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ठंडे बस्ते में आडवाणी की नसीहतें, तेज रफ्तार थामने को तैयार नहीं मोदी

भाजपा के चर्चित नेता नरेंद्र मोदी ने इधर अपने राजनीतिक रथ की रफ्तार काफी तेज कर दी है। वे कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ लगातार आक्रामक निशाने साधने में जुट गए हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर कांग्रेस आलाकमान पर तीखे कटाक्ष करने में मोदी नहीं चूक रहे हैं। पिछले दिनों स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) के मौके पर भी उन्होंने लालकिले से दिए गए प्रधानमंत्री के भाषण की खिंचाई लालन कॉलेज (भुज) से दिए गए भाषण में कर डाली थी।

भाजपा के चर्चित नेता नरेंद्र मोदी ने इधर अपने राजनीतिक रथ की रफ्तार काफी तेज कर दी है। वे कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ लगातार आक्रामक निशाने साधने में जुट गए हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर कांग्रेस आलाकमान पर तीखे कटाक्ष करने में मोदी नहीं चूक रहे हैं। पिछले दिनों स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) के मौके पर भी उन्होंने लालकिले से दिए गए प्रधानमंत्री के भाषण की खिंचाई लालन कॉलेज (भुज) से दिए गए भाषण में कर डाली थी।

उन्होंने करीब 50 मिनट के भाषण में मनमोहन सिंह के उद्बोधन का राजनीतिक तौर पर ‘पोस्टमार्टम’ ही कर डाला था। इस आक्रामक शैली से मोदी के समर्थक काफी उत्साहित जरूर हुए थे। लेकिन, पार्टी के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी को मोदी का यह अंदाज बहुत अच्छा नहीं लगा था। इस पर उन्होंने मोदी को ‘नसीहत’ भी दे डाली थी। बगैर नाम लिए हुए उन्होंने कह दिया था कि अच्छा होता, यदि स्वतंत्रता दिवस को दिए गए लालकिले के भाषण पर जल्दबाजी में इस तरह की टीका-टिप्पणी से बचा जाता।

यूं तो बुजुर्ग नेता आडवाणी कई और मुद्दों पर मोदी को ‘नसीहतें’ दे चुके हैं। लेकिन, इनका कोई असर मोदी की कार्यशैली पर अब तक नहीं दिखाई पड़ा है। यह अलग बात है कि मोदी के तमाम समर्थकों को भी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिए गए उनके जवाबी भाषण का अंदाज कुछ ज्यादा जमा नहीं। सोशल मीडिया में इसकी काफी झलक देखने को मिली है। लेकिन, पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को यह लगता है कि मोदी ने एक स्पष्टवादी नेता की भूमिका ही अदा की है। ऐसे में, उनको भुज के भाषण के लिए कठघरे में खड़ा करने की कोशिश गलत है। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू का सवाल है कि आखिर लालकिले से होने वाले प्रधानमंत्री के भाषण की समीक्षा क्यों नहीं हो सकती? सच्चाई तो यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, अब अपने भाषणों से लोगों में किसी उम्मीद का संचार भी नहीं पैदा कर पा रहे हैं। यदि मोदी ने प्रधानमंत्री की खोखली बातों का करारा जवाब दे दिया, तो इसमें अनैतिकता जैसी क्या बात है?

