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इन पांच मीडिया हाउसों ने शास्त्री भवन में अपने वकील छोड़ रखे हैं!

Vineet Kumar : ओजी, आप पत्रकारों को अंदर की कोई भी बात पता नहीं होती..मैं आपका नेटवर्क 18 पर छपा लेख पढ़ रही थी, आपके ब्लॉग की फीड आती है मेरे मेल पे..मैं आपको बताती हूं इस मीडिया की सीक्रेट जो कि आप पत्रकार को हवा ही नहीं लगता.. ऐसा है न जी कि ये नेटवर्क18 वाले, एबीपी न्यूजवाले, जीटीवीवाले, टीवी टुडेवाले और उधर सन टीवीवाले ये पांच शास्त्री भवन में अपने वकील छोड़ रखे हैं और ये लोग जमकर अपनी कंपनी के लिए लॉबिइंग करते हैं..आप नोटिस करोगे कि सरकार जो है न जी वो सारे कायदे-कानून इनके फायदे के लिए बनाती है..अब ये देखो, डिस्ट्रीब्यूशन के धंधे में सारे बड़े एमओएस( मल्टी ऑपरेटिंग सिस्टम) के लोग हैं, ये गरीब बेचारा छोटे केबल ऑपरेटर क्या करे ? मरेगा ही न..

Vineet Kumar : ओजी, आप पत्रकारों को अंदर की कोई भी बात पता नहीं होती..मैं आपका नेटवर्क 18 पर छपा लेख पढ़ रही थी, आपके ब्लॉग की फीड आती है मेरे मेल पे..मैं आपको बताती हूं इस मीडिया की सीक्रेट जो कि आप पत्रकार को हवा ही नहीं लगता.. ऐसा है न जी कि ये नेटवर्क18 वाले, एबीपी न्यूजवाले, जीटीवीवाले, टीवी टुडेवाले और उधर सन टीवीवाले ये पांच शास्त्री भवन में अपने वकील छोड़ रखे हैं और ये लोग जमकर अपनी कंपनी के लिए लॉबिइंग करते हैं..आप नोटिस करोगे कि सरकार जो है न जी वो सारे कायदे-कानून इनके फायदे के लिए बनाती है..अब ये देखो, डिस्ट्रीब्यूशन के धंधे में सारे बड़े एमओएस( मल्टी ऑपरेटिंग सिस्टम) के लोग हैं, ये गरीब बेचारा छोटे केबल ऑपरेटर क्या करे ? मरेगा ही न..

बट मैम, पिछले बारह-चौदह साल से यही केबल माफिया ने ही तो टीवी पर राज किया है और हमें कई पुराने मीडियाकर्मियों ने बताया है कि इस देश के टेलीविजन को पत्रकार नहीं, केबल ऑपरेटर गुंडे चलाते हैं..

हो गया न जी, मैंने तभी पहले कहा न कि आप पत्रकारों को कुछ भी पता नहीं होता. कहां से चलाते हैं ये केबल ऑपरेटर..देखोजी, सरकार ने ये सेटटॉप बॉक्स लगाने का जिम्मा एमओएस को दे दिया..अब ये बक्से के नाम पर क्या ला रहे हैं, चाइना का कबाड़ जिसे कि वहां कोई पूछता नहीं और जिसकी कीमत सौ से सवा सौ आती है..यहां दे कितने में रहे हो, हजार रुपये में.आए दिन वो बक्सा खराब होता है और कोई रिपेयरिंग सेंटर नहीं है, लोग परेशान हैं.

लेकिन ये भी तो देखिए न मैम कि हजार रुपये एमओएस ले रहा है तो छोटे शहर और कस्बों में तो ढाई-ढाई, दो-दो हजार वसूल रहे हैं ऑपरेटर..हो गया न जी फिर वही बात..हां, हां कि हम पत्रकारों को अंदर की यानी सिक्रेट कुछ पता नहीं होता( सोचने लगा लेकिन जो साफ-साफ सामने दिखाई दे रहा है उसकी क्या बत्ती बनाकर संध्यावंदन करें)

खैर, मैं आपको रेगुलर पढ़ती हूं जी और आप न मुझे बहुत एन्टरेस्टिंग लगते हो, पढ़कर ही लगता है कि बंदे में बात है…

(इन दिनों गंभीर मुद्रा में, अनुभव की चाशनी से तर संभावित सास-ससुरनुमा शख्स के मुंह से ऐसी बात एक-दो लाइन ही सुनता हूं कि आगे सवाल कर देता हूं- ''दरअसल आप मुझसे चाहते क्या हैं, मेरा मतलब है कि मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूं. अपनी मां का नंबर दूं?'' उधर से आवाज आती है- ''मदद हमें क्या करना है, आप अपनी मदद कीजिए..समझिए कि ईश्वर ने ये शरीर आपको क्यों दिया है, आप क्यों इस धरती पर आए हैं? इतना अच्छा काम कर रहे हैं, पैसा कमा रहे हैं, पूरी जिंदगी अकेले थोड़े ही कटती है. समाज है, घर है, मां-बाप ने इतना जतन से पाला-पोसा है, उनके भी अरमान है, इंसान की कुछ जिम्मेदारी भी होती है…ब्ला,ब्ला…'' हम दरअसल इंसानों से बचे एक अजीब किस्म के चिड़ियाघर में रहते हैं. आप कुछ नहीं करते तो समाज के लिए कमाना शुरु कीजिए और अगर कमाने लग गए तो बैचलर रहकर क्यों चरित्रहीन होने की आशंका लिए घूम रहे हैं, घर-परिवार बसाइए, सुबह उठकर द हिन्दू, द इंडियन एक्सप्रेस के बदले डोरेमान मार्का बैग उठाकर चार साल के लाड़ले को कैब तक छोड़िए, पढ़ाई-लिखाई की भी उम्र होती है, ऐसा थोड़े ही है कि जिंदगी भर आदमी इसी में घिसता रहा..)
    
खैर, उधर से ऐसी कोई आशा नहीं थी लेकिन आदत के हिसाब से सवाल तो वही निकल गया- आप क्या चाहती, मेरा मतलब है मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं?

मदद क्या, क्या मैं आपको एक से एक मीडिया के सिक्रेट भेज सकती हूं. हमारे पास तो ऐसी-ऐसी खबर आती है कि आप पत्रकार..बिल्कुल भेजिए, मेल आइडी तो है ही..भेजा करूंगी, आप एन्टरेस्टिंग लगे मुझे और मुझे लगता है कि आप वो सिक्रेट लोगों के सामने ठीक से रख सकोगे..

अच्छा, आप सिर्फ इस तरह लिखते हो या कुछ और भी करते हो? जी मैं, बच्चों को मीडिया पढ़ाता हूं..

अच्छा-अच्छा..तब तो आपको तो सब पता ही होगा कि मीडिया कैसे काम करता है, ओजी धंधा है जी धंधा..उपर से नीचे तक.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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