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दिल्ली

अपने मातहत किसी तेजतर्रार को कोई जगह नही देता

Deepak Sharma : ये सोच ले डूबी देश को.. दफ्तर में अक्सर बॉस अपने नीचे कमज़ोर को जगह देता है. कम्पनी में, किसी संस्थान में किसी जमात में यही दस्तूर देखा गया है कि अपने मातहत किसी तेज तर्रार को कोई जगह नही देता. बेहतर को हाशिए पर खिसका दिया जाता है. डर यही होता है की होनहार कहीं आगे चल कर बॉस को ही ना निगल जाये. ये छोटी मानसिकता है. आत्मविश्वास की कमी है. इसके नतीजा किसी भी उस संसथान पर उल्टा प्रभाव डालता है जहाँ का बॉस ऐसी कमज़ोर मानसिकता का हो.

Deepak Sharma : ये सोच ले डूबी देश को.. दफ्तर में अक्सर बॉस अपने नीचे कमज़ोर को जगह देता है. कम्पनी में, किसी संस्थान में किसी जमात में यही दस्तूर देखा गया है कि अपने मातहत किसी तेज तर्रार को कोई जगह नही देता. बेहतर को हाशिए पर खिसका दिया जाता है. डर यही होता है की होनहार कहीं आगे चल कर बॉस को ही ना निगल जाये. ये छोटी मानसिकता है. आत्मविश्वास की कमी है. इसके नतीजा किसी भी उस संसथान पर उल्टा प्रभाव डालता है जहाँ का बॉस ऐसी कमज़ोर मानसिकता का हो.

अफ़सोस ये है की इस मानसिकता का असर आज देश पर है. सोनिया गाँधी ने प्रणब मुख़र्जी या चिदंबरम की जगह मनमोहन सिंह को इसीलिए चुना और इतने सालों तक छदम कुर्सी पर रखा है की कहीं कोई काबिल बैठ गया तो सब कुछ उलट ना दे. सिर्फ इसी डर ने, इसी सोच ने, इसी मानसिकता ने देश कमज़ोर कर दिया. एक अनिर्णय और अनिश्चितता की स्थिति खड़ी कर दी और देश दिशाहीन लक्ष्यविहीन हो गया. मैंने कोई नई बात नही लिखी. पर मानसिकता की एक लकीर खींची है. तुलना की है छोटे-छोटे दफ्तरों की उस सोच से जहाँ होनहार किनारे किये जाते हैं. जहाँ काबिल ढूंढे भी जाते तो कमज़ोर टाइप के. जहाँ उदयमान उदय से पहले अस्त किये जाते है. जहाँ खुद को बचाए रखने के लिए कमज़ोर वजीर आगे बदाये जाते है. मित्रों दफ्तरों की मानसिकता तो समझ आती है …लेकिन क्या इस छोटी सोच से देश चलाया जा सकता है ?

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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