किसी भी समाज में अश्लीलता के लिए कोई जगह नहीं। लेकिन अगर बाजार इसे स्वीकार कर ले तो फिर सामाजिक मूल्यों के लिए कोई जगह नहीं। पोर्न जर्नलिज्म या खबरों को अश्लील स्वरूप में पेश करने की कला इसकी मिसाल है। एक न्यूज पोर्टल में काम करने वाले मेरे एक मित्र सुबह उठते ही गूगल पर ‘सैक्सी, हॉट, लिंगरी, गर्ल्स’ जैसे शब्दों के साथ खोज में जुट जाते हैं। वजह, रोजाने की उन दो ‘खबरों’ का तनाव, जो उसे देनी होती है। पोर्टल मैनेजमेंट की सख्त ताकीद है, ‘अगर पेज व्यूज नहीं बढ़े तो पगार भी नहीं बढ़ेगी और फिर नौकरी जाएगी सो अलग।’
इन जनाब का कहना है, ‘अलग, कैची, रोचक, सैक्सी कंटेंट पर ही हिट्स मिलते हैं। न्यूज तो सब परोसते हैं।‘ यह है आज के जमाने का पोर्न जर्नलिज्म। इस तरह की खबरों को पकाने (कुक), तोड़-मरोड़कर पेश करने (ट्विस्ट) में महारत हासिल होने के बाद इन जनाब की पगार पिछले तीन साल में चार बार बढ़ाई गई। उनके मुताबिक, ‘प्रिंट मीडिया में पगार बढ़ने के लिए कम से कम दो साल इंतजार करना पड़ता है।‘
बहरहाल, सबसे पहला सवाल। ऑनलाइन न्यूज पोर्टल बीते कुछ महीनों में बेहद आक्रामक रूप से ‘न्यूड पोर्टल’ क्यों होते जा रहे हैं ? भारत में प्रिंट मीडिया का बाजार पिछले दो साल से लगभग 8-9 फीसदी पर स्थिर है। जबकि डिजिटल मीडिया ने पिछले साल की दूसरी तिमाही में 34 फीसदी और आखिरी तिमाही में 24 फीसदी की बढ़त दर्ज की है। प्रिंट मीडिया में भी हिंदी अखबारों की जमीन ज्यादा खिसकी है। एवरेज इश्यू रीडरशिप यानी एआईआर के ताजा आंकड़ों को देखें तो देश के 10 बड़े हिंदी अखबारों का सर्कुलेशन 6.12 प्रतिशत घटा है। मैगजीन के बाजार में तो यह आंकड़ा 30 प्रतिशत से ज्यादा की दर से भयावह रफ्तार पकड़ रहा है। आउटलुक ने जहां अपने तीन अंतरराष्ट्रीय टाइटल बेचे हैं तो टाइम्स समूह को क्रेस्ट की छपाई बंद करनी पड़ी। फिर भी पीडब्लूसी के ग्लोबल मीडिया आउटलुक का अनुमान है कि 2017 तक भारतीय प्रिंट मीडिया की कमाई 10 फीसदी की रफ्तार से बढ़ेगी। प्रिंट मीडिया में विज्ञापन की दरें बेहद ज्यादा हैं। लिहाजा 30 हजार करोड़ से ज्यादा के विज्ञापन बाजार में प्रिंट की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत और डिजिटल मीडिया का हिस्सा सिर्फ 7 प्रतिशत है। जाहिर है, प्रिंट का बढ़ता घाटा डिजिटल पर कमाई का दबाव बढ़ा रहा है।
पर बात इतनी छोटी भी नहीं है। आईएमआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मोबाइल उपयोग करने वाले 87 करोड़ लोगों में 4.8 करोड़ ऐसे हैं, जो हर दो-तीन घंटे में इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। औसतन एक घंटे की सर्फिंग के दौरान ये टीवी और खबरों से दो-चार हो लेते हैं। मोबाइल पर कंटेंट का उपयोग तेजी से बड़ी स्क्रीन, यानी 4 इंच से ज्यादा के स्मार्टफोन और टैबलेट की ओर जा रहा है। साफ है, ई-मेल और सोशल नेटवर्किंग ही लोगों का मकसद नहीं रहा। अब इसी 4.8 करोड़ मोबाइल यूजर्स में से 40 फीसदी ने प्रिंट, यानी अखबार और टीवी से किनारा कर डिजिटल मीडिया को अपना लिया है। इससे अंग्रेजी अखबारों के ग्राहक कटे हैं। उधर हिंदी अखबार लागत और कमाई में बढ़ते फासले से परेशान हैं। संपादकीय विभाग का खर्च घटा है। अखबारों के पन्ने कम किए गए हैं और कुछ ब्यूरो ऑफिस भी बंद हुए हैं। नतीजतन कंटेंट का टोटा है।

