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मीडिया को रेगुलेट किए जाने के खिलाफ बोलने वाले पोप पत्रकार अब छंटनी के मसले पर चुप क्यों?

Vineet Kumar : मीडिया को रेगुलेट करने की जब भी बात आती है, इस इन्डस्ट्री के एक से एक बड़े चेहरे सेल्फ रेगुलेशन का झंड़ा लेकर खड़े हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि पत्रकारिता एकमात्र ऐसा पेशा है जिसके लिए लोग मां की कोख से ही पोप बनकर पैदा होते हैं और उन्हें भला कैसे रेगुलेट किया जा सकता है..लेकिन जब इस इन्डस्ट्री के भीतर यौन उत्पीड़न की घटना होती है, भारी छंटनी का काम होता है, ट्विट करके काम से बेदखल होने की खबर दी जाती है, कई दिनों तक नौकरी चली जाने के खौफ के साये में रखा जाता है..ये सारे झंडबदार वीकएंड मनाने निकल जाते हैं..

Vineet Kumar : मीडिया को रेगुलेट करने की जब भी बात आती है, इस इन्डस्ट्री के एक से एक बड़े चेहरे सेल्फ रेगुलेशन का झंड़ा लेकर खड़े हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि पत्रकारिता एकमात्र ऐसा पेशा है जिसके लिए लोग मां की कोख से ही पोप बनकर पैदा होते हैं और उन्हें भला कैसे रेगुलेट किया जा सकता है..लेकिन जब इस इन्डस्ट्री के भीतर यौन उत्पीड़न की घटना होती है, भारी छंटनी का काम होता है, ट्विट करके काम से बेदखल होने की खबर दी जाती है, कई दिनों तक नौकरी चली जाने के खौफ के साये में रखा जाता है..ये सारे झंडबदार वीकएंड मनाने निकल जाते हैं..

उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि जो धकिआया गया, उस पर क्या बीत रही होगी ? ऐसे में ये कहना क्या गलत होगा कि सेल्फ रेगुलेशन का मतलब सिर्फ और सिर्फ मालिकों की आवाज बनकर लोगों को झांसा देना और किसी भी हाल में मीडिया पर नियम और कायदे के तहत नहीं आने देना है. आपको बात बुरी लगे तो लगे नहीं, सेल्फ रेगुलेशन के नाम पर इन महंतों ने मीडिया के भीतर प्रतिरोध के स्वर को पूरी तरह कुचलने का काम किया है.

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Vineet Kumar : यकीन कीजिए, इन दिनों मीडिया में जो कुछ भी चल रहा है, उनसे गुजरते हुए मेरी मानसिक हालत ऐसी हो गई है कि लगता है उन तमाम मीडिया संस्थानों में जाउं, वहां पढ़ रहे मीडिया छात्रों को अपनी किताब मंडी में मीडिया जिसे लेकर मीडिया के बच्चे अक्सर मंहगी होने की शिकायत करते हैं, की मुफ्त प्रति दूं और कहूं- देखो, इस मीडिया के सच से एक बार गुजर जाओ. अपने को तैयार करो कि आगे क्या और कैसे करना है ? तुम हर सवाल के साथ- मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, ये मानवीय सरोकार का वाहक है, जनसंचार संस्कृत के चर धातु से निकला है जैसी दालमखनी बनाना बंद करो. इसे साहित्य के दरवाजे से गुजरने के बजाय, बिजनेस, इकॉनमिक्स, मैनेजमेंट, पॉलिटिक्स और पीआर के जरिए समझने की कोशिश करो. साहित्य से सिर्फ भाषा सीखो, बाकी सब इन विषयों से.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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