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मालिकों के लिए पैसा कमाना महत्त्वपूर्ण है, पत्रकारों के लिए नौकरी और तनख्वाह

Sanjaya Kumar Singh : अपनी प्रस्तावित, फिलहाल अनाम पुस्तक से – इंडियन एक्सप्रेस अखबार समूह के दिल्ली केंद्र में 1987 में हुई हड़ताल जब खत्म हुई तो शहर में लगे होर्डिंग पर लिखा था, इंडियन एक्सप्रेस एंड जनसत्ता आर बैक – इंसपाइट ऑफ देम (इंडियन एक्सप्रेस एंड जनसत्ता वापस आ गए हैं – उनलोगों के बावजूद)। यह सूचना उन लोगों के लिए थी जिन्हें 47 दिनों तक सरकार विरोधी ‘खुराक’ से वंचित रहना पड़ा था। पर ‘उनलोगों’ के लिए देश के मशहूर सत्ता विरोधी प्रतिष्ठान का संदेश अलग था। यह अरुण शौरी के नाम से पहले पन्ने पर छपे आलेख में था जिसकी शुरुआत, “जोर है कितना दामन में तेरे, देख लिया है देखेंगे” से हुई थी। इसे अखबार में अंदर प्रकाशित पहले संपादकीय, “गुड मॉर्निंग मिस्टर गांधी” में भी दोहराया गया था।

Sanjaya Kumar Singh : अपनी प्रस्तावित, फिलहाल अनाम पुस्तक से – इंडियन एक्सप्रेस अखबार समूह के दिल्ली केंद्र में 1987 में हुई हड़ताल जब खत्म हुई तो शहर में लगे होर्डिंग पर लिखा था, इंडियन एक्सप्रेस एंड जनसत्ता आर बैक – इंसपाइट ऑफ देम (इंडियन एक्सप्रेस एंड जनसत्ता वापस आ गए हैं – उनलोगों के बावजूद)। यह सूचना उन लोगों के लिए थी जिन्हें 47 दिनों तक सरकार विरोधी ‘खुराक’ से वंचित रहना पड़ा था। पर ‘उनलोगों’ के लिए देश के मशहूर सत्ता विरोधी प्रतिष्ठान का संदेश अलग था। यह अरुण शौरी के नाम से पहले पन्ने पर छपे आलेख में था जिसकी शुरुआत, “जोर है कितना दामन में तेरे, देख लिया है देखेंगे” से हुई थी। इसे अखबार में अंदर प्रकाशित पहले संपादकीय, “गुड मॉर्निंग मिस्टर गांधी” में भी दोहराया गया था।

हड़ताल की रिपोर्ट करते हुए सूर्या इंडिया के जनवरी 1988 अंक में राहुल देव ने लिखा था, एक दिसंबर (1987) को जब एक्सप्रेस के कर्मचारी और पत्रकार आखिरकार अपने कार्यस्थल पर पहुंचकर काम शुरू करने में कामयाब हुए तो तीन पत्रकारों – संजय कुमार सिंह, प्रदीप सिंह और महादेव चौहान एक्सप्रेस बिल्डिंग के पास रात में उनपर हुए घातक हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए। संजय सिंह को सिर में गहरी चोटें आईं और तेजाब के जख्म हैं जबकि दो अन्य को चेहरे और पांवों पर तेजाब के गहरे घाव हैं। तेजाब के घावों के ये निशान इन तीनों के चेहरे पर कई महीनों तक रहेंगे। चिकित्सकों ने उनसे कहा है कि वे भाग्यशाली हैं कि उन्हें प्लास्टिक सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ेगी और जख्म का असर स्थायी नहीं है। हालांकि ये निशान उन्हें, उनके सहकर्मियों और भारतीय प्रिंट मीडिया के बाकी लोगों को उस भारी कीमत की याद दिलाते रहेंगे जो किसी अखबार को अपनी आजादी और अस्तित्व की रक्षा के लिए चुकानी पड़ सकती है।

अपने खून से मैंने प्रेस की आजादी की कीमत भले न चुकाई हो, पर योगदान तो किया ही है। अब, दाग मिट गए हैं, लोग भी प्रेस की आजादी जैसे जुमले भूल चुके हैं। और तो और खबरों की परिभाषा ही बदल गई है और इन सबके साथ मालिकों, पत्रकारों, पाठकों सबकी सोच और जरूरतों में बदलाव आया है। मालिकों के लिए पैसा कमाना महत्त्वपूर्ण है, पत्रकारों के लिए नौकरी और तनख्वाह। इसके लिए पाठकों को खबरों की जगह मनोरंजन और पोर्न की हद तक नंगई परोसी जा रही है और यह सब धीरे-धीरे, सुनियोजित तरीके से हुआ है। ऐसा नहीं है कि इसका विरोध नहीं हुआ पर विरोध नहीं करने वालों का भी एक समूह रहा है जो किन्हीं कारणों से विरोध की जरूरत नहीं समझते थे। इसमें उनकी अपनी नौकरी सबसे महत्त्वपूर्ण रही है। ऐसा नहीं है कि एक्सप्रेस की इस हड़ताल को सभी लोग कांग्रेस की उस समय की सरकार की साजिश ही मानते थे। कर्मचारियों के एक वर्ग का मानना था कि एक्सप्रेस समूह दरअसल सरकार विरोधी होने की आड़ में कर्मचारियों की जायज हड़ताल को कांग्रेस का षडयंत्र बता रहा है और किसी भी तरह हड़ताल को कुचलने पर आमादा है।

तो भाइयों पत्रकार ऐसे ही होते हैं। उनकी लड़ाई कोई और नहीं लड़ सकता और वे अपनी लड़ाई किसी को लड़ने भी नहीं देते। एक्सप्रेस और सरकार की इस भिड़ंत से दूसरे लाला जान गए हैं कि सरकार से लड़कर कुछ मिलने वाला नहीं है और खून सिर्फ कर्मचारियों का चूसा जा सकता है। यह बात जिसे जितनी जल्दी समझ में आ जाए। अब आप आईबीएन सेवन के मामले में राजदीप सरदेसाई से पत्रकारों वाले व्यवहार की उम्मीद करें या लालाओं वाले व्यवहार की – सब उस्ताद हो गए हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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