कमोवेश यही बात डिजिटल मीडिया पर भी लागू होती है। खासतौर पर भाषायी डिजिटल मीडिया पर। ऑनलाइन मीडिया में लंबे समय तक काम कर चुके एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि न्यूज पोर्टल का सारा खेल रियल टाइम न्यूज पर है। यहां का मंत्र, ‘सबसे पहले, सबसे रोचक और सबसे नया’ का चलता है। एक पेज पर इस मंत्र को लपेटती दो खबरें भी हजारों हिट्स पैदा करती हैं। इस मंत्र को साधने के लिए खबर पैदा करना पड़ता है। चाहे इसके लिए रीडर को उल्लू भी क्यों न बनाना पड़े। मिसाल के लिए हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में 2009 में एक विवादास्पद शोध किया गया। पाया गया कि डायट कोक महिलाओं के लिए एक प्रभावी गर्भनिरोधक है। काफी हल्ला मचने के दो साल बाद इस शोध को खारिज कर निराधार बता दिया गया। दो साल बाद एक हिंदी डॉट कॉम के नौसिखिए खबरी ने इसे ‘स्पर्म किलर’ के नाम से पेश कर दिया। न्यूज पोर्टल में काम करने वाले ऐसी खबरों को असामान्य नहीं मानते। पोर्टल से प्रिंट में आए एक पत्रकार ने बेलाग कहा कि ज्वॉइनिंग के कुछ हफ्तों बाद ही हमें उसी मंत्र को साधना सिखाया जाता है, जिस पर डिजिटल मीडिया का वजूद टिका है। इसके लिए प्रबंधन हर कीमत चुकाने को तैयार है। खबरों का स्रोत, उसकी भाषा, एडिटिंग और नैतिकताएं कोई मायने नहीं रखतीं। ये सब ‘ड्राय न्यूज’ के लिए हैं। हिट्स पैदा करने वाली ‘खबरों’ के लिए नहीं। हादसा हुआ, पांच मिनट में 10 लाइनें डालनी हैं। इतने कम समय में कौन सोर्स देखे और कौन तथ्यों को क्रॉस चेक करे। न्यूज पोर्टल के एक पूर्व संपादक कहते हैं, ‘न्यूज पोर्टल ही क्यों, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी संपादक नाम का कोई शख्स नहीं है। सब सीईओ या सीओओ जैसे लोगों के हाथ में है। खबर पर हिट्स हों तो वह ठीक है, वरना लाख दर्जे की खबर में भी सैकड़ों नुक्स निकाले जाएंगे।’
बीते दिनों एक नामी हिंदी पोर्टल ने 2011 की एक क्राइम स्टोरी को बेहद आपत्तिजनक तरीके से डेमो फोटो के साथ लगा दिया। इसी हिंदी न्यूज पोर्टल ने जयपुर में एक परिवार की पिकनिक पार्टी को चोरी-छिपे कैमरे में कैद कर हिट्स के लिए बेच दिया। इस तरह का गोरखधंधा तकरीबन सभी हिंदी न्यूज पोर्टल में कहीं बॉलीवुड, कहीं लाइफस्टाइल, सेलेब्स, जरा हटके जैसे टेम्पलेट्स के रूप में होता है। कोई मानक नहीं, कोई रोक-टोक नहीं, कोई नैतिकता नहीं। व्यावसायिकता की कसौटी पर ये बातें बेमानी हैं। महिलाओं की तस्वीरें बिकती हैं। चाहे वे छाता लगाए खड़ी हों या फिर मिनी स्कर्ट में टेनिस खेल रही हों। एक और पोर्टल पत्रकार बेलाग कहते हैं कि उनके माध्यम में कंटेंट का हर हिस्सा बिकना चाहिए। इन जनाब ने डेढ़ साल पहले एक मॉल में जाकर कॉमन ट्रायल रूम में अपना कैमरा ऑन करके कपड़ों के बीच छिपा दिया। कुछ देर बाद कैमरा खोने का बहाना करते हुए वापस उसी ट्रायल रूम में पहुंचे और एक शानदार क्लिपिंग के साथ लौटे। दूसरे दिन सुबह उन्होंने महिलाओं से ट्रायल रूम में सावधान होने की अपील करते हुए एक ‘पीस’ लिख मारा और एक ‘रियल टाइम’ फोटो डाल दी। जनाब सीना तानकर बताते हैं कि उस अकेली खबर पर 30 हजार से ज्यादा हिट्स आए और मेरी नौकरी जाते जाते बची। ये आगे बताते हैं कि कौन सी तस्वीर बिकेगी और कौन सी नहीं, ये सभी को पहले ही सिखा-समझा दिया जाता है।

