Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

मेहनताना हड़पने वाला विजय दीक्षित हर तीन-चार दिन में सिमकार्ड क्यों बदलता है?

न जाने वो कौन सा नक्षत्र था जिसमें मैंने एस वन चैनल को ज्वाइन किया। ठोकर तो पहले कदम से ही लगनी शुरू हो गए थी। इनपुट हेड से लेकर चैनल हेड तक तमाम ठोकरों के बाद भी गधा ‘गाजर’ के लालच और अहंकार के लिए दौड़ता रहा। एसवन के मालिक विजय दीक्षित ने गधे की खून-पसीने की कमाई के नौ लाख की गठरी बनाई और गधे के पिछवाड़े पर जोर की जमा दी। नौ लाख तो इसलिए कह रहा हूं कि मोटी-मोटी रकम मुझे मालूम है।

न जाने वो कौन सा नक्षत्र था जिसमें मैंने एस वन चैनल को ज्वाइन किया। ठोकर तो पहले कदम से ही लगनी शुरू हो गए थी। इनपुट हेड से लेकर चैनल हेड तक तमाम ठोकरों के बाद भी गधा ‘गाजर’ के लालच और अहंकार के लिए दौड़ता रहा। एसवन के मालिक विजय दीक्षित ने गधे की खून-पसीने की कमाई के नौ लाख की गठरी बनाई और गधे के पिछवाड़े पर जोर की जमा दी। नौ लाख तो इसलिए कह रहा हूं कि मोटी-मोटी रकम मुझे मालूम है।

विजय दीक्षित की जेल यात्रा के दौरान, एसवन चैनल के साथ अपने अस्तित्व और लगभग सौ-सवा सौ लोगों का भविष्य संवारने के भ्रमजाल में जो भिक्षाटन किया, उसका तो कोई हक-हिसाब है ही नहीं। सुबह एक राउंड घूमकर जनरेटर के डीजल के लिए पैसे इकट्ठा करने होते थे। फिर टेप, कैब-कैमरा-कनेक्टर और मशीन-मिक्सर का इंतजाम कराना होता था।

विजय दीक्षित ने कभी यह जानने की जुर्रत भी नहीं की कि ये सारे इंतजाम कहां से और कैसे हुए। किसी के पैसे की वापसी भी करनी है, यह तो विजय दीक्षित ने सपने में भी नहीं सोचा। विजय दीक्षित डायमंड रिंग खरीदते हैं, विजय दीक्षित सौ करोड़ का फार्म हाउस खरीदते हैं। विजय दीक्षित मर्सिडीज वैंस खरीदते हैं। किसी के पेट में पल रहे अय्याश औलाद के पाप को धो डालने के लिए पच्चीस-पच्चीस लाख का हरजाना दे सकते हैं। सुबूत मिटवाने और मुंह बंद करने के लिए लाखों दे सकते हैं, लेकिन कर्मचारियों के वेतन, पीएफ और ईएसआई का पैसा नहीं चुका सकते।

विजयमदशमी के नीलकंठ की तरह दुर्लभ हैं विजय दीक्षित के दर्शन। हर दो चार दिन बाद नया सिमकार्ड बदल लेते हैं। जैसे-तैसे नम्बर हासिल करो तो महीने की 30 तारीख को बैठ कर हिसाब करने की गाजर लटका देते हैं। न जाने कितनी 30 तारीखें आई और चलीं गईं। आज तक हिसाब नहीं हो पाया है। तरह आखिरी ठोकर इतनी ज़ोर की लगेगी यह मालूम न था।

बहरहाल, एसवन की तनख्वाह मिलने में देरी का सिलसिला 2007 में ही शुरू हो गया था। पहली बार कुछ दिन देर तनख्वाह

विजय दीक्षित

विजय दीक्षित

मिली। फिर दिन से महीना, दो महीने, चार महीने, और फिर छह-छह महीने बाद तनख्वाह के दर्शन होते। फिर टुकड़ों में तनख्वाह आने लगी। यह भी याद रखना मुश्किल होता था कि कौन से महीने की तनख्वाह के टुकड़े मिल रहे हैं। पांच-पांच हजार रुपये महीने पर काम करने वाले साथियों के चेहरे देख कर मैं अपने टुकड़े कभी घर नहीं ले जा पाया।

नतीजा यह हुआ कि मुझे अपनी पुरानी इस्टीम कार बेचनी पड़ी, फिर मोटर साइकिल बिकी। रात को ऑफिस से छूटने के बाद नोएडा सेक्टर 32 से गुड़गांव जाकर फ्रीलॉंसिंग से करने लगा। फ्रीलॉसिंग, इसलिए कह रहा हूं कि वो अतिरिक्त काम मैंने पैसे कमाने की इच्छा से ही किया था। वरना, आचार्य पंडित इंदु प्रकाश मिश्रा (मेरे आध्यात्मिक गुरु) के काम आना, उनके प्रति मेरी गुरु दक्षिणा का एक अंश मात्र हो सकता था। मैंने उनके लिए काम किया वो भी फ्रीलॉसिंग समझ कर।

सोचा तो यह था कि एसवन से तनख्वाह के पैसे एक न एक दिन तो मिल ही जाएंगे। तो सब कुछ बराबर कर दूंगा। फ्रीलांसिंग से जो मिलता वो भी कर्ज से ली गई मारूति के पेट्रोल और मोबाइल फोन को रीचार्ज कराने में पूरा हो जाता। ये अलग बात है कि मारूति कि किश्तें टूट गईं और बैंक से तकादे शुरु हो गए। कार का पहिया घूम रहा था, इसलिए सहयोगियों और अधिनस्थों को भी लगता था कि आज कैसा भी हो ‘कल सुनहरा’ जरूर होगा।

