: राजनीतिक नाटक कर रही हैं मायावती : उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार अपने ही मंत्रियों की कारगुजारियों से उबर नहीं पा रही है। अभी तक पांच मंत्री लोकायुक्त की जांच में दोषी पाये जाने पर अपनी कुर्सी गंवा चुके हैं। मायावती के करीबी और बसपा सरकार में मुस्लिम चेहरा कहे जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी लोकायुक्त की जांच में फसते नजर आ रहे हैं। उन पर भ्रष्ट्राचार, अवैधरूप से भूमि पर कब्जा करने के आरोप हैं, वहीं अपने परिवार और रिश्तेदारों को अपने पद का दुरुपयोग करते हुये लाभ पहुंचाने के गंभीर आरोप भी लगे है। इन सभी विवादों से बसपा उबर भी नहीं पाई थी कि मयावती के मंत्रिमंडल के चार और मंत्रियों के विकेट गिर गये।
उत्तर प्रदेश सरकार में पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्य मंत्री अवधेश वर्मा की शाहजहांपुर में एक दबंग मंत्री की छवि बन चुकी थी। विधानसभा चुनाव में अवधेश वर्मा अपने साथ-साथ पूरे जिले में बसपा की हार का कारण न बन जायें, जब इस का एहसास मायावती को हुआ तो उन्हों ने अवधेश को अपने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिख दिया। और उनका टिकट भी काट दिया। अवधेश वर्मा ने 2002 में बसपा से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और ददरौल से विधायक चुने गये। उसके बाद जब मुलायम सिंह ने बसपा के विधायकों को तोड़ा उस समय अवधेश वर्मा ने बसपा में अपनी आस्था दिखाई, जिससे वह मायावती के
विश्वास पात्रों में गिने जाने लगे। 2007 में चुनाव में विधायक चुने जाने पर मायावती ने बसपा में अवधेश वर्मा को पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बना दिया और वह पार्टी में पिछड़ा चेहरा के रूप में अपनी छवि बनाने लगे। इसी बीच अवधेश वर्मा पर पिररोला में एक साधु की हत्या कराकर उस की जमीन हड़पने का आरोप लगा।
अवधेश वर्मा की गुंडई की हद तो पंचायत चुनाव में खुल कर सामने आई, जब अपने परिवार और रिश्तेदारों को ब्लाक प्रमुख बनाने के लिये प्रत्याशियों का अपहरण कराने के आरोप लगे। पहले मामले में तो अपने भाई को बीडीसी सदस्य बनाने के लिये अवधेश वर्मा ने बीडीसी प्रत्याशी के भाई के अपहरण में सरकारी गाड़ी का दुरुयोग किया, जिस में पुलिस ने भारी दवाव में अवधेश वर्मा के भाई के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज किया। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में बसपा ने बहादुर लाल आजाद को अपना प्रत्याशी बनाया। बहादुर लाल आजाद के गांव एवं नगर दोनों जगह से वोट होने और पहचान पत्र होने के कारण इलाहबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस में अवधेश वर्मा को लगने लगा कि बहादुर लाल के खिलाफ आदेश हो सकता है तो पुलिस की सहायता से अवधेश ने याचिकाकर्ता को ही उस के घर से जबरदस्ती उठबा लिया था। इस घटना के बाद याचिकाकर्ता के भाई ने अवधेश वर्मा के खिलाफ पुलिस अधीक्षक को भाई के अपहरण की सूचना दी थी।
अवधेश वर्मा के दबाव में याचिकाकर्ता से एक शपथ-पत्र जिलाधिकारी शाहजहांपुर को दिलाया, जिस में याचिकाकर्ता ने कहा कि उस ने किसी तरह की कोई याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट में नहीं दाखिल की है, जिस के बाद जिलाधिकारी ने यही रिपोर्ट हाईकोर्ट को भेज दी, जिस से वह याचिका निरस्त कर दी गई। इसी मामले की जानकारी करने के लिये एक खबरिया चैनल के पत्रकार ने जब अवधेश वर्मा से फोन पर उन पर लग रहे आरोपों के बारे में सत्यता जानने के लिये बात की तो पहले तो अवधेश वर्मा ठीक से बात करते रहे पर एकाएक वह उस पत्रकार पर हमलावर हो गये और कहा कि आप हमारी इस से पहले भी कई बार रील धो चुके हैं, इस बार यदि आप ने हमारे खिलाफ खबर दिखाई या अपने चैनल पर पट्टी चलाई तो हम आप के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा देंगे।
हद तो 20 दिसम्बर 2010 को तब हो गई, जब अवधेश वर्मा ने मंत्री पद की मर्यादा को भूलते हुये अपने रिश्तेदार को ददरौल ब्लाक से निर्विरोध ब्लाक प्रमुख बनवाने के लिये पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में अपने गनर और जिले के हिस्ट्रीशीटर अनिल घुरई, मोहसिन, बार्डर, बहादुर लाल आजाद और नगर विधानसभा से बसपा के प्रत्याशी असलम खां के साथ मिल कर ब्लाक प्रमुख पद के प्रत्याशी दिनेश पाल सिंह (मुन्ना) के प्रस्तावक स्वतंत्र देव को ब्लाक परिसर से अपहृत कर ले गये थे। अवधेश वर्मा की इस गुंडई की कहानी खबरिया चैनलों के कैमरे में कैद हो रही है, इस का भी धयान नहीं दिया। जब कैमरे में अपनी करतूत कैद होने की भनक लगी तो अवधेश वर्मा ने अपने गुर्गों से खबरिया चैनलों के पत्रकारों को पकड़ने का आदेश दे दिया। एक खबरिया चैनल के पत्रकार को मंत्री के गुर्गों ने पकड़ लिया और उस के साथ हाथापाई की और उस के कैमरे से कैसेट निकाल ली। फिर हिदायत देते हुए छोड़ा। एक पत्रकार वहां से अपनी जान बचाकर खेतों के रास्ते से भागने में सफल हो गया। उस समय कई खबरिया चैनलों ने मंत्री की गुंडई की कहानी दिखाई पर मयावती अपने मंत्री का बचाव करती रही।
चुनाव से पहले जिले में बसपा विधायकों और मंत्री की छवि खराब होने की जानकारी जब मुख्यमंत्री को हुई तो अवधेश वर्मा को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। साथ ही विधान सभा ददरौल के टिकट से भी हाथ धोना पड़ा। हालांकि इसे भी मायावती की राजनीतिक चाल ही बताया जा रहा है। कि आखिर उन्होंने इतने शिकायत होने के बाद भी यह कार्रवाई करने की याद पहले क्यों नहीं आई, चुनाव आते ही क्यों तमाम मंत्रियों पर कार्रवाई हो रही है।
लेखक सौरभ दीक्षित शाहजहांपुर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार हैं.





