Pramod Joshi : मनीष तिवारी जिस लाइसेंस की बात कर रहे हैं उसकी शुरूआत हो गई तो दो प्रकार के पत्रकार पैदा होने लगेंगे। एक, व्यवस्था के पोषक लाइसेंसी पत्रकार और दूसरे व्य़वस्था विरोधी और हाशिए पर चले गए पत्रकार। दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नागरिक का अधिकार है। उसका लाइसेंस देने का हक किसी को नहीं है। पर घूम फिरकर जो लोग पत्रकारों की योज्ञता वगैरह के सवाल उठा रहे हैं वे पत्रकारिता को अपने कब्जे में करने की मनोकामना को व्यक्त कर रहे हैं। यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का खुला माहौल हो और संजीदा पत्रकारों को बेहतर जीवन मिले तो स्वस्थ पत्रकारिता भी पनपेगी।
समाज के ताकतवर तबके खुद को खुश करने वाली पत्रकारिता चाहते हैं तो वह कभी सम्भव नहीं होगी, क्योंकि पत्रकारिता का वास्ता सामान्य नागरिकों से है। नागरिकों के पक्ष में काम करने वाली पत्रकारिता अंततः सफल होगी। आज नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि कभी नहीं होगी। पिछले साल मनीष तिवारी की पार्टी की युवा सदस्य मीनाक्षी नटराजन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक प्राइवेट बिल संसद में ला रहीं थीं। वह बिल रुक गया, पर लगता है कि देश के राजनीतिक दल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व को समझ नहीं पाते हैं। बेहतर हो इस सवाल को गहराई से समझना चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी के फेसबुक वॉल से.






