कर्नाटक की दो लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनावों पर नतीजे आ चुके हैं. इन परिणामों से कांग्रेस को जरूर राहत मिली होगी. मिलनी भी चाहिए, दोनो सीटों पर कांग्रेस का कब्जा हो चुका है. दोनों ही सीटों के नतीजे ये बताने के लिए काफी है कि इन इलाकों की जनता ने कांग्रेस को पूरे मन से जीत दिलाई है. इस जीत के क्या मायने हैं? येदियुरप्पा-कांड के बाद वैसे भी कर्नाटक में बीजेपी की राह मुश्किल हो गई है. आने वाला लोकसभा चुनाव बीजेपी के लिए ज्यादा बेहतर साबित होगा, कहना कठिन है. वैसे भी दक्षिण भारत में बीजेपी की मौजूदगी शून्य है.
कर्नाटक के विधानसभा चुनाव ने भी कांग्रेस में जोर-खरोश भर दिया था. बीजेपी के पास इसका कोई जवाब नहीं था कि क्यों जनता ने उन्हें सत्ता से बेदखल किया, पर जनता के पास इसकी पर्याप्त वजह थी. बीजेपी के शासन में बार-बार मुख्यमंत्रियों को बदलना, भ्रष्टाचार ऐसे मुद्दे थे, जिनसे बीजेपी उबर नहीं पाई. अब रही-सही कसर लोकसभा उपचुनाव ने पूरी कर दी है. माना जा सकता है कि अब भी कर्नाटक की जनता बीजेपी शासन की गलतियों को भूली नहीं है और वैसे हिमाचल, उत्तराखंड की हार बीजेपी के लिए एक सबक जरूर है, पर बीजेपी सबक कितना ले पाती है, ये देखना होगा. हालांकि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान से बीजेपी की बांछे खिल सकती है, पर दिल्ली दरबार के लिए जरूरी दो सौ बहत्तर का आंकड़ा कैसे आएगा, मुझे नहीं मालूम.
अब बात कांग्रेस की. दरअसल आने वाला लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिहाज से मुफीद है. लगातार दो बार सत्ता में रहने के बाद अगर कांग्रेस को पर्याप्त सीटें न भी मिले तो कहा जा सकता है कि सत्ता के खिलाफ इनकंबेसी फैक्टर था, पर अगर बीजेपी को पर्याप्त सीटें न मिले तो जनता दरबार में उसकी स्वीकार्यता पर सवाल जरूर खड़े होंगे. बीजेपी ने नरेंद्र मोदी के रूप में अपना ट्रम्प कार्ड चल दिया है, पर मोदी की लोकप्रियता वोटों में तब्दील कितनी होगी, ये देखना दिलचस्प होगा. कांग्रेस के पास कम सीटे होने के हालत में भी सहयोगियों को साथ लेने का अवसर होगा. मोदी के सामने रहने पर बीजेपी के सामने सहयोगियों को जोड़ना सबसे बड़ा टॉस्क होगा.
एक वरिष्ठ मीडियाकर्मी ने कर्नाटक चुनाव के बाद कहा था कि कर्नाटक में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं था. सारा चुनाव जाति वाद और स्थानीय मुद्दो के हवाले लड़ा गया था. अगर सही है तो कांग्रेस के दावों को सिरे खारिज नहीं किया जा सकता है. वो सत्ता में वापसी कर रही है. तीसरा मोर्चा भी दम भर रहा है. ऐसे में कांग्रेस का तीसरे मोर्चे से सहयोग लेना या देना हो सकता है. बीजेपी के पास सत्ता विरोधी मुद्दों की भरमार है. जिनके लिए बीजेपी को मेहनत नहीं करनी है, पर उसे सही समय पर सही तरीके से भुनाना भर है. पर क्या बीजेपी ये कर पा रही है?
संसद में हंगामा कर जरूर अखबार और न्यूज चैनलों की सुर्खियां बटोरी जा सकती है, पर लोगों की उंगलियों को वोटिंग मशीन में कमल के बटन तक ले जाने के लिए ये काफी नहीं होती. दरअसल भ्रष्टाचार के मसले पर बीजेपी के दामन पर लगे दाग,बीजेपी को कांग्रेस के खिलाफ जमीनी स्तर पर विरोध करने के नैतिक बल से वंचित करते है. कांग्रेस इसका पूरा लाभ लेती नजर आती है और बची कसर सांप्रदायिकता और पार्टी के भीतर गुटबाजी या सहमति के अभाव का मसला पूरा कर देता है. इतना तय मानिये अगर आने वाले चुनाव में बीजेपी ने दावों के अनुसार प्रदर्शन नहीं किया तो मैदान और एंपायर का दोष नहीं,पूरा श्रेय इसके खिलाड़ियों को ही दिया जाना चाहिए..
सुमीत ठाकुर का विश्लेषण.





