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सीईओ और जीएम की राजनीति का साइड इफेक्ट, डेढ़ दर्जन ने आज समाज को बोला गुडबॉय

हरियाणा के कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा के विधानसभा क्षेत्र अंबाला से प्रकाशित अखबार आज समाज के कार्यालय में चल रही आंतरिक राजनीति से हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. यहां कोई हुड्डा का चमचा है तो कोई सीईओ राकेश शर्मा का. इन चमचों के चक्कर में अखबार की हालत लगातार पतली होती जा रही है. खैरात में सेलरी पाने वालों की यहां मौज है और काम करने वालों की जिंदगी बर्बाद हो रही है. चमचे और सीईओ अपनी सेलरी व खर्च निकाल लेते हैं किंतु स्ट्रिंगर से लेकर समाचार संपादक तक की सेलरी डेढ़ से दो महीने में भी नहीं आती है.

हरियाणा के कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा के विधानसभा क्षेत्र अंबाला से प्रकाशित अखबार आज समाज के कार्यालय में चल रही आंतरिक राजनीति से हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. यहां कोई हुड्डा का चमचा है तो कोई सीईओ राकेश शर्मा का. इन चमचों के चक्कर में अखबार की हालत लगातार पतली होती जा रही है. खैरात में सेलरी पाने वालों की यहां मौज है और काम करने वालों की जिंदगी बर्बाद हो रही है. चमचे और सीईओ अपनी सेलरी व खर्च निकाल लेते हैं किंतु स्ट्रिंगर से लेकर समाचार संपादक तक की सेलरी डेढ़ से दो महीने में भी नहीं आती है.

यहां बीस से बीस तक की सेलरी बनती है. जून के बाद अब तक सेलरी नहीं मिली है. इससे एक दर्जन पत्रकारों और दूसरे कर्मचारियों ने नौकरी छोड़ दी है. यहां तक कि बना आईटीकर्मी के ही अंबाला कार्यालय को चलाया जा रहा है. डीटीपी में भी बंदे नहीं हैं और न ही मार्केटिंग और संपादकीय में. अपनी मोटी सेलरी से भी सीईओ और जीएम का पेट नहीं भरता है तो वह ड्रामे करके अपने घर से लेकर रोटी तक के पैसे कंपनी से ही लेते हैं. मालिकों को बेवकूफ बनाकर और कर्मचारियों का हक मारकर ये लोग अपना बैंक बैलेंस बना रहे हैं.

सीईओ राकेश शर्मा और जीएम संजय सिंघल अपनी नौकरी बचाने के लिए आठ महीने में तीन दर्जन से अधिक की नौकरी खा चुके हैं फिर भी हालत नहीं सुधरी तो संपादकीय, मार्केटिंग और सर्कुलेशन में फूट डालो राज करो की नीति से काम कर रहे हैं. हरियाणा और चंडीगढ़ में कांग्रेसी नेता का अखबार होने के कारण सरकारी विज्ञापन तो अपने आप ही मिल जाता है किंतु मार्केट से दोनों ही विज्ञापन नहीं ला पा रहे हैं. राकेश शर्मा सर्कुलेशन के आदमी हैं और उन्हें मार्केटिंग का कोई अता पता नहीं है. हवाई किले बनाकर वह मालिकों को बेवकूफ बनाते आ रहे हैं. जब मालिकों ने पैसा देना बंद कर दिया तो कर्मचारियों का शोषण करके ये अपनी कुर्सी बचाने में लगे हैं. कभी संपादक को बलि का बकरा बनाते हैं तो कभी सर्कुलेशन वालों को तो कभी मार्केटिंग वालों को.

अब तक कई लोगों को सर्कुलेशन और मार्केटिंग में बड़ा काबिल बताकर मोटी पगार पर लाये मगर बाद में उन्हीं को नाकाबिल बताकर छोड़ने के लिए मजबूर किया क्योंकि उनसे खुद की कुर्सी हिलती नजर आई. आजकल ग्रुप संपादक अजय शुक्ला इनके निशाने पर हैं. इस कारण संपादकीय में राजनीति खूब जोरशोर से चल रही है. आईटी हेड मनदीप ने तो नौकरी छोड़ने पर जो चिट्ठी लिखी है वह किसी भी अखबार के सीईओ के लिए शर्मनाक है. यह वही सीईओ हैं जिनके कारण हिंदुस्तान अखबार को अपना चंडीगढ़ एडिशन बंद करना पड़ा था. वहां से राकेश शर्मा अपने आदमी के रूप में संजय सिंघल को लेकर आये थे. संजय ने अब तक तीन दर्जन प्रोफेशनल्स की नौकरी खा ली है. अब वह राकेश शर्मा के ही खास अनिल माथुर की नौकरी खाने की फिराक में हैं.

कुछ दिन पहले ही चंडीगढ़, अंबाला और हिसार के कलस्टर हेड सुशील दत्ता की भी दोनों ने मिलकर नौकरी खा ली जबकि उन्होंने चंडीगढ़ रीजन में दैनिक भास्कर और पंजाब केसरी को चमकाया था और आज समाज की हालत भी सुधार दी थी. अब यह दोनों ग्रुप संपादक अजय शुक्ला के खिलाफ लगे हुए हैं और पूरी राजनीति हुड्डा के खास आदमी बलवंत तक्षक को संपादक बनवाने के लिए कर रहे हैं. बलवंत तक्षक के कारण पहले ही आठ लोगों ने डेस्क की नौकरी छोड़ दी है. राकेश शर्मा और संजय सिंघल की राजनीति से तंग आकर मार्केटिंग हेड सुलेश गोस्वामी, मैनेजर अनीशा सहगल, डिप्टी मैनेजर मूर्ति अग्रवाल ने भी नौकरी छोड़ दी है. डिप्टी मैनेजर जगदीप पठानिया और विनोद कुमार ने भी छोड़ दिया है. अब केवल एक आदमी मार्केटिंग में बचा है.

डेस्क से नौकरी छोड़ने वाले सोहन भारद्वाज, जयराम चतुर्वेदी, रितेश श्रीवास्तव, सोनिया गुर्जर, हरि प्रताप सिंह, कुलभूषण सैनी, अनिल कुमार और डीटीपी हेड मोहन वशिष्ठ व हेमंत कुमार शामिल हैं. अब हालत यह है कि आज समाज को किसी भी विभाग में काबिल बंदा नहीं मिल पा रहे हैं. यहां काम कम राजनीति अधिक है. दो दर्जन लोगों को एक महीना पहले बिना नोटिस के ही निकाला जा चुका है. मार्केटिंग, संपादकीय और सर्कुलेशन के एक दर्जन और लोग भी जल्द ही नौकरी छोड़ने की तैयारी में हैं.

'आज समाज' में पदस्थ एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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