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मोटी पगार तो आशुतोष गुप्ता और राजदीप सरदेसाई की है…क्यों नहीं छोड़ते हैं पहले नौकरी?

मीडिया में इन दिनों एक मीडिया हाउस पब्लिक और मीडिया के बीच 'मारा-मारी' का मीडिया बना हुआ है। नाम है टीवी-18 और इसका अड्डा है..नोएडा फिल्म सिटी में। इस परिवार के दो भाई हैं। नाम है- सीएनएन और आईबीएन-7….सीएनएन का उस्ताद कोई राजदीप सरदेसाई और आईबीएन-7 का आशुतोष गुप्ता नाम का प्राणी बताया जाता है। गाहे-बगाहे दोनो की ही गिनती भारतीय मीडिया मठाधीशों में भी होती है। काबिलियत की वजह से नहीं। मीडिया, राजघरानों और सत्ता की गलियों में इनकी 'जुगाड़' के चलते। इनके अधीन दोनो ही चैनल किसी वरिष्ठ पत्रकार के हों ऐसा भी नहीं है। दोनो के दोनो ही भारत के धंधेबाज (व्यवसायिक) घरानों की नौकरी करते हैं। बदले में मोटी पगार (लाखों) लेते हैं। हालांकि कि ऐसा नहीं है, कि यही बिचारे मोटी पगार ले रहे हों। इनकी तरह मीडिया को और भी तमाम 'बिचारे' हैं, जो मोटी पगार पर बंधुआ मजदूरी करते हैं। मतलब मालिक (चैनल फाइनेंसर) जो कहेगा, वो करना इनकी मजबूरी है। वरना मालिक इनसे कह देगा…भागो चैनल से अगर हमारी मजदूरी करना तुम्हें नहीं जरूरी है।

मीडिया में इन दिनों एक मीडिया हाउस पब्लिक और मीडिया के बीच 'मारा-मारी' का मीडिया बना हुआ है। नाम है टीवी-18 और इसका अड्डा है..नोएडा फिल्म सिटी में। इस परिवार के दो भाई हैं। नाम है- सीएनएन और आईबीएन-7….सीएनएन का उस्ताद कोई राजदीप सरदेसाई और आईबीएन-7 का आशुतोष गुप्ता नाम का प्राणी बताया जाता है। गाहे-बगाहे दोनो की ही गिनती भारतीय मीडिया मठाधीशों में भी होती है। काबिलियत की वजह से नहीं। मीडिया, राजघरानों और सत्ता की गलियों में इनकी 'जुगाड़' के चलते। इनके अधीन दोनो ही चैनल किसी वरिष्ठ पत्रकार के हों ऐसा भी नहीं है। दोनो के दोनो ही भारत के धंधेबाज (व्यवसायिक) घरानों की नौकरी करते हैं। बदले में मोटी पगार (लाखों) लेते हैं। हालांकि कि ऐसा नहीं है, कि यही बिचारे मोटी पगार ले रहे हों। इनकी तरह मीडिया को और भी तमाम 'बिचारे' हैं, जो मोटी पगार पर बंधुआ मजदूरी करते हैं। मतलब मालिक (चैनल फाइनेंसर) जो कहेगा, वो करना इनकी मजबूरी है। वरना मालिक इनसे कह देगा…भागो चैनल से अगर हमारी मजदूरी करना तुम्हें नहीं जरूरी है।

खैर छोड़िये। इन दोनों के मालिकों ने इन्हें इस कदर हड़का दिया है इन दिनों…कि इन्हें नौकरी के लाले पड़े हैं। सो इन्होंने जल्दबाजी में अपनी पगार-परिवार सलामत रखने के लिए एक ऐसा "ज़हर-बुझा" नुस्खा खोजा है, जिसे अमल में आते ही….सैकड़ों परिवार चौराहे पर खड़े हो गये हैं। दोनो उस्तादों ने अपनी पगार और परिवार की सलामती का वास्ता देकर, कल तक इन्हीं के वफादार रहे, अनगिनत वफादारों और उनके परिवारों को इन्होंने 'दांव' पर लगा दिया है।

