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हाय रे मीडिया की छंटनी और उस पर बवाल!

सुनने में आ रहा है कि एक बड़े मीडिया हाउस ने लगभग साढ़े तीन सौ कथित नाकारा और बोझ बन चुके अपने कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। कई हल्क़ों में इसको लेकर गहमा गहमी और गडयिाली आंसू बहाने से लेकर ड्राइंगरूम में बैठकर नारेबाज़ी और बयानबाज़ी भी की जाने लगी है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि कई ऐसे लोग भी अपनी हमदर्दी की आड़ में ख़ुद को चमकाने की कोशिश में जुट गये हैं जो पिछले काफी अर्से से हाशिये पर थे ! बहरहाल ना तो मीडिया में ये सब पहली बार हुआ है और ना ही कुछ नया। चाहे वीओआई का मामला हो या फिर इक्का दुक्का लोगों की बलि लेनी की अक्सर होने वाली घटनाएं। अब अगर ये कहा जाए कि जिस तरह महिला की अक्सर सबसे बड़ी दुश्मन महिला ही होती की कहावत की तर्ज़ पर पत्रकार का सबसे बड़ा दुश्मन पत्रकार ही है वाली बात है तो कुछ ग़लत ना होगा।

सुनने में आ रहा है कि एक बड़े मीडिया हाउस ने लगभग साढ़े तीन सौ कथित नाकारा और बोझ बन चुके अपने कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। कई हल्क़ों में इसको लेकर गहमा गहमी और गडयिाली आंसू बहाने से लेकर ड्राइंगरूम में बैठकर नारेबाज़ी और बयानबाज़ी भी की जाने लगी है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि कई ऐसे लोग भी अपनी हमदर्दी की आड़ में ख़ुद को चमकाने की कोशिश में जुट गये हैं जो पिछले काफी अर्से से हाशिये पर थे ! बहरहाल ना तो मीडिया में ये सब पहली बार हुआ है और ना ही कुछ नया। चाहे वीओआई का मामला हो या फिर इक्का दुक्का लोगों की बलि लेनी की अक्सर होने वाली घटनाएं। अब अगर ये कहा जाए कि जिस तरह महिला की अक्सर सबसे बड़ी दुश्मन महिला ही होती की कहावत की तर्ज़ पर पत्रकार का सबसे बड़ा दुश्मन पत्रकार ही है वाली बात है तो कुछ ग़लत ना होगा।

कई दिन से सुन रहे हैं कि बाजा़रवाद या बड़े घराने ने पत्रकारों को कत्लेआम कर दिया आदि आदि ! लेकिन क्या साढे तीन सौ लोगों को निकाले जाने की सूची बनाने में किसी पत्रकार का हाथ नहीं था ? क्या अपनी नौकरी बचाने की फिक्र में हमेशा की तरह किसी पत्रकार ने अपने साथियों की बलि नहीं दी ? या फिर जो लोग निकाले गये हैं वही लोग इसी तरह के कृत्य दूसरे के साथ नहीं कर चुके हैं ? सच्चाई यही है कि कि मीडिया के लगातार बिगड़ते हालात के लिए बहुत हद तक हमारे कुछ पत्रकार भाई भी है। बहुत दिनों से देखा जा रहा है कि अपनी लॉबी को मज़बूत करने के चक्कर में अच्छे पत्रकारों की बलि दिया जाना, शाम को शराब की टेबल पर या प्रेस क्लब मे बैठ कर कुछ की नौकरी तय करना और कुछ को बर्बाद करना एक परिपाटी बना हुआ है। जिसका नतीजा सीधे तौर मीडिया और मीडिया हाउसों के स्तर में लगातार गिरावट आना है।

अगर कहा जाए कि निकम्मे और निकृष्ट पत्रकारों की जमात खड़ी करने वालों की वजह से ही मीडिया हाउस लगातार घाटे में जा रहे हैं और एडिटर का काम ख़बरों के बजाए व्यापार इकठ्ठा करना मात्र रहना गया है तो ग़लत ना होगा। जो एडिटर अपनी नौकरी महज़ कंपनी को कारोबार देने के आश्वासन पर बचाए रखना चाहते हैं उनकी सोच कभी अच्छे पत्रकार को मौका देने की हो ही नहीं सकती। अगर गौ़र किया जाए तो भारतीय मीडिया में आज बहुत से लोग एसे भी हैं जो हिंदी पत्रकारिता के नाम पर ठीक से हिंदी तक लिखना नहीं जानते लेकिन उनके ना सिर्फ पैकेज़ मोटे हैं बल्कि उनकी पकड़ भी। इतना ही नहीं आजकल तो महिला पत्रकारों का शोषण या उनकी आड़ में पनपने वाले गैंग के हाथों में नौकरी का गेम चलना भी बेहद चर्चा विषय बना हुआ है। ऐसे में अगर कोई व्यापारी जो करोड़ों रुपए लगाकर पत्रकारों के ही हाथों अपने साथियों की बलि मांगता है और नतीजे में ऐसी घटना सामने आती है तो इसमें बाजा़रवाद ज्यादा दोषी है या फिर पत्रकारों का अवसरवाद ??

लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं, सहारा समय, इंडिया टीवी, इंडिया न्यूज़, वॉयस ऑफ इंडिया समेत कई नेश्नल चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं वर्तमान में हिंदी दैनिक जीत का परचम और साप्ताहिक दि मैन इन अपोज़िशन के संपादक हैं।

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