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पार्टी के अंदर बड़ी राष्ट्रीय भूमिका निभाने के लिए तैयार हो गए हैं। उन्हें पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बना दिया है। तैयारी हो रही है कि उन्हें जल्दी ही पार्टी अपना ‘पीएम इन वेटिंग’ घोषित कर दे। यह अलग बात है कि मोदी को लेकर पार्टी के अंदर भी आम सहमति नहीं बन पाई है। कई मौकों पर आडवाणी जैसे दिग्गज नेताओं ने अपनी कसक जता भी दी है। पार्टी की गोवा कार्यकारिणी की बैठक के बाद आडवाणी ने मोदी प्रकरण पर नाराज होकर अपने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी थी। संघ नेतृत्व के दबाव में उन्होंने अपना इस्तीफा वापस लिया था। इसके बाद भी आडवाणी और उनकी टीम पार्टी के अंदर मोदी के मुद्दे पर सहज नहीं हो पाई है। दूसरी तरफ, चुनाव समिति की कमान संभालने के बाद मोदी ने यूपीए सरकार और कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ अपने तेवर तीखे कर लिए हैं। वे सप्ताह में एक-दो ऐसी टिप्पणियां जरूर कर देते हैं, जिनकी चर्चा मीडिया में कई दिनों तक बनी रहती है।

इधर, मनमोहन सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद डॉलर के मुकाबले रुपए की स्थिति लगातार लचर हो रही है। यहां तक कि डॉलर के मुकाबले रुपए ने 65 रुपए के निचले आंकड़े को छू लिया था। इससे बाजार में काफी घबराहट दिखाई पड़ी। सरकार और रिजर्व बैंक ने रुपए की गिरावट थामने के लिए कई कदम भी उठाए हैं। लेकिन, इनके परिणाम कारगर नहीं दिखाई पड़े। इस मुद्दे पर संसद के अंदर भी पिछले दिनों सरकार की जमकर किरकिरी हुई है। इस पर वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने यही कहा है कि रुपए की गिरावट को लेकर ज्यादा बेचैन होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि, यह स्थिति लंबे समय तक नहीं रहने वाली है। रुपए की लगातार गिरावट पर नरेंद्र मोदी ने शनिवार को राजकोट में जबरदस्त ताना कसा है। उन्होंने कह दिया है कि डॉलर के मुकाबले इन दिनों बेचारे रुपए   की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कह दिया कि हमारे प्रधानमंत्री की तरह से रुपए की भी आवाज गुम हो गई है। यह सब देश की सेहत के लिए शुभ नहीं है। उन्होंने सवाल किया है कि प्रधानमंत्री ने 2009 में कहा था कि वे 100 दिनों के अंदर ही महंगाई पर नियंत्रण कर लेंगे। लेकिन, क्या हुआ? देश के लोगों ने देख लिया कि प्रधानमंत्री के वायदों का हश्र क्या होता है? इस तरह से साफ है कि यूपीए सरकार की तरह से रुपए की भी गिरावट जारी है और वह सरकार की तरह ‘मृत्यु शैया’ पर आ गया है। अब समय आ गया है कि पतन की पराकाष्ठा को थाम लिया जाए। यह काम अब देश की जनता को करना है।

इधर, विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने 84 कोसी परिक्रमा कार्यक्रम विवाद के जरिए अयोध्या का मुद्दा गर्म कर दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिबंध के बावजूद विहिप के नेता आज (25 अगस्त) से परिक्रमा कार्यक्रम शुरू करने पर उतारू हैं। यह अलग बात है कि प्रदेश सरकार ने विहिप के तमाम साधु-संतों की गिरफ्तारी शुक्रवार से ही शुरू कर दी थी। लेकिन, विहिप के समर्थन में भाजपा के दिग्गज नेता भी खुलकर सामने आ गए हैं। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कल यहां तक कह दिया कि परिक्रमा कार्यक्रम पर गलत ढंग से रोक लगाई गई है। इसकी कोई जरूरत नहीं थी। उन्होंने विहिप की यात्रा पर अपना पूरा समर्थन जताया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह पहले ही कह चुके हैं कि किसी धार्मिक यात्रा पर रोक लगाए जाने का औचित्य नहीं है। ऐसे में भाजपा, विहिप के साथ हो रही गैर-इंसाफी बर्दाश्त नहीं करेगी। अच्छा यही रहेगा कि उत्तर प्रदेश सरकार संतों से न टकराए। संघ का नेतृत्व भी परिक्रमा यात्रा के समर्थन में खुलकर आ गया है।

