरपुर का है। गत 26 मार्च को यहां अवैध खनन की सूचना पर आलापुर तहसील के तत्कालीन तहसीलदार रामजीत मौर्य अमले के साथ मौके पर जा पहुंचे। इन्होंने अवैध खनन रोकते हुए कार्रवाई का निर्देश दिया तो कुछ ही पल में माफिया और उनके गुर्गे आ धमके। इन लोगों ने असलहे के बल पर तहसीलदार को बंधक बना लिया। खनन माफिया के चंगुल से छूटने के बाद तहसीलदार ने जहांगीरगंज थाने में आरोपियों आलापुर थाना क्षेत्र के पड़रौना निवासी नरेंद्र सिंह बुजेश सिंह व दो अज्ञात के विरूद्ध प्राथमिकी दर्ज करा दी।

जिला बलरामपुर में खनन के चलते पहाड़ी नाले धीरे धीरे नदी में तब्दील हो रहे हैं। खनन के चलते कई  गांव तबाही के मुहाने पर हैं। प्रशासन का दावा है खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है, लेकिन रेत का काला कारोबार यहां धड़ल्ले से चल रहा है। जैसे जैसे रात का अंधेरा बढ़ता है, अवैध खनन से जुड़े लोग सक्रिय हो जाता हैं यहां हर माह अवैध खनन से लगभग एक करोड़ रूपए का वारा न्यारा हो रहा है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

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