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आज नेटवर्क18 के लोग निकाले गये हैं तो कैसे कोई साथ देगा और साथ देगा तो क्यों देगा?

Viplav Vinod : जब आईबीएन में काम करने वाली साक्षी जोशी और इंडिया टीवी के विनोद कापडी ने यशवंत सिंह को फर्जी आरोपों में जेल भिजवा दिया था तब हम 15-20 लोगों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया और दुर्भाग्य से आईबीएन7 सहित किसी भी परम्परागत मीडिया संगठन से एक भी पत्रकार आवाज उठाने नहीं आया। यूएनआई के कर्मचारियों ने जीटीवी के मालिक सुभाष चन्द्रा के खिलाफ महीनों तक लंबी लड़ाई लड़ी लेकिन तब परम्परागत मीडिया संगठनों के लोग यूएनआई के कर्मचारियों पर हंसते थे और आज भी हंस रहे हैं।

Viplav Vinod : जब आईबीएन में काम करने वाली साक्षी जोशी और इंडिया टीवी के विनोद कापडी ने यशवंत सिंह को फर्जी आरोपों में जेल भिजवा दिया था तब हम 15-20 लोगों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया और दुर्भाग्य से आईबीएन7 सहित किसी भी परम्परागत मीडिया संगठन से एक भी पत्रकार आवाज उठाने नहीं आया। यूएनआई के कर्मचारियों ने जीटीवी के मालिक सुभाष चन्द्रा के खिलाफ महीनों तक लंबी लड़ाई लड़ी लेकिन तब परम्परागत मीडिया संगठनों के लोग यूएनआई के कर्मचारियों पर हंसते थे और आज भी हंस रहे हैं।

आज भी यूएनआई के कर्मचारी संकट में हैं, लेकिन परम्परागत मीडिया के पत्रकार सोच रहे हैं कि उनहें इनसे क्या लेना देना, उन्हें 50 हजार, लाख-दो लाख का वेतन मिल रहे हैं। वेतन बोर्ड लागू करने की मांग को लेकर कितनी बार प्रदर्शन किये गये, जरा बताइये कि इन टीवी चैनलों एवं अन्य मीडिया संगठनों के कितने पत्रकार उसमें साथ देने आये। एनडीटीवी, डीएलए, आउटलुक, हिन्दुस्तान और न जाने कितने मीडिया संगठनों के अब तक न जाने कितने लोग निकाले गये, लेकिन कोई विरोध करने नहीं आया।

आज नेटवर्क18 के लोग निकाले गये हैं तो कैसे कोई साथ देगा और साथ देगा तो क्यों देगा, क्योंकि इन निकाले गये लोगों में से कई ऐसे हैं जो पहले न जाने कितने पत्रकारों के निकाले जाने और उनके शोषण के कारण बनते रहे हैं। इनमें से कितने पत्रकार हैं जो पत्रकारिता को बजारू बनाने की साजिश में या तो शामिल रहे हैं या कम से कम उस साजिश के मूक दर्शक रहे हैं। कल को इंडिया टीवी जैसे टेलीविजन चैनलों के वैसे पत्रकारों को निकाला जाये जो पत्रकारिता को सांप और भूतों की कहानियों में बदलने की साजिश में शामिल थे तो क्या साथ देना चाहिये। आज जब कोई पत्रकार अपने अधिकारों की बात करता है तो उसे अपने साथी पत्रकारों से ही गालियां सुननी पड़ती है और जो जितनी उंची आवाज में और जितनी गंदी गालियां देता है वो समझता है कि वह बॉस के उतना अधिक करीब आ गयी और उसकी नौकरी उतनी ही पक्की हो गयी। जिस पेशे और जिस मीडिया घराने में दलाली और मक्कारी ही नौकरी पाने और नौकरी बचाने की शर्त बन जाये, उसे पेशे को छोड़ कर वेश्या बनना या आतंकवादी बनना ज्यादा अच्छा है।

विनोद विप्लव के एपबी वाल से. विनोद विप्लव में समाचार एजेंसी यूनीवार्ता में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.

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