भाजपा के हल्कों में इस बात पर हैरानी जरूर जताई जा रही है कि इस विवादित यात्रा को लेकर मोदी ने कोई सीधी टिप्पणी नहीं की। जबकि, मोदी की राजनीतिक छवि एक धुर हिंदुत्ववादी नेता की बनी हुई है। इसी छवि के चलते वे पिछले कई सालों से गुजरात की सत्ता में बने हुए हैं। दरअसल, 2002 में गुजरात में बड़े पैमाने पर दंगे हुए थे। इन दंगों के बाद संघ परिवार में मोदी की छवि ‘हिंदुत्व योद्धा’ की बन गई थी। यह अलग बात है कि मोदी अब गुजरात विकास मॉडल का हवाला देकर अपनी छवि ‘विकास पुरुष’ की बनाने में लगे हैं। संघ नेतृत्व खास तौर पर दबाव बना रहा है कि मोदी को जल्द से जल्द पार्टी प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दे। इसकी तैयारी भी हो रही है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने भी दबाव बढ़ाने के लिए एक बार फिर कह दिया है कि पार्टी को अपना पीएम उम्मीदवार जल्दी से घोषित करना चाहिए। ताकि, पार्टी कार्यकर्ताओं में कोई संशय की स्थिति न रहे। यह अलग बात है कि जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा जैसे कई दिग्गज नेता मान रहे हैं कि मोदी को चुनावी चेहरा बनाया गया, तो इससे एनडीए के अंदर तमाम व्यवहारिक दिक्कतें शुरू हो जाएंगी। वैसे ही मोदी के मुद्दे पर जदयू ने भाजपा से 17 साल पुराना अपना गठबंधन तोड़ दिया है।

मोदी की उम्मीदवारी भले औपचारिक रूप से घोषित न की गई हो, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व यही मानकर चल रहा है कि अब भाजपा की राजनीतिक मुहिम मोदी के नेतृत्व में ही आगे बढ़ने वाली है। ऐसे में, पार्टी ने जवाबी आक्रामक रणनीति की तैयारी कर ली है। कांग्रेस की प्रमुख सोनिया गांधी ने अपने सिपहसालारों को उत्साहित करने के लिए कह दिया है कि सभी लोग राजनीतिक मोर्चेबंदी के लिए ‘योद्धा’ की भूमिका में आ जाएं। शनिवार को राष्ट्रीय मीडिया सेंटर के उद्घाटन मौके पर सोनिया ने पत्रकारों से कह भी दिया है कि वे पूरी उम्मीद कर रही हैं कि यूपीए-3 की सरकार भी भारी बहुमत से बनेगी। इसमें उन्हें किसी तरह का कोई संदेह नहीं है। कल कर्नाटक से लोकसभा के दो उपचुनावों के परिणाम आए हैं। दोनों सीटों पर कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल कर ली है। मुकाबले में जनता दल (सेक्यूलर) के उम्मीदवार जरूर रहे हैं। लेकिन, इन्हें भाजपा का भी समर्थन हासिल था। फिर भी, इस पार्टी के हाथ से दोनों सीटें छिन गई हैं। उल्लेखनीय है कि मई में हुए कर्नाटक विधानसभा के चुनावों में भी कांग्रेस को भारी सफलता मिली थी। कर्नाटक उपचुनाव के परिणामों से जद (एस) के साथ भाजपा को भी राजनीतिक झटका लगा है। इसको लेकर टीम मोदी के लोग कह रहे हैं कि येदियुरप्पा प्रकरण के चलते कर्नाटक के राजनीतिक हालात पहले से ही खराब थे। इसका लाभ ही कांग्रेस को मिला है। लेकिन, आगे की राजनीतिक तस्वीर में कांग्रेस की झोली में झटके ही झटके आने वाले हैं।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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