मनरेगा में कंसलटेंट छोटे भाई का जिक्र छोड़ भी दूं तो भी मुझे अपने सीनियर रवींद्र शाह (जो सूक्ष्म में आज भी मेरे साथ हैं) के अलावा अमित तिवारी और नेहा विजय का जिक्र तो करना ही पड़ेगा (गैर जर्नलिस्ट संबंधों का जिक्र इसलिए नहीं क्योंकि उन्होंने मना किया है) जिन्होंने पर्दे के पीछे रह कर मुझे धन और मन से कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। आपात परिस्थितियों में ये लोग हमेशा मेरे साथ खड़े नजर आए।

शाह सर और अमित तिवारी ने एसवन छोड़ दिया था लेकिन एसवन का अस्तित्व बचाए रखने के लिए वो अपने-अपने स्तर का सहयोग मुझे देते-दिलाते रहे। यहां यह कहना ज्यादा सटीक होगा कि वो एसवन के लिए नहीं, मेरी जिद, प्रतिष्ठा और अस्तित्व के लिए ऐसा करते रहे। सुधीर, सुरेश, सतेन्दर और अरुण तिवारी तो एसवन में मेरा साया बन कर रहे।

मेरी जिद थी कि जब तक शरीर में ताकत दिल और दीमाग में सोच व हिम्मत है तब तक एसवन चैनल की स्क्रीन ब्लैक न हो। बहुत बार तो ऐसा हुआ है कि सुधीर, सुरेश और सतेन्दर कई-कई दिन-रात बिना नहाए-धोए, खाए-पिए सर्वर रूम और टेलीपोर्ट पर इस लिए गुजार देते कि कोई फॉल्ट होने की दशा में चैनल ब्लैक न हो जाए। इंजीनियर को बुलाना पड़े तो व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर उसे तुरंत बुलाया जा सके।

इंजीनियरों को चैनल लाने और पहुंचाने का जिम्मा खुद उठाते, कम से कम पैसों में काम हो जाए, इसलिए रात को काम करवाते…और वो पैसा भी अक्सर अपने एटीएम एकाउंट्स से निकाल कर दे देते। मैं इन लोगों का आज भी कर्जदार हूं। मशीनरी की वजह से एसवन में तब तक कभी ब्लैक आउट नहीं हुआ जब तक में ये तीनों एसवन में साथ रहे। कर्मचारी चाहे वो जर्नलिस्ट हों या नॉन जर्नलिस्ट, टेक्निकल या नॉन टेक्निकल अपनी शिफ्ट पूरी करते थे। तंगी में झुंझलाहट और गुस्सा तो दिखाया, लेकिन किसी ने कभी काम करने से इंकार नहीं किया। विजय दीक्षित ने इन लोगों के साथ भी बेईमानी की।

विजय दीक्षित कर्मचारियों की तनख्वाह से पीएफ और ईएसआई का पैसा काटते रहे, लेकिन पीएफ और ईएसआई के खातों में पैसा जमा ही नहीं किया गया। विजय दीक्षित ने एक बार नहीं कई बार एसवन चैनल को बेचा। पैसा लिया और हड़प कर गए। चैनल में पैसा लगाया ही नहीं। इसरो का पैसा नहीं दिया। आज भी इसरो का कई करोड़ बकाया है। आखिरी दिनों में इसरो ने फ्रीक्वेंसी डाउन कर दी। फिर भी चैनल इन हाउस चलता रहा। एक बार ‘नागपाल’ जी को चैनल विजिट करवाया। 20 करोड़ में चैनल की डील कर डाली। चैनल में बीस कौड़ी भी नहीं लगाई। इसके अलावा ‘पप्पू जी’ से भी करोड़ों रुपये लेकर खा लिए। ‘पप्पू जी’ का रसूख सत्ता और बाहर सब तरफ रहा है, इसलिए मॉल और चैनल के पेपर ‘पप्पू जी’ को सौंप कर विजय दीक्षित अपने आप को ‘फ्री’ समझ रहे हैं।

यह बात अलग है कि मॉल का मालिकाना हक विवादित है और न्यायालय के विचाराधीन है। इसलिए 1994 से निर्माणाधीन मॉल आज तक मॉल चालू नहीं हो पाया है। दर्जनों लोगों से मॉल और चैनल के नाम पर कई सौ करोड.रुपये हजम कर चुके हैं विजय दीक्षित लेकिन ज्यादातर पैसा बेनामी है, इसलिए कोई आज तक कुछ खास नहीं कर पाया है। कुछ मुकदमे चल रहे हैं। कुछ में गैर जमानती वारंट हैं। एक आध बार जेल हो आए हैं। लेकिन विजय दीक्षित ने किसी को पैसे वापस नहीं किए हैं। यह अपवाद ही है कि विजय दीक्षित ने ‘पप्पू जी’ को चैनल और मॉल के कागज और ‘कनोडिया’ को शांतिनिकेतन वाली कोठी सुपुर्द की है।

…जारी….

लेखक राजीव शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई अखबारों व न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.


अगर विजय दीक्षित ने आपका भी पैसा हड़पा है या आपके साथ अन्याय किया है तो अपनी बात भड़ास तक पहुंचाइए, [email protected] पर मेल करके.


इसे भी पढ़ें–

'सीनियर इंडिया' के मालिक विजय दीक्षित ने मारा कार्टूनिस्ट चंदर का मेहनताना


इसे भी देखें…

विजय दीक्षित के खिलाफ कई प्रदेशों में धोखाधड़ी, जालसाजी, साजिश के कितने मामले? गिनती उनके वकीलों को ही याद होगी

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...