इस अंधी व्यावसायिकता में असल खबरें कहीं खो गई हैं। मुझे याद है, एक वरिष्ठ संपादक ने कहा था कि अगर हम अपने सारे एडिशंस से दो-दो अच्छी खबरें भी चुनकर पेश करें तो अखबार सबसे अनोखा होगा। उनकी यह सीख कुछ महीनों तक सोलह आने सही साबित हुई। अखबार से डॉट कॉम तक के सफर में खबर की कीमत कई गुना बढ़ी। डॉट कॉम भी चमका। फिर प्रबंधन बदला और उसने सब-कुछ उलट-पुलट कर दिया। नए परिवेश में न्यूनतम शब्दों और अधिकतम विजुअल के साथ डिजिटल हिंदी मीडिया में छाए रहने का इकलौता तरीका पोर्न के रूप में पनप रहा है। यहां प्रकाशक का इरादा लोगों को सूचना देना, ज्ञान बढ़ाना या जागरूक करना नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से सैक्स की खुराक परोसना है। यह बेहद आपत्तिजनक है। डिजिटल न्यूज मीडिया में कंटेंट किस कदर प्रदूषित हो चुका है, इसकी मिसाल आपको गूगल सर्च पर ‘सैक्स’ शब्द टाइप करते ही मिलेगी। खोज के नतीजों में बीसियों साइट्स न्यूज पोर्टल की होंगी।
इस साल जून में केंद्र सरकार ने 39 वेबसाइटों को पोर्न बताकर बंद करवा दिया था। लेकिन विदेशी होस्ट सर्वर और नए यूआरएल के साथ दाखिल हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट में डिजिटल मीडिया में आपत्तिजनक सामग्री के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर है तो दूसरी राज्यसभा के ठंडे बस्ते में पड़ी है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में माना है कि वेबसाइटों पर इस तरह की सामग्री को रोक पाना उसके बस में नहीं है। आईटी कानून की धारा 67बी में चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर पाबंदी है, लेकिन वयस्कों के लिए नहीं। पोर्न कंटेंट के पैरोकार इसे अपना कवच मानते हैं। वे कहते हैं, मुंबई से लेकर उड़ीसा के एक पिछड़े गांव तक में पोर्न बिक रहा है। कच्चे हाथ मोबाइल लिए घूमते हैं। उनमें आधा दर्जन क्लिपिंग्स एडल्ट होती हैं। फिर हम कौन सा गुनाह कर रहे हैं। वास्तव में मौजूदा लचीले कानून से ऐसे कंटेंट को रोकना संभव नहीं। इसके लिए चीन सरीखे सख्त एंटी पोर्नोग्राफी कानून बनाने होंगे, ताकि व्यक्तिगत रूप से, एकांत में, निजता के साथ देखी जाने वाली चीजें सार्वजनिक न हो सकें। गूगल पर 2004 से 2013 के बीच सर्च इंजिन पर की-वर्ड के रूप में ‘पोर्न’ शब्द की खोज में पांच गुना बढ़ोतरी हुई है। डेढ़ करोड़ से ज्यादा आबादी वाला दिल्ली शहर ‘पोर्न’ खोजने वाला दुनिया का पहला बड़ा महानगर है। अमेरिका के डलास का नंबर दूसरा है। आईएमआरबी की 2011 की स्टडी बताती है कि देश में हर पांचवां मोबाइल यूजर 3जी सेवा के जरिए पोर्न कंटेंट चाहता है। बाजार में बिकता पोर्न इसके लिए प्रेरक बनकर उभरा है। अमेरिका में पत्रकारिता के प्रोफेसर रॉबर्ट जेनसन ने पिछले साल न्यूयॉर्क टाइम्स में अपने लेख में दावा किया था कि ज्यादातर पोर्न कंटेंट में स्त्री को पीड़ित के रूप में दिखाया जाता है, जिससे पुरुषों का सैक्स के प्रति रवैया ज्यादा आक्रामक हो जाता है। आने वाले कल को डिजिटल मीडिया में न्यूज कंटेंट और वीभत्स रूप ले सकता है। इसलिए कड़े कानून के साथ कंटेंट की सफाई का अभियान चलाना होगा।

सौमित्र राय का विश्लेषण.





