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नेटवर्क18 के निकाले गए कर्मचारियों का भय

सुनीता भास्कर : सीएनएन-आईबीएन दफ्तर के बाहर कल हो रहे प्रदर्शन में सुना कि निकाले गए 350 पत्रकार शिरकत नही कर रहे, इस डर से कि कहीं इसका भुगतान उन्हें किसी भी अन्य चैनल में नो एंट्री से न करना पड़े..डर स्वाभाविक है..पर अंतिम विकल्प नहीं.. हमें उर्जा लेनी होगी 1996 में हुवे उस प्रकरण से जब बैनेट कौलमैन ग्रुप ने 47 साल पुरानी पत्रिका धर्मयुग को उसके पंद्रह कर्मचारियों समेत (दासों या कहें मवेशियों की तरह बेचने का अनूठा मामला) चंद्रप्रभा पब्लिकेशन्स (जिसके मालिक वेद प्रताप वैदिक थे) को तीन लाख में बेच दिया था……  बेचे गए उन्हीं पंद्रह में से धर्मयुग के उपसंपादक आलोक कुमार श्रीवास्तव अन्याय के सामने झुके नहीं..जबकि मुम्बई जैसा शहर उस पर कम पगारी व मुफलिसी..वह सभी पंद्रह कर्मचारियों को साथ लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे,और अंततः एक साल बाद उनकी पुनर बहाली का आदेश आया… इतने न्यूनतम कर्मचारियों को साथ लेकर इतने बड़े ग्रुप के खिलाफ लड़ पाना इतना आसान न था..पर तब पत्रकारीय जज्बा अपने पूरे वेग में हुआ करता था. मित्रों, हमें उसे दोबारा पाना होगा…पत्रकार एकजुटता मंच के बहाने ही सही…क्यूँ न इसे एक शुरुआत ही मान लें…

सुनीता भास्कर : सीएनएन-आईबीएन दफ्तर के बाहर कल हो रहे प्रदर्शन में सुना कि निकाले गए 350 पत्रकार शिरकत नही कर रहे, इस डर से कि कहीं इसका भुगतान उन्हें किसी भी अन्य चैनल में नो एंट्री से न करना पड़े..डर स्वाभाविक है..पर अंतिम विकल्प नहीं.. हमें उर्जा लेनी होगी 1996 में हुवे उस प्रकरण से जब बैनेट कौलमैन ग्रुप ने 47 साल पुरानी पत्रिका धर्मयुग को उसके पंद्रह कर्मचारियों समेत (दासों या कहें मवेशियों की तरह बेचने का अनूठा मामला) चंद्रप्रभा पब्लिकेशन्स (जिसके मालिक वेद प्रताप वैदिक थे) को तीन लाख में बेच दिया था……  बेचे गए उन्हीं पंद्रह में से धर्मयुग के उपसंपादक आलोक कुमार श्रीवास्तव अन्याय के सामने झुके नहीं..जबकि मुम्बई जैसा शहर उस पर कम पगारी व मुफलिसी..वह सभी पंद्रह कर्मचारियों को साथ लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे,और अंततः एक साल बाद उनकी पुनर बहाली का आदेश आया… इतने न्यूनतम कर्मचारियों को साथ लेकर इतने बड़े ग्रुप के खिलाफ लड़ पाना इतना आसान न था..पर तब पत्रकारीय जज्बा अपने पूरे वेग में हुआ करता था. मित्रों, हमें उसे दोबारा पाना होगा…पत्रकार एकजुटता मंच के बहाने ही सही…क्यूँ न इसे एक शुरुआत ही मान लें…

Sanjay Dwivedi : रंगीन चैनलों की काली कथाएं और करतूतें लोगों के सामने हैं, उनके कर्मचारी सड़क पर हैं। भारतीय टेलीविजन बाजार का यह अचानक उठाव कई तरह की चिंताएं साथ लिए आया है। जिसमें मीडिया की प्रामणिकता, विश्वसनीयता की चिंताएं तो हैं ही साथ ही उन पत्रकारों का जीवन भी एक अहम मुद्दा है जो अपना कैरियर इन चैनलों के लिए दांव पर लगा देते हैं। चैनलों की बाढ़ ने न सिर्फ उनकी साख गिरायी है वरन मीडिया के क्षेत्र को एक अराजक कुरूक्षेत्र में बदल दिया है। क्या इस देश को इतने सेटलाइट चैनलों की जरूरत है। क्या ये सिर्फ धाक बनाने और निहित स्वार्थों के चलते खड़ी हो रही भीड़ नहीं है। जिसका पत्रकार नाम के प्राणी के जीवन और पत्रकारिता के मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। जिस दौर में दिल्ली जैसी जगह में हजारों पत्रकार अकारण बेरोजगार बना दिए गए हों और तमाम चैनलों में लोग अपनी तनख्वाह का इंतजार कर रहे हों इस अराजकता पर रोक लगनी ही चाहिए। चैनल में नियुक्त कर्मियों के रोजगार गारंटी के लिए कड़े नियमों के आघार पर ही नए नियोक्ताओं को इस क्षेत्र में आने की अनुमति मिलनी चाहिए। मीडिया जिस तरह के उद्योग में बदल रहा है उसे नियमों से बांधे बिना कर्मियों के हितों की रक्षा असंभव है। पैसे लेकर खबरें छापने या दिखाने के कलंकों के बाद अब मीडिया को और छूट नहीं मिलनी चाहिए। क्योंकि हर तरह की छूट दरअसल पत्रकारिता या मीडिया के लिए नहीं होती, ना ही वह उसके कर्मचारियों के लिए होती है, यह सारी छूट होती है मालिकों के लिए। सो नियम ऐसे हों जिससे मीडिया कर्मी निर्भय होकर, प्रतिबद्धता के साथ अपना काम कर सकें। आप सबकी लड़ाई में आपके साथ हूं।

सुनीता भास्कर और संजय द्विवेदी के फेसबुक वॉल से.

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