मतलब अपनी पगार की खातिर दोनो उस्तादों ने अपने से नीचे वालों को, जिनकी पगार ((तन-खा) एक लाख से ऊपर है, उनकी नौकरी 'चबाना' शुरु कर दिया है। ठीक वैसे ही जैसे हाथी मुंह में गन्ना चबाता है। वजह सिर्फ वही कि चैनल घाटे में है। खर्चे बढ़ गये हैं। मुनाफा तेल हो चुका है। मालिक का डंडा इनके सिर की तरफ घूमा। सो अपना सिर बचाकर इन्होंने अपने नीचे वालों के सिर मालिक के डंडे के नीचे दे पटके। बिलकुल वैसे ही जैसे अचानक सामने आये सांप को इंसान मार डालने के लिए एकजुट होकर टूट पड़ते हैं।

परमप्रिय कथित रुप से मेरे आदरणीय इन दोनो ही मीडिया के कथित मठाधीशों ने यह तक विचार करना मुनासिब नहीं समझा, कि अपनी पगार पचाने-बचाने के लिए आज जिस तरह और जिनके सिर यह कलम कर रहे हैं, उन्हीं की दम पर सीएनएन में राजदीप सरदेसाई 'राजदीप' बन सके और आईबीएन-7 में परम आदरणीय आशुतोष गुप्ता आज 'डंके की चोट पर खुद को आशुतोष' कह पा रहे हैं। जिनके आज यह दोनो अपने पेट-परिवार की खातिर सिर कलम करके 'बलि' ले रहे हैं या ले चुके हैं, अगर दोनो चैनलों के शुरुआती दौर में, वे ही लोग इनके सिर कलम कर चुके होते, तो आज जो यह दोनो हैं, वह शायद कभी न होते।

चलिये छोड़िये। किसकी गुनहगारी, कौन कातिल कौन शिकार? मीडिया की मंडी में यह रोज होता है। फिर बिचारे और निरीह राजदीप और आशुतोष गुप्ता जी के ही सिर ठीकरा क्यों फोड़ा जाये। इनसे पहले भी बहुतों ने ऐसा किया था। संभव है कि इन दोनो ने भी यही दुख भोगा हो, जब किसी ने अपनी पगार बचाने के लिए इनकी पगार बंद कर दी हो। और इसीलिए भी ये दोनो अनुभवी हो चुके हैं। लिहाजा इनके साथ इनके उस्तादों ने जो सलूक किया होगा, वही सलूक अब ये भी अपने चेलो(वफादारों) के साथ कर रहे होंगे। चलता है। जिसकी लाठी उसकी भैंस। मीडिया है…यहां सब एक से बढ़कर एक मिल जायेंगे…अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग भौंकते।

इतना जरूर कहने का मन है…कि अगर वाकई चैनल घाटे में है। इसीलिए परमवंदनीय आशुतोष गुप्ता और राजदीप सरदेसाई ने मोटी पगार वालों (एक लाख से ऊपर, जैसा मीडिया में चंडूखाने की खबरें आ रही हैं…मैं भी उसी चंडूखाने का हिस्सा हूं…भड़ैती के लिए नहीं पेट पालने के लिए ) को निपटाकर घाटा कम करके मालिक को खुश करने की कोशिश की है तो पहले इन्हीं दोनो को नौकरी से इस्तीफा देना चाहिए…अगर वाकई जरा भी इनमें ग़ैरत है। वैसे मुझे लगता नहीं….कि इनमें से कोई ऐसा होगा…जैसे मैं सोच रहा हूं…क्योंकि दोनो में से अगर कोई इस काबिल होता तो…अपनी पगार सबसे मोटी बताकर, यह बाकी तमामों के पेट पर लात मारने से पहले खुद अपने ही परिवार और पगार को लात मार सकते थे।।। लेकिन ऐसा होता नहीं है, क्योंकि ऐसा बनने के लिए चाहिए ईमान….जिसकी कल्पना तो मैं खुद से भी नहीं करता हूं…कि 23 साल मीडिया की मंडी में "फुटबाल" बनने के बाद अब मेरा भी कुछ 'अपना' बाकी बचा रहा होगा…..सादर समर्पित….Crimes Warrior

लेखक संजीव चौहान आजतक समेत कई चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं और खोजी पत्रकारिता में विशेषज्ञता रखते हैं.

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